अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 3 sukhvinder Singh Rai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 3

**भाग तीन: फ़ासले दिलों के**अगले दिन की दोपहर बेहद उमस भरी थी। आसमान में मटमैले बादल डेरा डाले हुए थे, जो बरसने का नाम नहीं ले रहे थे, बस हवा में एक दमघोंटू चिपचिपाहट घोल रहे थे। पल्लवी का मन आज अपनी उस वातानुकूलित आलीशान हवेली में बिल्कुल नहीं लग रहा था। कबीर की एक झलक पाने की वो बेताब तड़प, जो रात भर उसकी आँखों से नींद चुराती रही, अब बर्दाश्त की हदें पार कर चुकी थी। किसी भी बहाने से, बस उसे कबीर को देखना था।पल्लवी ने अपनी सफेद कार निकाली और बिना सोचे-समझे शहर के उस छोर की तरफ बढ़ा दी, जहाँ से 'शिवाजी कॉलोनी' की तंग गलियों की शुरुआत होती थी।कॉलोनी के मुहाने पर कदम रखते ही पल्लवी को अपनी भूल का अहसास होने लगा। चौड़ी और साफ-सुथरी सड़कों पर दौड़ने वाली उसकी लंबी गाड़ी उन संकरी, ऊबड़-खाबड़ और बेतरतीब गलियों में बुरी तरह फंस चुकी थी। दोनों तरफ सब्ज़ी के ठेले, आड़े-तिरछे खड़े रिक्शे और बीच सड़क पर खेलते बच्चे। कार इंच-दर-इंच रेंग रही थी कि तभी अचानक एक ई-रिक्शा ने बिना देखे तेज़ी से कट मारा और पल्लवी की कार के बंपर से रगड़ खाता हुआ निकल गया।घबराहट और उलझन में पल्लवी तुरंत कार का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल आई। वह इस तरह के माहौल की आदी नहीं थी। देखते ही देखते आस-पास के लोग, ठेले वाले और वह रिक्शे वाला वहां जमा हो गए और ज़ोर-ज़ोर से बहस करने लगे। कोई रिक्शे वाले को डांट रहा था, तो कोई पल्लवी की उस बड़ी कार को कोस रहा था। उस भयंकर शोरगुल, उमस भरी गर्मी और दर्जनों अजनबी नज़रों के भारी दबाव ने पल्लवी का दम घोंटना शुरू कर दिया।तभी पीछे से किसी का बेकाबू होता हुआ साइकिल का ठेला तेज़ी से ढलान की तरफ लुढ़का। भीड़ में से किसी ने चिल्लाकर शोर मचाया, "हटो-हटो!"पल्लवी घबराकर पीछे हटने लगी, लेकिन सड़क के किनारे पड़ी एक टूटी हुई ईंट पर उसका डिज़ाइनर सैंडल मुड़ गया। उसके टखने में एक भयंकर मोच आई। इससे पहले कि वह खुद को संभाल पाती, उसका संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया और वह सीधे पीछे की तरफ एक बंद दुकान के लोहे के शटर से जा टकराई। सिर के पिछले हिस्से पर लगी उस तेज़ चोट और मौसम की भयंकर उमस ने एक पल में पल्लवी की आँखों के सामने अँधेरा ला दिया। उसकी नसें सुन्न पड़ गईं और वह वहीं धूल भरी ज़मीन पर बेसुध होकर गिर पड़ी।भीड़ में खलबली मच गई और शोर और ज़्यादा बढ़ गया।वहाँ से कुछ ही मीटर दूर, नुक्कड़ की चाय की दुकान पर बैठा कबीर अपने दोस्तों के साथ कटिंग चाय पी रहा था। उस संकरी गली में सफेद कार और जमा होती भीड़ देखकर उसे अंदाज़ा हो गया था कि कोई नया बखेड़ा खड़ा हुआ है। लेकिन जैसे ही उसकी तेज़ नज़रों ने भीड़ के बीच ज़मीन पर पड़े उस हल्के नीले रंग के दुपट्टे को पहचाना, उसके हाथ से चाय का गिलास छूटकर सीधे फर्श पर जा गिरा। कांच के टूटने की आवाज़ के साथ ही कबीर वहां से किसी चीते की फुर्ती से भागा।"ओए हटो! पीछे हटो सब!" कबीर की वह भारी और दहाड़ती हुई आवाज़ सुनते ही भीड़ दो हिस्सों में बंट गई।सामने धूल भरी ज़मीन पर पल्लवी बेहोश पड़ी थी। उसके माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें उभर आई थीं और चेहरा एकदम पीला पड़ चुका था। कबीर का वह हमेशा शांत और बेपरवाह रहने वाला चेहरा पहली बार खौफ से तन गया। उसने एक पल भी नहीं गंवाया, और न ही आस-पास खड़े उन दर्जनों फुसफुसाते लोगों की परवाह की।कबीर घुटनों के बल नीचे बैठा। उसने अपना एक मज़बूत हाथ पल्लवी की पीठ के पीछे डाला और दूसरा उसके घुटनों के नीचे। अगले ही सेकंड, उसने पल्लवी को अपनी बाहों में इस तरह उठा लिया जैसे वह कोई नाज़ुक कांच की गुड़िया हो।पल्लवी का बेजान सिर लुढ़क कर सीधे कबीर के चौड़े सीने से जा टिका। उसके रेशमी बाल कबीर की सादी सूती शर्ट पर बिखर गए। उस धूल भरी सड़क, लोगों की उन घूरती नज़रों और पसीने वाली गर्मी के बीच, कबीर पल्लवी को अपनी बाहों में थामे तेज़ कदमों से अपने घर की तरफ बढ़ने लगा। पल्लवी के उस महंगे परफ्यूम की खुशबू कबीर की उस कच्ची बस्ती की हवा में एक अजीब सा कंट्रास्ट पैदा कर रही थी।कबीर ने अपने घर का पुराना लकड़ी का दरवाज़ा पैर से धक्का देकर खोला और अंदर दाखिल हुआ। कमरे में हल्का अँधेरा था। उसने बेहद सावधानी से पल्लवी को अपने उस पुराने, सूती चादर वाले तख्त पर लिटा दिया। कबीर के जो मज़बूत हाथ लोहे का भारी-से-भारी काम करते हुए कभी नहीं कांपते थे, आज पल्लवी के सिर के नीचे तकिया लगाते हुए हल्के से कांप रहे थे।उसने तुरंत कोने में रखा वह भारी कूलर पल्लवी की तरफ घुमाया और उसे पूरी स्पीड पर चालू कर दिया। कूलर की ठंडी, पानी की महक वाली हवा पूरे कमरे में फैलने लगी। कबीर ने फुर्ती से रसोई से ठंडे पानी का एक जग लिया और एक साफ तौलिया भिगोकर पल्लवी के माथे और चेहरे को हल्के-हल्के थपथपाने लगा।लगभग दस मिनट बाद, कूलर की उस ठंडी हवा और पानी की बूंदों ने अपना असर दिखाया।पल्लवी की पलकों में हल्की सी हलचल हुई। उसने बहुत धीरे से अपनी आँखें खोलीं। सबसे पहले उसे उस खड़खड़ाते हुए भारी कूलर की आवाज़ सुनाई दी। फिर उसकी नज़रों ने उस कमरे का जायजा लिया—बिना पेंट की हुई खुरदरी दीवारें, कोने में खूंटी पर टंगी कबीर की शर्ट, और वह सादी सूती चादर जिस पर वह लेटी थी। यह उसकी दुनिया बिल्कुल नहीं थी। यहाँ मखमल का नामोनिशान नहीं था, यहाँ एक अलग ही किस्म की सादगी और सुकून की महक थी।और फिर, उसकी नज़रे अपने बिल्कुल बगल में बैठे उस शख्स पर जाकर टिक गईं।कबीर तख्त के किनारे बैठा हुआ था। उसके चेहरे पर पसीना चमक रहा था, उसकी शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले थे और उसकी आँखों में जो गहरी चिंता थी, वह पल्लवी ने पहले कभी नहीं देखी थी।"ये... मैं कहाँ हूँ?" पल्लवी की आवाज़ किसी सूखे पत्ते की तरह बहुत धीमी और कांपती हुई निकली। उसने उठने का प्रयास किया, लेकिन सिर के तेज़ दर्द ने उसे वापस पीछे खींच लिया।"चुपचाप लेटी रह। ज़्यादा हीरोइन बनने की ज़रूरत नहीं है," कबीर ने तुरंत अपना हाथ बढ़ाकर पल्लवी के कंधे को वापस तख्त पर टिका दिया। उसकी आवाज़ में वही पुरानी सख्ती थी, लेकिन इस बार उसमें एक गहरा अधिकार और फिक्र छुपी थी।"शिवाजी कॉलोनी में इतनी बड़ी गाड़ी चलाने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती क्या? उस सँकरी गली में क्या करने आई थी?" कबीर ने गीला तौलिया वापस पानी में डुबोते हुए, उसे घूर कर पूछा।पल्लवी के पास कोई जवाब नहीं था। वह कबीर को भला क्या बताती कि वह उस सँकरी, धूल भरी गली में सिर्फ उसकी एक झलक ढूंढने आई थी?उसने अपनी आँखें घुमाकर चारों तरफ देखा। उसे पूरी तरह समझ आ गया कि वह कबीर के घर में, कबीर के ही बिस्तर पर लेटी है। यह अहसास ही उसके सुन्न पड़े शरीर में एक नई ऊर्जा दौड़ाने के लिए काफी था। जिस इंसान के बारे में सोचकर वह अपनी रातों की नींदें उड़ा रही थी, आज वह उसी के कमरे में थी। उस कमरे में कोई एसी नहीं था, कोई इटैलियन फर्श नहीं था, लेकिन पल्लवी को अपनी उस करोड़ों की आलीशान हवेली से ज़्यादा सुकून इस पुराने, खड़खड़ाते कूलर की हवा और इस खुरदरे तख्त पर मिल रहा था, क्योंकि कबीर उसके बिल्कुल करीब बैठा था।कबीर ने उस गीले तौलिए को दोबारा निचोड़ा और बहुत ही नरमी से पल्लवी के माथे पर रख दिया।"डॉक्टर को बुलाऊं? या तेरी उस बड़ी सी गाड़ी वाले ड्राइवर को फोन लगाऊं?" कबीर ने अपनी आँखें सिकोड़ते हुए पूछा।पल्लवी ने धीरे से अपना सिर 'ना' में हिला दिया। उसने बहुत हिम्मत जुटाकर अपना बायां हाथ उठाया और कबीर की कलाई को अपनी कांपती हुई उंगलियों से जकड़ लिया।"मुझे... मुझे बस कुछ देर यहीं रहने दो," पल्लवी की आँखों में वह नमी और बेशुमार प्यार इतनी गहराई से छलक रहा था कि कबीर, जो हर बात का जवाब तुरंत हाज़िर-जवाबी से देता था, इस बार पूरी तरह खामोश हो गया।तभी बाहर आसमान के बादल आख़िरकार फट पड़े और टीन की छत पर बारिश की भारी बूंदों की आवाज़ गूंजने लगी। उस शांत कमरे में अब सिर्फ कूलर की सरसराहट थी और पल्लवी की कलाई पर टिकी कबीर की वह खामोश नज़रे थीं, जो अब शायद उस बिना कहे प्यार की भाषा को धीरे-धीरे पढ़ने लगी थीं।