**भाग नौ: शिकवे और आँसू**उस विशाल गलियारे में, पल्लवी के कमरे का वह भारी ओक का दरवाज़ा किसी ठोस दीवार की तरह खड़ा था। कबीर उस दरवाज़े के ठीक सामने आकर रुक गया। उसने एक गहरी सांस ली, अपने हाथों को मुट्ठी में बांधा और बहुत ही भारी आवाज़ में पुकारा, "पल्लवी..."दरवाज़े के उस पार कोई हलचल नहीं हुई।कमरे के अंदर, पल्लवी अपने विशाल बिस्तर के किनारे, फर्श पर घुटनों को मोड़कर बैठी थी। उसका चेहरा आंसुओं से चिपका हुआ था, बाल बिखरे थे और होंठ सूख चुके थे। पिछले चौबीस घंटों से वह उसी एक जगह पर बैठी थी। उसका दिमाग एक ऐसे लूप में फंस गया था जहाँ सिर्फ कबीर का वह रुखा चेहरा और उसके चुभते हुए लफ़्ज़ बार-बार गूंज रहे थे।तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी— 'पल्लवी...'पल्लवी ने अपने घुटनों से सिर उठाया। उसकी सूजी हुई आँखें पलकें झपकाने लगीं। उसकी धड़कनें, जो कल से एक मुर्दे की तरह शांत थीं, अचानक तेज़ हो गईं। लेकिन फिर उसने अपना सिर वापस घुटनों पर रख लिया। उसने खुद को दिलासा देते हुए धीरे से फुसफुसाया, "मैं सच में पागल हो चुकी हूँ... अब मुझे उसकी आवाज़ें भी सुनाई देने लगी हैं।"लेकिन अगले ही पल, दरवाज़े पर एक हल्की सी दस्तक हुई।"पल्लवी, दरवाज़ा खोल। मैं हूँ... कबीर।"यह महज़ एक वहम नहीं था। कबीर सच में उस दरवाज़े के पार खड़ा था। पल्लवी का दिल अब इतनी ज़ोर से धड़कने लगा कि उसे लगा जैसे वह सीना फाड़कर बाहर आ जाएगा। उसने झटके से अपना सिर उठाया। कबीर? यहाँ? उसकी हवेली में? पल्लवी को अपनी ही इंद्रियों पर यकीन नहीं हो रहा था।"पल्लवी... मुझे पता है तू अंदर ही है। दरवाज़ा खोल," कबीर ने फिर से दस्तक दी।पल्लवी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। उसे कबीर की वे बातें याद आ गईं— 'तेरी और मेरी दुनिया में बहुत फर्क है... अपने दिमाग से यह प्यार-व्यार निकाल दे।' पल्लवी ने अपने दोनों हाथों से अपने कान कसकर बंद कर लिए और रोने लगी। वह कबीर का सामना नहीं करना चाहती थी।पाँच मिनट बीत गए। कबीर लगातार दरवाज़ा खटखटा रहा था, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आ रहा था।नीचे खड़े राजेश और सुमन की निगाहें भी उसी दरवाज़े पर टिकी थीं। कबीर का सब्र अब जवाब दे रहा था। उसे समझ आ गया था कि सीधी बातों से यह 'छोटे दिमाग वाली' लड़की दरवाज़ा नहीं खोलने वाली।कबीर ने अपने हाथ नीचे किए और दरवाज़े के बिल्कुल करीब जाकर, एक ऐसी खौफनाक और ठंडी आवाज़ में बोला, जिसमें रत्ती भर भी मज़ाक नहीं था।"पल्लवी... मैं तीन तक गिनूंगा। अगर तूने इस बार यह दरवाज़ा नहीं खोला ना, तो सुन ले... मैं इसी सीढ़ी से कूदकर अपनी जान दे दूँगा, सुसाइड कर लूँगा मैं!"ये शब्द पल्लवी के कानों में किसी धमाके की तरह गूंजे।'सुसाइड?' पल्लवी के कानों से हाथ नीचे गिर गए। उसका सारा डर, सारा गुस्सा और सारी जिद एक पल में हवा हो गई। उसे पता था कि कबीर जो कहता है, वह कर गुज़रता है।"एक..." कबीर की गिनती शुरू हो गई।पल्लवी बदहवास होकर अपने बिस्तर से उठी।"दो..." कबीर की आवाज़ और भारी हो गई।पल्लवी भूल गई कि उसके टखने में भयंकर मोच है। उसने जैसे ही पहला कदम बढ़ाया, पैर के दर्द ने चीख निकाल दी, लेकिन वह उस दर्द की परवाह किए बिना लंगड़ाते हुए दरवाज़े की तरफ दौड़ी।"ती..."कबीर का लफ़्ज़ पूरा होने से पहले ही 'क्लिक' की आवाज़ हुई और वह भारी दरवाज़ा एक झटके में खुल गया।सामने पल्लवी खड़ी थी। उसकी हालत देखकर कबीर का दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया। पल्लवी के गुलाबी सूट पर सलवटें थीं, चेहरा आंसुओं से भीगा और एकदम सफेद पड़ चुका था। उसकी आँखों में एक अजीब सा खौफ था। वह हाँफ रही थी।दरवाज़ा खुलते ही पल्लवी की नज़रे सबसे पहले कबीर के चेहरे पर गईं। उसकी ठुड्डी पर जमे हुए खून और होंठ के उस कटे हुए कोने को देखकर पल्लवी के सीने में एक टीस उठी। लेकिन उसने उस खून के बारे में नहीं पूछा। वह बस एकटक कबीर को घूर्ती रही। उसकी आँखों में गुस्सा भी था और प्यार भी।"तू पागल हो गई है क्या?" कबीर ने बिना खून की परवाह किए, एक गुस्से भरी डांट के साथ अंदर कदम रखा। "पिछले चौबीस घंटे से यह ड्रामा क्या लगा रखा है? न कुछ खाया, न पानी पीया... दरवाज़ा क्यों नहीं खोल रही थी तू?"पल्लवी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस अपनी डबडबाई आँखों से कबीर को देखती रही। उसकी पलकें भीग गईं और वह धीरे-धीरे रोने लगी।कबीर को उस तरह खामोश रोते देखकर एक अजीब सी उलझन हुई। उसने अपना लहज़ा थोड़ा नरम किया।"देख पल्लवी, तेरे माँ-बाप नीचे बहुत परेशान हैं। वे तेरी वजह से पागल हो रहे हैं। चुपचाप मेरे साथ नीचे चल।" कबीर ने आगे बढ़कर पल्लवी का हाथ पकड़ने की कोशिश की।लेकिन पल्लवी ने झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया।"नहीं..." पल्लवी की आवाज़ बहुत धीमी और कांपती हुई थी। उसने धीरे-धीरे अपना सिर 'ना' में हिलाया। "तुमने मेरी कसम खा रखी है कबीर... अब तुम मेरी फिक्र क्यों कर रहे हो? चले जाओ यहाँ से। मैं... मैं नीचे नहीं आउंगी। मैं यहीं रहूंगी।"कबीर ने एक गहरी सांस ली। यह 'छोटे दिमाग वाली' लड़की अब किसी भी सीधी बात से नहीं मानने वाली थी।