कहानी: एनिवर्सरी एक नई शुरुआत
"सुनो! कल हमारी एनीवर्सरी है। क्या गिफ्ट दोगे मुझे।" खुशी ने चहकते हुए अपने पति से पूछा। उसके पति गर्वित को ऑफिस के लिए लेट हो रहा था। वो चिल्लाते हुए बोला - "क्या हमेशा बच्चों वाली बातें करती रहती हो। कैसी एनीवर्सरी? ये सब अमीरों के चोचले हैं। हम मिडिल क्लास वाले तो महीने का खर्च भी बड़ी मुश्किल से निकाल पाते हैं। पढ़ी-लिखी हो पैसा कमाने के बारे में सोचो। मुझे देर हो रही है। शाम को मिलते हैं।" ऐसा कहकर गर्वित ऑफिस चला जाता है।
खुशी का 12 वर्षीय बेटा भी स्कूल जा चुका था। उसका मूड ऑफ हो चुका था पति की बात सुनकर। रसोई बिखरी पड़ी थी, पर उसका मन नहीं था समेटने का। वो सीधे बेडरूम में जाती है और रोने लगती है। सोचती है गर्वित से उम्मीद करना ही बेकार है।
शादी को तेरह साल हो गए। अभी तक एक भी एनीवर्सरी अच्छे से नहीं मनाई। हर बार एनीवर्सरी के दिन ही झगड़ा कर लेता है और मेरा मूड भी ऑफ कर देता है। कैसा सनकी पति है। खुश होना तो आता ही नहीं। पिछली बार गर्वित का मूड ठीक था, उसने झगड़ा नहीं किया। लेकिन पूरे दिन पानी नहीं आया। पूरे दिन घर बिखरा पड़ा रहा। बिना नहाए, बिना पूजा किए क्या एनीवर्सरी मनाती। एक बार मूड अच्छा था तो रात को ही केक ले आए और सुबह जल्दी-जल्दी में केक काटा, एक सेल्फी ली और चले गए ऑफिस।
लो जी हो गई एनीवर्सरी। अरे ऐसे थोड़े ही होता है। कितना बोरिंग पति है मेरा। ऐसी बात नहीं कि गर्वित खुशी को प्यार नहीं करता। प्यार तो करता है जताने से डरता है। हर छोटी-छोटी बात का ध्यान रखता है। बस अधिक संस्कारी है, खुश होना नहीं आता। उसे ये सब बातें बचकानी लगती हैं। लेकिन गर्वित की भी तो कोई गलती नहीं है। इतनी महंगाई में दिल्ली के खर्चे जान ले लेते हैं। घर का किराया, बिजली का बिल, बच्चे की फीस, कार की ईएमआई और घर का राशन। इन सब में ही सारी सैलरी कब खत्म हो जाती है। पता ही नहीं चलता।
मैं दूसरों की तरह एनीवर्सरी मनाना ही क्यों चाहती हूं। उसकी सारी दोस्त, भाभियां, बहन सब एनीवर्सरी पर केक काटते हैं, पार्टी करते हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट करके हम जैसों का दिल भी जलाते हैं। रील और रियल जिंदगी में काफी फर्क होता है। जरूरी नहीं जो रील में खुश नजर आ रहे हैं वो सच में अपनी जिंदगी में भी खुश हों। फोन की वजह से अपना दिन क्यों खराब करना।
अब खुशी का मूड ठीक हो चुका था। वो एक दार्शनिक की तरह गम्भीर हो गई। और एक कप कॉफी बनाकर अपनी बालकनी में पौधों के पास जाकर बैठ गई। और आसमान को निहारने लगी और सोचने लगी। ऐसी फीकी खुशी तो मुझे भी नहीं चाहिए। बस आधे घंटे में केक काटो, फोटो खींचो और हो गई एनीवर्सरी। नए कपड़े खरीदो तो भी बस दस मिनट की खुशी ही रहती है। नया-नया जोश तभी तक रहता है। नए कपड़े पहनो, फोटो खींचो, अपनी बहन को दिखाओ, वीडियो कॉल करके और जरा सी तारीफ के बाद फिर वही वैसा। कहीं होटल में खाना खाने जाओ तो बस तीन-चार घंटे की खुशी। फिर सारा दिन सामान्य ।कहीं बाहर घूमने जाओ तो महीने का बजट गड़बड़। ट्रिप पर झगड़ा और घर आकर दो दिन तक पछतावा और थकान।आखिर मैं चाहती क्या हूं, असली खुशी क्या है?
खुशी थोड़ी देर पौधों को देखती है। एक विचार कौंधता है दिमाग में, वो सहसा अपनी गुल्लक तोड़ती है और देखती है कितनी बचत की है उसने एक साल में।वो मुस्कराकर उठती है। कॉफी का कप रसोई में रख। स्कूटी की चाबी उठा अपने बेटे को स्कूल से लेने जाती है।
शाम को जब गर्वित आता है तो वो शांत रहती है। ना कोई खुशी, ना गुस्से का भाव, ना एनीवर्सरी की बातें। गर्वित भी चुप रहने में समझदारी समझता है।
अगली सुबह खुशी चहकते हुए उठती है। गर्वित को एनीवर्सरी विश करती है और अपने दैनिक काम पर लग जाती है। बेटे के स्कूल जाने के बाद मंदिर जाती है गर्वित के साथ और घर आकर खुशी-खुशी गर्वित का टिफिन पैक कर देती है और उसे ऑफिस भेजती है।
उसे समझ आ गया था असली खुशी क्या है।
दोनों के जाने के बाद वो बहुत सारी पूरी-सब्जी बनाती है और खाने के 50 डिब्बे पैक कर लेती है। जब अपने बेटे को लेने जाती है तो सारा खाना साथ ले जाती है। अपने बेटे के साथ आते हुए उन डिब्बों को फुटपाथ पर बैठे गरीबों में बांट देती है।
शाम को एक केक लेकर और कुछ समोसे, फल लेकर अपनी दोस्त के कोचिंग जाती है। वहां बच्चों के साथ केक काटकर अपनी एनीवर्सरी मनाती है। उसकी दोस्त भी हंसते हुए कहती है "खुशी तो एनीवर्सरी भी अकेले ही मनाती है।"
खुशी कहती है "अरे अकेले कहां - आप सबके साथ, बच्चों के साथ, इन सबकी दुआओं के साथ मनाया है ना। आज का दिन सच में बहुत खूबसूरत रहा। मैं सच में बहुत खुश हूं। ना कोई सोशल पोस्ट, ना कोई दिखावा। सादगी भरी खुशियों से सजी रही इस बार की एनीवर्सरी।"
खुशी जब अपने बेटे के साथ घर पहुंचती है तो गर्वित को घर पर देख चकित रह जाती है। उसने भी केक और लाइट से एनीवर्सरी मनाने की तैयारी कर रखी है। खुशी का बेटा गर्वित को सारी दिन की कहानी सुनाता है तो गर्वित खुशी को देखते हुए कहता है कि - "वाह जी वाह एनीवर्सरी अकेले-अकेले मना ली। अब तो हमारी कोई जरूरत ही नहीं है।"
खुशी हंसते हुए कहती है - "नहीं, नहीं ऐसा नहीं है। तुम सारा दिन व्यस्त रहते हो तो मैंने सोचा -........."
"चलो अब कोई क्लेश नहीं करते, आओ केक काटते हैं। बहुत हो चुके लड़ाई-झगड़े, गिले-शिकवे। आओ अब नई शुरुआत करते हैं।"
तीनों एक साथ केक काटते हैं और एक गुणवत्तापूर्ण सार्थक समय एक साथ जीते हैं। खुशी गर्वित को अपनी स्वलिखित कविता सुनाती है
आओ एक नई शुरुआत करते हैं
आओ नई शुरुआत करते हैं
एक कप चाय के साथ
फिर कोई नई बात करते हैं
कब तक यूं ही लड़ते रहेंगे
गिले-शिकवे आपस में करते रहेंगे
छोड़ो अतीत के पन्ने , आओ
फिर से कोई नई कहानी लिखते हैं
आओ नई शुरुआत करते हैं
कुछ तुम बदलो अपनी आदत
थोड़ा हम भी बदलते हैं
कुछ तुम सुनो मेरी
थोड़ा हम भी तुम्हें सुनते हैं
बीत गई सो बीत गई
पुरानी बातों से नहीं
अपना मूड खराब करते हैं
मोहब्बत तुमको भी है
मोहब्बत हमको भी है
फिर क्यों ये रिश्ता खराब करते हैं
तुम शब्द मैं अर्थ
तुम गीत मैं स्वर
तुम बिन मैं व्यर्थ
तुम बढ़ो एक कदम
हम भी साथ चलते हैं
चाह हो निभाने की
तभी रिश्ते दूर तक चलते हैं
आओ नई शुरुआत करते हैं
फिर नई मुलाकात करते हैं।
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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली