कहानी: आलसी चीकू
चीकू 14 साल का था। देखने में गोल-मटोल और स्वभाव में बहुत आलसी। सुबह देर से उठना, स्कूल से आकर बैग एक तरफ फेंकना, और फिर पूरे दिन फोन में घुस जाना। रील्स बनाना, गेम खेलना यही उसका काम था। घर के किसी काम में हाथ नहीं बटाता। मम्मी सरिता रोज डांटती, समझाती, पर चीकू पर कोई असर नहीं होता।
आलस के साथ-साथ चीकू का वजन भी बहुत बढ़ गया था। सीढ़ियां चढ़ते ही हांफ जाता। टीचर भी शिकायत करतीं कि होमवर्क पूरा नहीं करता। सरिता बहुत परेशान थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि बेटे की फोन की लत और आलस कैसे छुड़ाए।
एक दिन उनके शहर में एक संत आए। बहुत शांत और तेजस्वी व्यक्तित्व था उनका। सरिता उनके पास गई और रोते हुए अपनी सारी परेशानी बता दी। संत ने ध्यान से सुना और मुस्कुराकर बोले - "बहन, बच्चे को बदलना है तो डांट से नहीं, अनुशासन से बदलो। कल संध्या को उसे मेरे पास लेकर आना।"
अगले दिन सरिता चीकू को लेकर आश्रम पहुंची। आश्रम बहुत सुंदर था। चारों तरफ पौधे, साफ-सफाई करते बच्चे। माहौल में शांति थी। चीकू ने पहली बार इतनी शांति महसूस की।
संत ने चीकू के सिर पर हाथ फेरकर पूछा - "बेटा, क्या तुम अपनी मम्मी को खुश देखना चाहते हो? क्या तुम खुद को बदलना चाहते हो?"
चीकू ने धीरे से हां में सिर हिलाया।
संत बोले - "ठीक है। मैं तुम्हें एक काम देता हूं। ये एक छोटा पौधा लो। शहर से 2 km दूर हनुमान मंदिर है। तुम्हें रोज सुबह 6 बजे से पहले वहां जाकर दीपक जलाना है। फिर घर आकर पूरे घर की सफाई करनी है और इस पौधे में पानी देना है। ये काम लगातार 30 दिन करना है। चाहे धूप हो, बरसात हो या सर्दी। एक दिन भी नागा नहीं होना चाहिए।"
चीकू को लगा ये तो आसान है। उसने तुरंत हां कर दी।
अगली सुबह 4 बजे अलार्म बजा। चीकू की नींद टूटी। मन हुआ फिर सो जाए, पर संत की बात याद आ गई। वो उठा, नहाया और अंधेरे में ही मंदिर की तरफ निकल पड़ा। 6 बजे से 5 मिनट पहले उसने दीपक जला दिया। लौटकर घर की सफाई की और पौधे में पानी दिया। उस दिन उसे बहुत अच्छा लगा।
पहले हफ्ते बहुत मुश्किल हुई। पैर दुखते, नींद आती। पर चीकू ने सोचा "बस 30 दिन की बात है"। धीरे-धीरे रोज 4 km पैदल चलना उसकी आदत बन गया। घर की सफाई करने से शरीर में फुर्ती आई। फोन से ध्यान हटकर पौधे पर जाने लगा।
15 दिन बाद चीकू का वजन 2 किलो कम हो गया। मम्मी उसे देखकर खुश होने लगी। मोहल्ले वाले भी पूछने लगे "चीकू इतना एक्टिव कैसे हो गया?" चीकू अब गर्व से बताता कि वो रोज मंदिर जाता है।
30वें दिन चीकू पौधे के साथ संत के पास गया। वो पौधा अब काफी बड़ा हो चुका था। संत ने कहा - "देखा बेटा, अनुशासन से क्या नहीं होता। तुमने सिर्फ एक नियम निभाया और तुम्हारा शरीर, मन और घर तीनों बदल गए।"
चीकू की आंखें भर आईं। उसने कहा - "गुरुदेव, मुझे आज समझ आया कि आलस इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है। आपने मुझे नई जिंदगी दी है।"
उस दिन के बाद चीकू पूरी तरह बदल गया। वो अब सुबह 5 बजे उठता, पढ़ाई करता, मम्मी का हाथ बटाता और शाम को बच्चों को खेलने के लिए मैदान ले जाता।
सीख: जीवन में अनुशासन सबसे बड़ी ताकत है। रोज थोड़ा परिश्रम, थोड़ी मेहनत इंसान को कहां से कहां पहुंचा देती है। आलस छोड़ो, सफलता खुद चलकर आएगी।
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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली