अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 14 sukhvinder Singh Rai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 14

**भाग चौदह: अंधेरी रात और तन्हाई की कसक**कबीर अपनी पुरानी बुलेट पर सवार होकर शहर की उस अँधेरी और सुनसान सड़क पर बढ़ा जा रहा था, जहाँ सन्नाटा भी शोर मचाता हुआ महसूस हो रहा था। बुलेट के इंजन की भारी और गूँजती हुई दहाड़ सन्नाटे को चीर रही थी, और ठंडी हवा के तेज़ थपेड़े उसके चेहरे पर किसी नुकीले कांटों की तरह पड़ रहे थे। लेकिन कबीर का पूरा वजूद इस सब से कोसों दूर, किसी और ही ख्यालों की दुनिया में खोया हुआ था।सड़क के मोड़ पर जैसे ही स्ट्रीट लाइट की पीली, मद्धम रोशनी उसकी आँखों पर पड़ती, उसे उस रोशनी के धुंधलके में सिर्फ पल्लवी का वह मासूम और प्यारा चेहरा दिखाई देता। कभी वह खिलखिलाकर मुस्कुराती हुई पल्लवी, कभी अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उसे नटखट अंदाज़ में 'जंगली बंदर' कहती हुई पल्लवी... और कभी वह आंसुओं से भीगी हुई पल्लवी, जो उसकी कलाई को अपनी कांपती हुई उंगलियों से पकड़कर रुंधे हुए गले से कह रही थी— *'मैं तुमसे बहुत सच्चा प्यार करती हूँ कबीर...'*"धत् तेरे की!" कबीर ने अपनी हताशा और मन के द्वंद्व में झुंझलाकर बाइक का एक्सीलेटर और तेज़ खींच दिया। बुलेट की रफ़्तार अब हद से ज़्यादा बढ़ चुकी थी, जैसे वह इस रफ़्तार के ज़रिए अपनी उन यादों से आगे निकल जाना चाहता हो। वह इस चेहरे को, उन मासूम यादों को अपने जहन के किसी अंधेरे कोने में धकेल देना चाहता था, लेकिन पल्लवी की मासूमियत का वह घेरा इतना गहरा था कि वह चाहकर भी उससे बाहर नहीं निकल पा रहा था।रास्ते में उसने एक सुनसान पुल के किनारे अपनी बाइक रोकी, जहाँ नीचे नदी का पानी धीमी आवाज़ में कल-कल कर रहा था। इंजन बंद होते ही एक ऐसा गहरा सन्नाटा पसर गया जो कबीर के कानों में सीटी की तरह बजने लगा। कबीर ने बाइक के हैंडल पर अपने दोनों मज़बूत हाथ टिका दिए और अपना सिर उन पर झुका दिया। ठंडी हवा उसके बिखरे हुए बालों को सहलाती हुई निकल रही थी, लेकिन उसे सुकून की जगह बेचैनी ही महसूस हो रही थी। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कीं, तो फिर से वही चेहरा सामने आ गया।"मुझे माफ़ कर देना पल्लवी..." कबीर ने उस खामोशी को चीरते हुए एक बहुत ही भारी, थकी हुई और टूटी हुई आवाज़ में कहा। उसकी आवाज़ में एक ऐसा गहरा दर्द और लाचारी थी, जिसे वह हवेली की उस रईस महफिल में किसी को भी नहीं दिखाना चाहता था। "मुझे सच में माफ़ कर देना। मैं जानता हूँ कि तुम्हारा प्यार बेपनाह और सच्चा है, लेकिन तुम्हारी और मेरी ज़िंदगी की ये जो लकीरें हैं, इनमें ज़मीन-आसमान का फर्क है। तुम एक आज़ाद आसमान की नाज़ुक चिड़िया हो और मैं इस ज़मीन की सख्त धूल। मेरी मजबूरियां और मेरी ये बदहाली तुम्हें सिर्फ़ तकलीफ और आँसू ही देगी।"कबीर ने अपना सिर उठाया और आसमान की तरफ देखा, जहाँ घने काले बादलों के बीच कोई भी तारा अपनी रोशनी नहीं बिखेर रहा था। वह उदास था, पर उसे अपनी इस 'हकीकत' से कोई शिकायत नहीं थी। उसने एक ठंडी और लंबी सांस ली, मानो अपने दिल के बोझ को कम करने की कोशिश कर रहा हो। वह धीरे-धीरे फुसफुसाया, "मुझसे भी बहुत अच्छे लड़के हैं इस दुनिया में पल्लवी... जो तुम्हें वह हर ख़ुशी, वह हर आलीशान आराम दे सकते हैं जिसके तुम काबिल हो। तुम्हें तुम्हारी ही जैसी उस शानदार दुनिया का कोई राजकुमार मिलेगा, जो तुम्हें पलकों पर बिठाकर रखेगा और दुनिया की हर खुशियाँ कदमों में लाकर रख देगा। मेरे जैसे एक मामूली लड़के के चक्कर में पड़कर अपनी ज़िंदगी की खुशियां मत बर्बाद करो।"उसे इस पुल के किनारे, उस अंधेरे में अकेले बैठे न जाने कितना वक़्त गुज़र चुका था। रात ढलती जा रही थी, पर कबीर के दिल का भारीपन कम होने का नाम नहीं ले रहा था। उसने एक बार फिर अपनी ठुड्डी के पास जमे हुए उस सूखे खून के निशान को छुआ, जो उसे राजेश के उन थप्पड़ों की याद दिला रहा था, लेकिन वह दर्द उसके दिल के उस घाव के सामने कुछ भी नहीं था जो पल्लवी के जाने के ख़याल से हो रहा था। भारी मन से उसने अपनी बुलेट स्टार्ट की। वह पल्लवी को अपनी ज़िंदगी से हमेशा के लिए दूर तो कर चुका था, लेकिन अपने दिल की धड़कनों से उसे कैसे जुदा करता? इसका जवाब उसके पास भी नहीं था। वह अँधेरी सड़क पर अपनी बुलेट के साथ आगे बढ़ गया, पीछे छोड़ गया सिर्फ तन्हाई और एक अधूरा ख्वाब।