और अब ... विदाई की घड़ी
यह वो समां होता है जिसमें खुशी भी होती है और दुख भी।
हर आंख नम हो जाती है जब बेटी विदा होती है ।
ये वह पल है जिसे मैं अपने शब्दों में बयां नहीं कर सकती ना इसे समझ सकती हूं और ना ही समझा सकती हूं ।
ये तो वही समझ सकता है या समझा सकता है जिसने अपनी बेटी विदा की है।
जिसने पाल पोस कर अपनी बेटी को बड़ा किया और अपने दिल के टुकड़े को किसी और को सौंप दिया हो।
आज भूमि के माता-पिता की भी वही दसा थी।
बेटी को विदा करने की खुशी और अपने से दूर जाने का गम पर विदा तो करना था।
नम आंखों से दोनों ने अपनी बेटी को विदा कर दिया ।
भूमि विदा हो गई और छोड़ गई --पिता के आंगन में अपना बचपन और अल्हड़पन ।
मां की गोद में अपनी अठखेलियां , कुछ शरारतें और एक सुनापन। और साथ ले गई__अपनी बचपन की यादें माता-पिता का आशीर्वाद और एक डर !
कैसे होंगे वो लोग ?
क्या मैं एडजस्ट कर पाऊंगी क्या वह मुझे समझ पाएंगे ?
मेरी गलतियो के लिए मुझे डाटा जाएगा या मां की तरह समझाया जाएगा ??
भूमि को यु व्यथित देखकर साथ बैठे आकाश ने भूमि के हाथ को अपने हाथों में लेकर कहा __रिलैक्स ! सब ठीक होगा यकीन मानो भूमि तुम्हारी उम्मीद से बेहतर ही मिलेगा तुम्हें ।
भूमि ने कुछ नहीं कहा बस चुपचाप बैठ गई ।
10 मिनट में गाड़ी दूसरे दरवाजे पर थी क्योंकि शादी एक ही रिसॉर्ट से की थी दोनों परिवार ने।
दूसरे गेट पर खुशियों का माहौल था। बैंड बाजे और फुलो के साथ भूमि का स्वागत किया गया।
ये सब देखकर भूमि बहुत खुश थी।
गृह प्रवेश के बाद --
कुछ रीति-रिवाज, रश्मे और शाम को रिसेप्शन की तैयारी।
सब लोग तैयार होने में लगे थे।
कुछ लड़कियां भूमि को तैयार कर रही थी।
आईने के सामने खड़ी भूमि अपने आप को निहार रही थी
क्या ये मैं हूं ??
कितनी बदल गई हु मैं इन दो दिनों में --हाथों में भरी-भरी चूड़ियां , मांग में सिंदूर गले में मंगलसूत्र और चेहरे की ये खुशी !
भूमि को यकीन ही नहीं हो रहा था उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसके जीवन में भी इतनी खुशी आएगी।
जिंदगी की इस रंगीनियों में भूमि के अतीत का वो काला धब्बा कब और कहां छुप गया उसे पता ही नहीं चला।
तभी मीरा कमरे में प्रवेश करती है और कहती हैं --चलिए देवरानी जी देवर जी बहुत बेताब हो रहे हैं।
भुमि अपने ख्यालों से बाहर निकलती है ।
मीरा जैसे ही भूमि को देखती हैं, देखते ही कहती हैं --बहुत सुंदर लग रही हो किसी कि नजर ना लग जाए आओ तुम्हें काला टीका लगा दुं।
और काला टीका लगाकर बाहर ले आती है।
आकाश दरवाजे पर खड़ा भुमि की प्रतीक्षा कर रहा था ।
जब भूमि को आते देखा तो देखते ही रह गया सचमुच कितनी खूबसूरत है भुमि किसी अप्सरा से कम नहीं ।
तभी मीरा शरारती अंदाज में बोली --चलिए देवर जी सब लोग इंतजार कर रहे हैं भूमि को निहारने के लिए पूरी रात पड़ी है।
भुमि शर्म से नजरें झुका लेती है और आकाश मुस्कुराते हुए भूमि का हाथ पकड़कर स्टेज की ओर चल देता है।
रात का 1:00 बज रहा था --
सब लोग विश्राम के लिए अपने -अपने कमरों में चले गए थे।
सभी कमरों के बीचोंबीच था आकाश और भूमि का कमरा जिसे विशेष रूप से सजाया गया था। और उस पर लटकी हुई थी एक "do not disturb " की keychain !!
मीरा भूमि को कमरे में ले आती है और कहती है --तुम आराम करो देवर जी आते ही होंगे । और जाते-जाते शरारती अंदाज में कहती है--""enjoy your golden night""
करीब रात 1:30 बजे__
आकाश कमरे में प्रवेश करता है।
भूमि पलंग पर लेटी थी शायद उसकी झपकी लग गई थी। आकाश पलंग के पास खड़ा भूमि को निहारता है--
कितनी सलीनता और सच्चाई नजर आती है भूमि के चेहरे पर मुझे अपनी किस्मत पर गर्व है कि मुझे भूमि जैसी लाइफ पार्टनर मीली।
फिर पलंग के पास आकर बैठ जाता है और भूमि के माथे को चुमता है।
भूमि अचानक से चिल्लाते हुए उठतीं है.कौन है? डर के मारे उसका शरीर कांपने लगता है।
आकाश जल्दी से भूमि के मुंह पर हाथ रखता है और कहता है --अरे बाबा धीरे बोलो मैं हूं आकाश !!
भूमि शांत हो जाती है और आकाश तुरंत ही उसके मुंह से अपना हाथ हटा लेता और पुछता है --क्या हुआ भूमि तुम ठीक हो ना ?
भूमि बोली --हां
तो फिर इतनी जोर से चिल्लाई क्यों थी। डर गई थी क्या?
भुमि बोली -शायद हां
अरे इसमें डरने की क्या बात थी यह हमारा कमरा है और यहां मेरे अलावा कोई नहीं आता। मुझे पता है कि तुम कभी अकेली नहीं रही हो इसलिए तो सबके बीचो-बीचअपना कमरा लिया है मैंने।
और इतनी जोर से चिल्लाई तुम अच्छा हुआ किसी ने सुना नही नहीं तो अभी सब लोग मेरी क्लास लगा देते।
अब भूमि के चेहरे पर मुस्कुराहट थी।
थैंक गॉड तुम मुस्कुराई तो।
थक गई होगी ना तुम सोना चाहती हो या फिर हम कुछ देर बात कर सकते हैं।
भूमि मुस्कुराते हुए बोली -नहीं हम बात कर सकते हैं और शर्म से अपनी निगाहें झुका लेती है।
फिर शुरू होता है बातों का सिलसिला ।
बातों ही बातों में आकाश दुबारा से भूमि के माथे को चूमता है और उसे अपनी बाहों ले लेता है।
भूमि थोड़ा सा असहज महसूस करती है और फिर रिलैक्स हो जाती है और अपने आप को पूरी तरह समर्पित कर देती है आकाश की बाहों में !
कितना सुखद लग रहा था सब कुछ आकाश की बाहों में लिपटी भुमि --कोई शब्द नहीं थे उसके पास इस पल को बयां करने के लिए।
निःशब्द हो गई थी वो उसकी कल्पना से पारे था सब कुछ ।
उसे जो आनंद की अनुभूति हो रही थी उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था सिर्फ महसूस किया जा सकता था ।
और फिर --
आकाश ने जैसे ही अपने होठों को भूमि के होठों पर रखा अचानक से मोबाइल की रिंग बज जाती है..
आकाश ध्यान नहीं देता पर...