बात सन् 1977 की है देश में आपातकाल ख़त्म हो चुका था और जनता पार्टी भारी बहुमत से जीतकर सरकार बना चुकी थी । कांग्रेस की बहुत ही बुरी तरह से हार हुई थी । तत्कालीन प्रधानमंत्री सहित कई दिग्गज कांग्रेसी चुनाव हार गए थे । बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस से अलग हो कर नई पार्टी कांग्रेस फार डेमोक्रेसी बना ली थी जिसने जनता पार्टी की सरकार को समर्थन दिया था । कुल मिलाकर कह सकते हैं कि संजय गाँधी, बंशी लाल ओर इन्दिरा युग उस समय समाप्त हुआ मान लिया गया था । मुरारजी भाई देसाई देश के नए प्रधानमंत्री बने और बाबू जगजीवन राम उप प्रधानमंत्री । अटल बिहारी बाजपेइ विदेश और लालकृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारण मंत्री बनाए गए ।
जिसको उस समय बहुसंख्यक लोग राजनीति का जोकर समझते थे वही राजनारायण जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी को हराया था उनको स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री बनाया गया था । समय के चक्र को कौन समझ पाया है , कुछ ही दिन पहले जिस इन्दिरा गाँधी के नाम से भी लोग थर्राते थे आज वही इन्दिरा गाँधी जेल में थी । बस यही क्रम चल रहा था और बाहर कोई गा रहा था -
समय का पहिया
घूमे भइया
कौन नचाए
कौन नचैया
कौन गवाए
कौन गवैया
हाथों में उसके
डोर सभी की
वो ही लगाए
सबकी पार नैया।
वो ही रास रचैया
वो राम रमैया... ।
ख़ैर सरकार बदल गई थी लोगों को अब भरोसा हो चला था कि निज़ाम बदलते ही दिन बदल जाएंगे । वैसे यह भी सच है कि निज़ाम बदलते ही सिपहसालार और कारिन्दे अपने तौर तरीके बदलने लग जाते हैं । यहाँ कुछ ऐसा ही हो रहा था , वो सिपहसालार जो कुछ ही दिन पहले तक बीस सूत्री कार्यक्रम के तहत ज़बरिया नसबन्दी करवा रहे थे अब बदल चुके थे । उस समय अतिउत्साह में और अपनी पीठ ठोकने के लिए सिपहसालारों ने ज़्यादती करने मे कोई कसर नहीं छोड़ी थी । उस दौर में ऐसा भी हुआ था कि साठ सत्तर बरस के पुरुषों से लेकर अविवाहितों तक की ज़बरिया नसबन्दी कर दी गई थी । लोगों में इतना डर बैठ गया था कि पुरुष कई कई दिन तक अपने घरों से गायब रहे, खेतों में छिपे रहे या किसी किसी जगह तो पहाड़ों में चढ गए थे या जंगल में रहे । यह आम डर था कि न जाने कब कौनसी जीप आएगी और जो हाथ आएगा उसी को ले जाकर शाम को कस्सी करके छोड़ जाएंगे । अब वे ही सिपहसालार एक दूसरे के सिर पर ठीकरा फोड़ने और अपने आप को पाक साफ दिखाने का प्रयास करते दिख रहे थे एक अजब सा दौर शुरू हो चुका था । वैसे यह भी सच था कि कभी भी संजय गाँधी या इन्दिरा गाँधी ने ज़बरिया नसबन्दी के लिए नहीं कहा था लेकिन मीसा कानून लागू कर सम्पूर्ण विपक्ष को जेलों में डालने के दो परिणाम अवश्य हुए कि पहला तो जनता की आवाज़ जो विपक्ष के माध्यम से सरकार तक पहुँचती थी वो बंद हो गई और दूसरा जो मेरे नज़रिए से बहुत ही महत्वपूर्ण रहा वो था मीसा कानून के तहत तमाम विरोधियों को जेल मे डालने से आर एस एस और जनसंघ को पूर्ण रूप से विकसित होने का अवसर प्रदान कर दिया जिसकी परिणती भविष्य में बी जे पी की सरकार बनने के रूप में सामने आई ।
हाँ बात चल रही थी सिपहसालारों के व्यवहार की । सत्ता परिवर्तन साथ ही दिल्ली मुनिसिपल कॉरपोरेशन के सिपहसालारों के तौर तरीके भी बदलने लगे थे हालोकि कॉरपोरेशन में अभी भी बहुमत कांग्रस पार्षदों का ही था किन्तु दिल्ली की हुकुमत का प्रभाव पूरे देश में पड़ता है । करोलबाग रैगरपुरा इलाके में कई दिनो से सीवर लाइन ब्लाक हो रही थी । चुनावों की गहमागहमी, परिणाम आने के बाद अचानक ही सदमे में आई कांग्रेस और पूरा कॉरपोरे शन इस तरफ ध्यान ही नहीं दे पाए थे लेकिन इन्दिरा गाँधी को हराने वाले राजनारायण जो अब स्वास्थ्य मंत्री थे का दौरा प्रस्तावित हो गया था । आनन फानन में सीवर की सफाई के लिए ऊपर के सिपहसालारों ने हुक़्म दिया कि तत्काल ब्लाक हुई सीवर लाइन खोली जाए। बाहर बह रहे सीवर के गंदे पानी का बहाव रोका जाए। कॉरपोरेशन के भी बडे छोटे ओहदेदार ,जमादार,कामदार सभी की बडी सी फोज वहाँ पहुँच चुकी थी । अपने अपने हिसाब से सभी लम्बी लम्बी बातें कर रहे थे । बहस चल रही थी कि कहाँ से और कैसे खोला जाए इस ब्लाकेज को ।खैर जैसा कि होता है लम्बी बहसा बहसी के बाद वही ढाक के तीन पात वाली बात हुई, निर्णय लिया गया कि श्रेष्ठ कार्मिक को सीवर में उतारा जाए । उस ज़माने में सीवर लाइन को साफ करने के लिए बडी बडी मशीनें नहीं हुआ करती थी सक्सन पंप भी नहीं हुआ करते थे । ले देकर बस कुछ जवान सफाई कार्मिकों को ही सीवर लाइन में उतारा जाता था जो ज़्यादा देर तक अपनी सांस रोक कर उस के अन्दर डुबकी लगाकर अपने हाथों से अवरोध को हटा सकें ।
आज सबसे पहले कालू को मेनहोल में उतरने का हुकम दिया गया । कालू ने एक पव्वा दारु चढाइ और उतर गया था उस मेन होल के भीतर । कोई पाँच मिनट तक जब वो वापस बाहर नहीं आया तो सिपहसालारों की चिन्ता बढी और कालू को देखने और उसकी मदद करने के लिए प्रिंस को नीचे भेजा गया । ना प्रिंस वापस आया और ना ही कालू की कोई ख़बर लगी । सीवर के चैम्बर से आती असहनीय दुर्गंध से सबका बुरा हाल था , चिन्ता बढना लाजमी था सो एक और जवान पट्ठे को उसकी पीठ थप थपाकर मेन होल में उतार दिया गया जैसे ही वो कूदा उसकी दम घुटती सी चीख सुनाई दी और फिर आवाज़ ख़ामोश हो गई। तीनो ही बहादुर नोजवान सीवर की ज़हरीली गैस के कारण वहीं पर तत्काल ही काल के गाल में समा गए थे । किसी की भी अब हिम्मत नहीं हो रही थी कि भीतर जाकर उन तीनो की लाश निकालकर ले आए ।
सबके हाथ पैर फूल गए थे अब क्या कर करें। इन्दिरा गांधी को हराने वाला शख्स, केन्द्रीय स्वास्णय मंत्री राजनारायण वहाँ आने वाला वाला था। तीन सफाई कर्मी सीवर लाइन में भीतर मरे पड़े थे । सत्ता का डर भी अलग ही तरह का होता है। किसी को भी यह चिन्ता नहीं थी कि तीनों की लाशों को कैसे निकाला जाए। बस चिन्ता थी तो यह कि स्वास्थ्या मंत्री आएंगे तो सफाई व्यवस्था को सुचारु कैसे करें । कैसे अपनी पीठ बड़े सिपहसालारों से थपकवानी है मसला यह था ना कि तीनों डेड बॉडी को कैसे निकाला जाए ।
खै़र स्वास्थ्य मंत्रीजी का दोरा हुआ उस मेन होल के पास एक तंबू तान दिया गया ताकि किसी की नज़र ही ना पड़े । मंत्री जी आए और फर्राटे से दौड़ती गाडी निकल गई थी । उन्होंने नहीं देखा था कि सड़क के किनारे पर तंबू क्यों गाड रखा है। मतलब भी नहीं था अभी तो नया नया मंत्री पद का रूतबा था। आगे पीछे, सिपहसालारों की फोज थी। उनके लिए चिन्ताएं और बहुत सी थी मसलन जबारिया नसबंदी जिनकी की गई थी उनको तसल्ली देना, इन्दिरा गाँधी के खिलाफ केस दायर करना, वगेरहा वगेरहा वैसे शायद मंत्रीजी को इस घटना के बारे मे जानकारी भी नही थी। कोई तीन दिन के बाद तीनो की सड़ी गली लाशें निकाली गई। फायर ब्रिगेड की गाड़ी से पानी की फुहार देकर उनके शरीरों को धोया गया । फिर उनके घरवालों को सुपुर्द कर दिया गया। डेड बॉडी हैण्ड आवर करने के साथ ही बड़े सिपहसालारों के कर्तव्य की इतिश्री हो गई थी। मानवीय संवेदनाएं ठूँठ हो चुकी थी, हाँ निचले स्तर के कनिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों में काफी दुख था। सफाई कर्मचारियों में एका था सो उन्होंने उनके परिजनों को मुवावजा देने के लिए दबाब बनाया। अब मसला यह था कि तीनो ही नोजवान थे।
जो तीन कर्मचारी इस दुखान्तिका में मरे थे वे तीनो ही अभी पक्के कर्मचारी नहीं थे लेकिन कर्मचारियों के दबाव के आगे कारपोरेशन को,झुकना पड़ा , तीनो को पक्का कर्मचारी घोषित करना पड़ा और उन सभी की फैमिली पेंशन बांधनी पड़ी। मारे गए तीनो के ही परिवार का कोई सदस्य सफाई कर्मी का काम करना चाहे तो उसके लिए भी नोकरी का दरवाज़ा खोल दिया गया था। यह था संगठित बल का प्रभाव डा. आबेडकर के उस वाक्यांश का प्रभाव जिसमे वो कहते हैं कि शिक्षित बनो संगठित बनो । यह शायद अम्बेडकर के उस वाक्यांश का प्रभाव था जिसमें वो कहते हैं कि संगठित बनो, शिक्षित बनो । उस समय शायद अम्बेडकर की आत्मा को कुछ सुकुन अवश्य ही मिला होगा।
बाकि दो की तरह कालू की डेड बॉडी का भी पहले सोचा गया कि वहीं दिल्ली में ही अन्तिम संस्कार कर दें लेकिन कजली अड़ गई थी कि अन्तिम संस्कार उसके पैतृक घर अलवर में ही किया जाए । बाकी के सभी रिश्तेदार पैसे की दुहाई दे रहे थे कि शव को अलवर लाने में बहुत ज़्यादा पैसा लग जाएगा । लेकिन कजली अड़ी रही और शव को अलवर लाया गया, इस सब में कॉरपोरेशन के अधिकारी चोपड़ा साहब ने बहुत मदद की थी । शववाहन की व्यवस्था ,अन्तिम संस्कार के लिए एक्सग्रेसिया अमाउण्ट दिलवाना और फिर कजली के लिए फैमिली पेंशन बंधवाना सभी में मदद की थी।
फैमिली पेंशन भी आसानी से नहीं मिली थी कालू का छोटा भाई पेंशन खुद लेना चाहता था और वो चाहता था कि कजली उसकी लुगाई बन जाए । कजली ने साफ मना कर दिया था। कितने ही दबाब आए रिश्तेदारों ने उसे मनमौजी और भी ना जाने कितने अलंकारों से उसे नवाज़ दिया था । खरी खोटी सुनाने में भी कोई कमी नहीं रखी थी लेकिन वो टस से मस नहीं हुई थी। वो कोई चार-पाँच महिने पेट से थी । अब उसकी आस केवल अपने पेट पर टिकी थी और फैमिली पेंशन पर। चोपड़ा साहब स्थिति को समझ गए थे सो उन्होंने कजली का साथ दिया और उसके लिए फैमिली पेंशन बंधवा दी। एक बेहद खूबसूरत जवान विधवा का जीना कोई आसान न था । मनचलों की पूरी फ़ोज थी उसके अस्तित्व को चुनोती देने के लिए। ये मनचले ज़ात और दूसरी ज़ात दोनो के ही थे। फब्तियाँ कसना, उसके पीछे पीछे चलना, रोज़ाना की बात थी । इधर उसकी उसकी सास और देवर भी सीठणे सुनाने में कोई कमी नहीं छोड़ते थे। बस कजली थी कि सबकी परवाह छोड़ अपने आने वाले बच्चे और उसके भविष्य पर ध्यान दिए थी । परिवार वाले देवर ,जेठ सास ननद सबने उसका साथ छोड़ दिया था और घर से निकाल दिया था। वो ठहरी कजली नहीं झुकी थी किसी के भी सामने ।
मौहल्ले के आखिरी छोर पर उसने एक झोंपड़ी डाल ली थी । दरवाज़ा नहीं था सो उसने एक टाटी और लकड़ी की एक आगळ लगा ली थी । कुछ पैसा आया तो तो बाद में झोंपड़े में दरवाज़ा भी लगवा लिया था । वो अपने साथ घर में एक डण्डा और खुखरी भी ले आई थी अपनी सुरक्षा के लिए । फिर एक दिन उसके पेट में दर्द हुआ तो वो समझ गई थी कि प्रसव का समय आ गया है । वो बिना कुछ सोचे समझे और बिना देर किए जैसे तैसे पड़ोस की लिछी काकी के घर चली गयी थी। जहाँ सारे रिश्तेदार उसे कोसते थे वहीं केवल लिछी काकी ही थी जो उसे ढाढस बंधाती थी । लिछी काकी दाई का भी काम करती थी सो उसने कजली को संभाल लिया था। थोड़ी ही देर में उसे एक लड़का हुआ । लड़का अपने बाप के विपरीत माँ की तरह एकदम गोरा चिट्टा और बहुत ही सुंदर था ।