अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 7 sukhvinder Singh Rai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 7

**भाग सात: हवेली की चौखट पर**दरवाज़े पर पड़ने वाली वो ज़ोरदार दस्तक और पल्लवी के माता-पिता की वो घबराई हुई आवाज़ें अब पल्लवी के कानों तक नहीं पहुँच रही थीं। वह कमरे के फर्श से उठी और किसी बेजान मशीन की तरह घिसटते हुए अपने मखमल के बिस्तर तक पहुँची। उसने अपने भीगे हुए कपड़े नहीं बदले, न ही अपने बालों को सुलझाया। वह बस उसी हालत में बिस्तर पर गिर पड़ी। उसकी आँखें छत पर टंगे उस कीमती झूमर को घूर रही थीं, लेकिन उसे वहां सिर्फ कबीर की वह सर्द आँखें और उसके वे चुभते हुए लफ़्ज़ नज़र आ रहे थे— 'तेरी और मेरी दुनिया में ज़मीन-आसमान का फर्क है...' आंसुओं से थक चुकी पल्लवी की पलकें धीरे-धीरे भारी होने लगीं और वह उसी करवट, आंसुओं से भीगे तकिए पर एक गहरी, खौफनाक नींद में डूब गई।बाहर, उसके पिता राजेश और माँ सुमन ने हार मान ली थी। उन्हें लगा कि शायद उनकी बेटी किसी बात से परेशान है और उसे कुछ देर अकेला छोड़ देना ही ठीक रहेगा। लेकिन उन्हें इस बात का रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि यह खामोशी कितनी लंबी और दर्दनाक होने वाली है।वक़्त खिसकता रहा। रात बीती, अगली सुबह की धूप ने हवेली के लॉन को रोशन किया, और फिर देखते ही देखते सूरज पश्चिम में ढलने लगा।अगली शाम आ चुकी थी। पल्लवी के कमरे का वह भारी ओक का दरवाज़ा पिछले चौबीस घंटों से एक बार भी नहीं खुला था। न अंदर से किसी के रोने की आवाज़ आई थी, न पानी मांगने की, और न ही कदमों की कोई आहट।अब हवेली के उस शानदार ड्रॉइंग रूम में एक खौफनाक बेचैनी पसर चुकी थी। सुमन की आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं। वह सोफे पर बैठी अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपाए सुबक रही थीं। राजेश, जो शहर के एक बहुत बड़े और शांत मिज़ाज वाले रुतबेदार इंसान थे, आज पागलों की तरह कमरे में इधर-उधर टहल रहे थे। उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। उन्होंने पल्लवी के कई दोस्तों को फोन किया था, लेकिन किसी को कुछ नहीं पता था।आख़िरकार, राजेश ने पल्लवी के कॉलेज के एक करीबी दोस्त, रोहन को हवेली बुलाया।कुछ ही देर में हवेली के बाहर एक कार रुकी और रोहन घबराया हुआ अंदर दाखिल हुआ। इतने बड़े और आलीशान घर की वह खामोशी किसी को भी डराने के लिए काफी थी।"नमस्ते सुमन आंटी... नमस्ते अंकल," रोहन ने अंदर आते ही झिझकते हुए कहा।रोहन को देखते ही सुमन अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख पाईं। वह लगभग दौड़ते हुए रोहन के पास आईं और उसके कंधे पर हाथ रख दिया।"रोहन बेटा... पल्लवी को क्या हुआ है? कल दोपहर से उसने खुद को कमरे में बंद कर रखा है। न कुछ खाया है, न एक घूंट पानी पिया है! वह दरवाज़ा भी नहीं खोल रही... हम तो डर के मारे पागल हो रहे हैं!" सुमन की आवाज़ आंसुओं में डूब गई।राजेश ने भी रोहन के पास आकर गहरी और थकी हुई आवाज़ में पूछा, "बेटा, तुम लोग कॉलेज में साथ रहते हो। क्या कल कुछ ऐसा हुआ था जिससे वह इतनी बुरी तरह टूट जाए? हमें सच-सच बताओ।"रोहन एकदम सुन्न खड़ा रह गया। उसे कल शाम तक का वह वाकया याद था जब कबीर ने पल्लवी को सड़क पर बाइक से बचाया था। लेकिन उसके बाद क्या हुआ, यह उसे नहीं पता था।"अंकल... मुझे हकीकत में नहीं पता कि कल दोपहर के बाद पल्लवी के साथ क्या हुआ," रोहन ने अपनी नज़रें झुकाते हुए कहा। फिर वह कुछ पल के लिए रुका, जैसे अपने अंदर कुछ बोलने की हिम्मत जुटा रहा हो। "लेकिन... मुझे इतना यकीन है कि इसका जवाब सिर्फ एक ही इंसान दे सकता है। कबीर।""कबीर?" राजेश ने अपनी भौहें सिकोड़तीं। "यह कबीर कौन है?"रोहन ने एक गहरी सांस ली। "कबीर हमारा कॉलेज का दोस्त है अंकल। बहुत सीधा, साफ़-दिल और मदद करने वाला लड़का है। लेकिन... पल्लवी उसे सिर्फ दोस्त नहीं मानती। आंटी, मैंने पल्लवी की आँखों में देखा है, वह कबीर को बेइंतहा पसंद करती है, बहुत प्यार करती है। लेकिन कबीर... कबीर की दुनिया बिल्कुल अलग है। वह इन सब चीज़ों से बहुत दूर रहता है। कल शाम पल्लवी बहुत नर्वस थी, मुझे लगता है कबीर को ही पता होगा कि ऐसा क्या हुआ है।"सुमन और राजेश अवाक रह गए। उनकी इकलौती बेटी, जिसे उन्होंने दुनिया की हर खुशी दी थी, वह किसी के प्यार में इस कदर टूट सकती है, यह उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था।"तुम अभी इसी वक़्त उस कबीर को फोन लगाओ रोहन," राजेश की आवाज़ में एक पिता का खौफ और अधिकार दोनों थे। "उसे यहाँ बुलाओ!"रोहन ने बिना कोई पल गंवाए अपना फोन निकाला और कबीर का नंबर डायल किया।शहर के दूसरे छोर पर, शिवाजी कॉलोनी के उस छोटे से सीलन भरे कमरे में भी खामोशी पसरी थी।कबीर अपने उसी खुरदरे तख्त पर पीठ टिकाए, घुटनों को मोड़कर बैठा था। उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे आ गए थे। पास रखी छोटी सी टेबल पर कल रात की रोटियां और सब्ज़ी वैसे ही अछूती पड़ी थी। कल दोपहर से जबसे पल्लवी रोते हुए उस कमरे से बाहर निकली थी, कबीर के गले से पानी का एक घूंट भी नीचे नहीं उतरा था।उसकी निगाहें छत के उसी पंखे पर टिकी थीं, लेकिन उसके दिमाग में बार-बार पल्लवी का वह रोता हुआ चेहरा, और उसका वह जुमला गूंज रहा था— 'तुम्हारे बिना मेरा एक पल नहीं कटता कबीर...' कबीर ने अपने दिल को बहुत कठोर बनाने की कोशिश की थी, लेकिन आख़िरकार वह भी एक इंसान था। उसे अंदर ही अंदर एक खौफ खा रहा था कि पल्लवी किस हाल में होगी।तभी उसके फोन की स्क्रीन रोशन हुई और रोहन का नाम चमका। कबीर ने झटके से फोन उठाया।"हाँ रोहन, बोल," कबीर की आवाज़ भारी और सूखी हुई थी।"कबीर... तू अभी कहाँ है?" रोहन की आवाज़ में घबराहट साफ छलक रही थी। "भाई, तू अभी के अभी पल्लवी के घर आजा। 'ग्रीन पार्क एस्टेट' वाली हवेली में।"'पल्लवी का घर' सुनते ही कबीर की धड़कन एक सेकंड के लिए रुक गई।"क्या हुआ है उसे?" कबीर ने फोन को कसकर मुट्ठी में भींच लिया।"कल दोपहर से उसने खुद को कमरे में बंद कर रखा है कबीर! न उसने कुछ खाया है, न पीया है, और न ही कोई आवाज़ दे रही है। उसके मम्मी-पापा बहुत डरे हुए हैं। तू जल्दी आजा भाई!" रोहन की बात सुनकर कबीर का खून जैसे जम गया।"मैं अभी आ रहा हूँ," कबीर ने फोन काटा।उसने न अपनी शर्ट के बटन ठीक किए, न अपने बिखरे हुए बालों पर कंघी फेरी। वह सीधा बाहर भागा, अपनी पुरानी बुलेट को किक मारी और उसे पूरी रफ्तार के साथ शहर की सड़कों पर दौड़ा दिया। ट्रैफिक को चीरती हुई वह मटमैले रंग की बुलेट किसी भूखे शेर की तरह दहाड़ रही थी। कबीर के सीने में एक अजीब सी दहशत बैठ गई थी।पंद्रह मिनट बाद, वह शोर मचाती हुई बुलेट उस आलीशान 'ग्रीन पार्क एस्टेट' की हवेली के विशाल लोहे के गेट को पार करते हुए सीधे पोर्टिको में जाकर रुकी।कबीर की वह खटारा बुलेट, उसके वे मुड़े हुए शर्ट के स्लीव्स, बिखरे बाल और धूल से सने जूते... उस इटैलियन मार्बल वाले घर में बिल्कुल बेमेल लग रहे थे। लेकिन कबीर की आँखों में जो एक अजीब सा खौफ और फिक्र थी, उसने उस बेमेल होने के फासले को मिटा दिया था।वह तेज़ कदमों से ड्रॉइंग रूम में दाखिल हुआ। सामने रोहन, सुमन और राजेश खड़े थे।"नमस्ते अंकल... नमस्ते आंटी," कबीर ने बहुत ही शांत, लेकिन भारी आवाज़ में कहा। उसकी निगाहें सीढ़ियों की तरफ उठ गईं, जहाँ ऊपर पल्लवी का वह कमरा था।