अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 12 sukhvinder Singh Rai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी मोहब्बत: दो दुनिया - भाग 12

**भाग बारह: आंसुओं का सैलाब और टूटी उम्मीद**हवेली के उस आलीशान कमरे में छाई वह खौफनाक, अजीब सी खामोशी आख़िरकार टूट ही गई। दीवार के उस सूने कोने को एकटक घूरती पल्लवी की आँखों में अचानक जैसे चेतना लौट आई। कबीर के जाने का वह कड़वा एहसास और दिल के पूरी तरह टूटने का दर्द अब उसके पूरे वजूद पर हावी हो चुका था।"मॉम..." पल्लवी के सूखे होठों से एक बहुत ही बेजान और दर्दभरी चीख निकली।अगले ही पल, पल्लवी बिस्तर से लगभग घिसटती हुई आगे बढ़ी और सामने बैठी अपनी माँ सुमन के गले से जाकर बुरी तरह चिपक गई। उसने सुमन को इतनी सख्ती से भींच लिया मानो अगर वह आज अपनी माँ को नहीं पकड़ेगी, तो उसका वजूद इसी कमरे के फर्श पर बिखर जाएगा। चौबीस घंटे से रुका हुआ वह आँसुओं का सैलाब अब पूरी रफ्तार से पल्लवी की आँखों से बह निकला। वह सुमन की छाती में अपना मुंह छुपाकर किसी छोटे बच्चे की तरह बिलख-बिलख कर रोने लगी। उसकी पूरी पीठ सुबकियों के मारे बुरी तरह कांप रही थी।"मॉम... मॉम मैंने कबीर से बहुत सच्चा प्यार किया था... अपनी जान से भी ज़्यादा किया था मॉम!" पल्लवी की आवाज़ आंसुओं के बीच घुट रही थी, लफ़्ज़ साफ़ बाहर भी नहीं आ पा रहे थे। "लेकिन... लेकिन वह मुझसे प्यार नहीं करता। उसने मेरे मुंह पर कह दिया कि मेरी दुनिया अलग है। उसने मेरे प्यार को रईसों का नाटक कह दिया मॉम!"सुमन का अपना कलेजा इस मंज़र को देखकर फटा जा रहा था। उन्होंने पल्लवी के बिखरे हुए बालों को सहलाया और उसे चूमते हुए खुद भी रोने लगीं। "रो मत मेरी बच्ची... शांत हो जा। देख हम हैं न तेरे पास।"राजेश और रोहन भी बिस्तर के पास ही खड़े थे। पल्लवी को इस कदर टूटकर रोते देख राजेश की आँखें भी भर आईं। जो पिता कुछ देर पहले गुस्से में कबीर को दफनाने की बात कर रहा था, आज अपनी इकलौती बेटी की यह हालत देखकर अंदर तक टूट चुका था।पल्लवी ने रोते-रोते अपना चेहरा सुमन की गोदी से उठाया। उसका चेहरा आंसुओं और पसीने से पूरी तरह भीग चुका था, आँखें सूजकर लाल हो चुकी थीं। उसने रोते हुए अपने पिता राजेश की तरफ देखा, जो बेबसी से खड़े थे। पल्लवी ने अपने कांपते हाथों से अपने गालों को पोंछा, उसकी आवाज़ में अब रोने के साथ-साथ एक अजीब सा खालीपन और गहरा दर्द था।"डैड... मुझे... मुझे अपनी इस दौलत पर, इस रईसी पर कमांडो..." पल्लवी की आवाज़ भारी हो गई, "मुझे नफरत हो गई है इस महल जैसी हवेली से! कबीर कहता है कि मेरी यह दौलत, यह अमीरी ही हमारे बीच की सबसे बड़ी दीवार है। अगर यह अमीरी मुझे कबीर का साथ नहीं दे सकती... तो मुझे नहीं चाहिए यह करोड़ों का रुतबा! मुझे इस दौलत से नफरत है डैड... नफरत है मुझे!"इतना कहते-कहते पल्लवी की सांसें फिर से उखड़ने लगीं। दुख, मानसिक तनाव और पिछले चौबीस घंटे से भूखे रहने के कारण उसका शरीर इस भारी इमोशनल लोड को संभाल नहीं पाया। कबीर के दिए उस गहरे ज़ख्म को बयां करते-करते पल्लवी का सिर अचानक भारी हुआ और वह अपनी माँ सुमन की गोद में ही दोबारा बेहोश होकर ढह गई।"पल्लवी! पल्लवी आँखें खोलो बेटा!" सुमन पागलों की तरह चिल्लाने लगीं।"रोहन! तुरंत डॉक्टर मल्होत्रा को फोन लगाओ! कहो अभी इसी वक़्त हवेली पहुँचें!" राजेश ने पूरी ताकत से चिल्लाकर रोहन से कहा, और खुद आगे बढ़कर पल्लवी के हाथ-पैर सहलाने लगे।हवेली के अंदर जहाँ एक तरफ पल्लवी के जीवन को बचाने की जद्दोजहद शुरू हो चुकी थी, वहीं दूसरी तरफ कबीर की वह आख़िरी बात— *'ये दौलत कुछ ऐसी हकीकतें छुपा सकती है जो आप देखना नहीं चाहेंगे'* —राजेश के दिमाग में किसी तेज़ काँटे की तरह चुभ रही थी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कबीर का इशारा किस तरफ था, पर एक बात साफ़ थी कि इस अधूरी दास्तान में सस्पेंस की एक ऐसी परत जुड़ चुकी थी, जो इस पूरे खानदान की नींव हिलाने वाली थी।