जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 13 Priyam Gupta द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 13

Episode 13 – जब फैसला भीतर से आता है




कुछ फैसले

लोगों के सामने लिए जाते हैं,

और कुछ

खुद के सामने।

Priyam को अब यह साफ़ दिखने लगा था

कि उसका असली संघर्ष

परिवार या समाज से नहीं,

खुद के डर से था।

और डर

अब धीरे-धीरे

अपनी पकड़ ढीली कर रहा था।

सुबह जब उसकी आँख खुली,

तो मन में अजीब-सी शांति थी।

कोई भारीपन नहीं,

कोई जल्दबाज़ी नहीं।

बस एक साफ़ एहसास—

अब भागना नहीं है।

वह उठी,

खिड़की खोली।

धूप आज ज़्यादा तेज़ नहीं थी,

पर उजली थी।

उसने मन ही मन सोचा—

“शायद फैसले भी ऐसे ही होते हैं,

न बहुत तेज़,

न बहुत धीमे—

बस सही।”

नाश्ते की मेज़ पर

माँ कुछ देर से उसे देख रही थीं।

“आज तुम अलग लग रही हो,”

उन्होंने कहा।

Priyam ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा—

“अच्छे वाला अलग?”

माँ मुस्कुराईं।

“हाँ।

आज तुम शांत हो।”

Priyam ने चाय का घूँट लिया।

“माँ…

अगर मैं एक बात कहूँ

तो आप सुनोगी?”

“हमेशा,”

माँ ने कहा।

Priyam ने धीरे से कहा—

“मैंने तय कर लिया है

कि मैं डर के हिसाब से

फैसला नहीं लूँगी।”

माँ कुछ नहीं बोलीं।

बस उसकी तरफ़ देखती रहीं।

“मतलब?”

उन्होंने पूछा।

“मतलब ये कि

अगर मैं किसी के साथ आगे बढ़ूँ,

तो इसलिए नहीं कि

सब कह रहे हैं—

बल्कि इसलिए कि

मैं खुद चाहती हूँ।”

माँ की आँखों में

हल्की नमी आ गई।

“तुम बहुत देर से

ये बात कहने की कोशिश कर रही थीं,”

उन्होंने कहा।

“आज पहली बार

तुमने साफ़ कहा है।”

दोपहर तक

Priyam अपने काम में लगी रही।

पर मन कहीं और था।

बार-बार

Yaman की बातें

याद आ रही थीं।

उसका धैर्य,

उसका ठहराव,

और वो भरोसा

जो उसने बिना माँगे दिया था।

“क्या यही वो इंसान है

जिसके साथ

मैं खुद रह सकती हूँ?”

उसने खुद से पूछा।

और पहली बार

इस सवाल का जवाब

डर के बिना आया—

शायद हाँ।

शाम को

उसने Yaman को मैसेज किया—

“क्या हम मिल सकते हैं?”

जवाब तुरंत आया—

“हाँ।

जब भी आप कहें।”

बस यही बात

Priyam के चेहरे पर

हल्की मुस्कान लाने के लिए काफ़ी थी।

वे दोनों उसी जगह मिले

जहाँ पहले कई बार

बातें हुई थीं।

वही सादगी,

वही शांति।

कुछ पल

दोनों चुप रहे।

फिर Priyam ने कहा—

“आज मैं किसी नतीजे के लिए नहीं आई हूँ।”

Yaman ने सिर हिलाया।

“और मैं किसी दबाव के साथ नहीं बैठा हूँ।”

उसने राहत की साँस ली।

“मुझे लगता है,”

Priyam ने धीरे से कहा,

“कि मैं अब साफ़ देख पा रही हूँ।”

Yaman ने उसकी तरफ़ देखा।

“क्या?”

“ये कि

मुझे क्या नहीं चाहिए,

और…

मुझे क्या चाहिए।”

उसने एक पल रुककर कहा—

“मुझे ऐसा रिश्ता चाहिए

जहाँ मुझे बोलना न पड़े

कि मैं कौन हूँ।”

Yaman ने बिना देर किए कहा—

“आपको मेरे सामने

कभी खुद को साबित करने की ज़रूरत नहीं होगी।”

उसके शब्द

बड़े नहीं थे,

पर पक्के थे।

Priyam ने गहरी साँस ली।

“मुझे अभी भी डर लगता है,”

उसने ईमानदारी से कहा।

“लेकिन अब

मैं डर को रास्ता तय नहीं करने देना चाहती।”

Yaman ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“डर रहेगा,

बस फैसला आपका होगा।”

कुछ पल की खामोशी।

फिर Priyam ने पूछा—

“अगर कभी

मुझे लगे कि मैं खो रही हूँ…

तो आप क्या करेंगे?”

Yaman ने सीधे जवाब दिया—

“मैं आपको वापस खुद तक

लौटने में मदद करूँगा।”

Priyam की आँखें भर आईं।

उस शाम

कोई वादा नहीं हुआ।

कोई तारीख़ तय नहीं हुई।

लेकिन दोनों को पता था—

कुछ बदल गया है।

घर लौटकर

Priyam देर तक

अपने कमरे में बैठी रही।

उसने डायरी खोली।

इस बार

लिखने से पहले

काफ़ी देर सोचा।

फिर लिखा—

आज मैंने तय किया

कि मैं अपने डर की नहीं,

अपने सच की सुनूँगी।

और मेरा सच

अब किसी एक नाम से

डरता नहीं है।

अगले दिन

परिवार के साथ बैठकर

उसने बात रखी।

“मैं अभी शादी की तारीख़ नहीं चाहती,”

उसने साफ़ कहा।

“लेकिन मैं इस रिश्ते को

आगे बढ़ाना चाहती हूँ।”

कमरे में चुप्पी छा गई।

फिर पापा बोले—

“अगर तुम साफ़ हो,

तो हम भी।”

माँ ने उसका हाथ दबाया।

“अब तुम भाग नहीं रही,”

उन्होंने कहा।

“अब तुम खड़ी हो।”

उधर Yaman ने भी

अपने घर में साफ़ कहा—

“मैं Priyam के साथ

धीरे आगे बढ़ना चाहता हूँ।

बिना दबाव,

बिना जल्दी।”

माँ ने मुस्कुराकर कहा—

“रिश्ते ऐसे ही टिकते हैं।”

उस रात

Priyam को नींद आई।

पहली बार

बिना सवालों के।