**भाग आठ: एक बाप की चेतावनी**कबीर अभी उस आलीशान ड्रॉइंग रूम के बीचों-बीच खड़ा ही था कि हवेली का वह भारी सन्नाटा एक भयंकर गूंज से टूट गया। इससे पहले कि रोहन या सुमन कुछ बोल पाते, पल्लवी के पिता राजेश किसी घायल शेर की तरह आगे बढ़े। उनका चेहरा गुस्से, डर और एक पिता की बेबसी से एकदम सुर्ख लाल हो चुका था।बिना एक पल की देरी किए, राजेश ने अपने दोनों कांपते हुए, लेकिन मज़बूत हाथों से कबीर की उस पुरानी सूती शर्ट का कॉलर पूरी ताकत से जकड़ लिया। उनकी उंगलियों की नसें साफ़ तन गई थीं।"क्या किया है तूने मेरी बच्ची के साथ?" राजेश की आवाज़ में एक रईस का अहंकार नहीं, बल्कि एक तड़पते हुए बाप का खौफनाक गुस्सा था। उनकी लाल आँखें कबीर की आँखों में जैसे छेद कर रही थीं। "कल से उसने अन्न का एक दाना नहीं छुआ है! न वह अपने कमरे से बाहर आ रही है, न एक लफ़्ज़ बोल रही है! अगर मेरी बेटी को एक खरोंच भी आई ना, तो मैं तुझे यहीं जान से मार डालूंगा!"कबीर कुछ जवाब देता, उससे पहले ही हवा को चीरते हुए राजेश का भारी हाथ उठा और पूरी ताकत से कबीर के गाल पर पड़ा— चटाक्! फिर एक और— चटाक्! और बिना रुके एक तीसरा ज़ोरदार थप्पड़।थप्पड़ों की वह आवाज़ उस इटैलियन मार्बल वाले विशाल हॉल में किसी बम के फटने की तरह गूंजी। कबीर का चेहरा झटके से एक तरफ मुड़ गया। उसके निचले होंठ का कोना कट गया और खून की एक पतली सी धार उसकी ठुड्डी तक बह आई। लेकिन कबीर अपनी जगह से एक इंच भी पीछे नहीं हटा। न उसने अपना हाथ उठाया, न ही अपने बचाव में कुछ कहा, और न ही उसकी आँखों में रत्ती भर भी खौफ था। उसने बस चुपचाप वे थप्पड़ अपने चेहरे पर सह लिए, क्योंकि वह जानता था कि इस शारीरिक दर्द के पीछे एक पिता की तड़प है, और कहीं न कहीं पल्लवी के इस हाल का ज़िम्मेदार वह खुद ही है।"अंकल! अंकल प्लीज़ छोड़िए उसे!" रोहन घबराते हुए आगे दौड़ा। उसने राजेश के दोनों हाथों को पकड़कर उन्हें पीछे खींचने की पूरी कोशिश की। "आप ऐसा मत कीजिए अंकल! कम से कम एक बार इस लड़के की बात तो सुन लीजिए। कबीर ने कुछ गलत नहीं किया है!"सुमन भी रोते हुए अपने पति के पास आ गईं और उनके कंधे को पकड़कर उन्हें पीछे की तरफ खींचने लगीं।राजेश की सांसें तेज़ी से चल रही थीं, उनका सीना धौंकनी की तरह ऊपर-नीचे हो रहा था। उन्होंने रोहन को झटक दिया और अपनी कांपती हुई उंगली से ऊपर जाती हुई उन घुमावदार, चौड़ी सीढ़ियों की तरफ इशारा किया, जहाँ पल्लवी के कमरे का वह बंद दरवाज़ा था।"मुझे किसी की कोई बात नहीं सुननी!" राजेश की आवाज़ अब एक ठंडी और खौफनाक धमकी में बदल चुकी थी, जिससे रोहन भी सहम गया। राजेश ने सीधा कबीर की आँखों में देखते हुए कहा, "चुपचाप ऊपर जा... और मेरी बेटी को उस बंद कमरे से बाहर लेकर आ। अगर तू आज पल्लवी को उस दरवाज़े के बाहर नहीं निकाल पाया, तो सुन ले कबीर... मैं तुझे इसी हवेली के फर्श के नीचे ज़िंदा दफना दूंगा। यह एक बाप का वादा है।"कमरे में एक भारी, दमघोंटू सन्नाटा छा गया। रोहन और सुमन की निगाहें कबीर पर टिकी थीं।कबीर ने बहुत ही खामोशी से अपने हाथ की उल्टी तरफ से अपने होंठ से रिसता हुआ खून पोंछा। उसने एक बार राजेश की उन लाल आँखों में देखा, फिर सुमन के आंसुओं को। बिना एक भी शब्द कहे, कबीर मुड़ा और भारी, लेकिन बहुत ही दृढ़ कदमों के साथ उन सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगा।उसके जूतों की आवाज़ सीढ़ियों पर गूंज रही थी। हर एक सीढ़ी चढ़ते हुए कबीर के दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी, क्योंकि वह भली-भांति जानता था कि नीचे खड़े उस गुस्से वाले पिता के थप्पड़ सहना बहुत आसान था, लेकिन उस बंद दरवाज़े के पीछे जो टूटा हुआ दिल और तूफ़ान उसका इंतज़ार कर रहा है, उसका सामना करना इन थप्पड़ों से कहीं ज़्यादा दर्दनाक और भारी होने वाला है।