**भाग दस: हक़ीक़त का सौदा**कमरे की वह भारी खामोशी अब पल्लवी की सिसकियों में टूट रही थी। उसने अपना हाथ कबीर की पहुँच से दूर खींच लिया था और अपनी सूजी हुई, लाल आँखों से उसे घूर रही थी।"मैं नहीं आउंगी नीचे," पल्लवी ने किसी ज़िद्दी बच्ची की तरह अपना सिर हिलाया। उसकी आवाज़ अभी भी कांप रही थी।कबीर ने एक गहरी, थकी हुई सांस छोड़ी। उसने अपनी कमर पर दोनों हाथ रखे और पल्लवी को घूरते हुए पूछा, "और क्यों नहीं जाएगी तू नीचे? नीचे तेरे माँ-बाप की जान सूख रही है तेरी फिक्र में, और तुझे यहाँ ज़िद पकड़नी है?""हाँ, पकड़नी है ज़िद! मैं नहीं जाऊंगी मतलब नहीं जाऊंगी!" पल्लवी ने अपने कांपते हुए निचले होंठ को दांतों तले दबाया। उसका वह आंसुओं से भीगा हुआ, उतरा हुआ और मासूम सा चेहरा देखकर किसी का भी दिल पिघल जाए। उसकी आँखों में एक अजीब सी बेबसी थी, जो कबीर से हारने को तैयार नहीं थी।कबीर को समझ आ गया कि यह 'छोटे दिमाग वाली' लड़की अब सीधे तरीके से नहीं मानने वाली।कबीर ने अपने कदम आगे बढ़ाए। वह पल्लवी के इतने करीब आ गया कि पल्लवी को पीछे हटकर दीवार का सहारा लेना पड़ा। कबीर ने अपना बायां हाथ पल्लवी के सिर के पास दीवार पर टिकाया, थोड़ा नीचे झुका और अपने होंठ पल्लवी के कान के बिल्कुल करीब ले गया।"देख पल्लवी..." कबीर की आवाज़ अब एक खुरदरी फुसफुसाहट में बदल चुकी थी, जिसने पल्लवी की रीढ़ की हड्डी में एक तेज़ सिहरन दौड़ा दी। "सीधे-सीधे अपने पैरों पर चलकर नीचे जा रही है... या फिर मैं कल की तरह तुझे अपनी गोद में उठाकर नीचे लेकर चलूँ? सबके सामने?"'गोद में उठाकर...' यह सुनते ही पल्लवी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे कल का वह वाकया याद आ गया जब कबीर ने उसे अपनी मज़बूत बाहों में उठाया था। उसका चेहरा जो अभी तक सफेद पड़ा था, एकदम से टमाटर की तरह लाल हो गया।"नहीं... नहीं!" पल्लवी घबराहट में हकलाने लगी। उसने कबीर के सीने पर अपने दोनों हाथ रखकर उसे थोड़ा पीछे धकेलने की कोशिश की, लेकिन कबीर टस से मस नहीं हुआ। "तुम पीछे हटो... मुझे... मुझे तुमसे कुछ बात करनी है पहले।"कबीर थोड़ा सीधा हुआ, लेकिन उसकी निगाहें अभी भी पल्लवी के चेहरे पर ही गड़ी थीं। उसने पल्लवी के उस बिखरे हुए हुलिए को ऊपर से नीचे तक देखा—उसके उलझे हुए बाल जो घोंसले की तरह लग रहे थे, सूजी हुई आँखें, और सिकुड़ा हुआ सूट।कबीर के चेहरे पर वह पुराना, बेपरवाह सा अंदाज़ वापस आ गया। उसने एक हल्की सी व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, "ये क्या हुलिया बना रखा है तूने अपना? इतनी प्यारी शक्ल है तेरी, और आज एकदम चुड़ैल लग रही है चुड़ैल! कोई रात को देख ले तो डर के मारे हार्ट अटैक आ जाए उसे।"इस गंभीर माहौल में अचानक खुद को 'चुड़ैल' सुनकर पल्लवी का गुस्सा और भड़क गया। उसने अपनी आंसुओं से भरी आँखों से कबीर के उस धूल से सने चेहरे, उसके बिखरे बालों और ठुड्डी पर जमे हुए खून को देखा।"तुम भी कोई राजकुमार नहीं लग रहे हो!" पल्लवी ने अपनी नाक सिकोड़ते हुए तुरंत पलटवार किया। "पूरे के पूरे बंदर लग रहे हो बंदर! वो भी जंगली वाले!"कबीर को इस जवाब की उम्मीद नहीं थी। उस भारी टेंशन के बीच पल्लवी के मुँह से 'बंदर' सुनकर कबीर को अपनी हंसी छुपानी मुश्किल हो गई, लेकिन उसने जैसे-तैसे अपने चेहरे को सख्त बनाए रखा।"अच्छा? मैं जंगली बंदर लग रहा हूँ? तो फिर क्यों इस जंगली बंदर के लिए कल से भूखी-प्यासी इस कमरे में कैद है?" कबीर ने अपनी भौहें उठाते हुए सीधा निशाना साधा।कबीर का यह सवाल तीर की तरह सीधा निशाने पर लगा। पल्लवी का वह गुस्सा एक पल में गायब हो गया और उसकी जगह उस गहरी तड़प ने ले ली जिसके लिए वह पिछले चौबीस घंटे से रो रही थी। उसने अपनी आँखें सीधा कबीर की आँखों में डाल दीं।"क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती हूँ कबीर," पल्लवी की आवाज़ अब बिल्कुल साफ़ और दृढ़ थी। उसने अपनी मुट्ठियां कस लीं और एक गहरी सांस लेकर अपनी आख़िरी शर्त कबीर के सामने रख दी। "अब तुम बताओ... मेरी बात पर हाँ करोगे या नहीं? मुझे अपनाओगे या नहीं? अगर हाँ कहोगे, तो ही मैं तुम्हारे साथ इस कमरे से नीचे जाऊंगी। नहीं तो... नहीं तो मैं इसी कमरे में भूखी-प्यासी मर जाऊंगी, लेकिन यह चौखट पार नहीं करूंगी!"कबीर का चेहरा फिर से सख्त हो गया। पल्लवी की इस मासूम लेकिन खतरनाक ज़िद ने उसे फिर से उसी दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ से वह कल भाग कर गया था।"पल्लवी..." कबीर ने अपनी आँखें बंद करके एक ठंडी सांस ली। "मैंने तुझे कल भी समझाया था। मेरी और तेरी दुनिया...""मुझे कल की बात नहीं सुननी!" पल्लवी ने उसे बीच में ही टोक दिया। उसकी आँखों में एक अजीब सा पागलपन और प्यार दोनों साथ नाच रहे थे। "मुझे दुनिया से कोई मतलब नहीं है! तुम बताओ कबीर... तुम हाँ कर रहे हो या नहीं? पहले तुम बताओ!"कमरे में एक बार फिर से वह भारी सन्नाटा पसर गया। पल्लवी अपनी आख़िरी उम्मीद के साथ कबीर को देख रही थी, और कबीर... कबीर हकीकत की दीवारों और अपने दिल की आवाज़ के बीच बुरी तरह उलझ चुका था।