कहानी: नियति का खेल
रविवार का दिन था। सीमा फोन में फेसबुक पर अपनी कविता पर आई पाठकों की प्रतिक्रिया पढ़ रही थी। तभी उसकी नजर एक नाम पर रुक गई। रिद्धि ने उसकी कविता पर प्रतिक्रिया दी थी - "आपकी कविता आपकी तरह ही निश्चल है, मासूम है।" सीमा को लगा ये कहीं वही रिद्धि तो नहीं जो कॉलेज में उसकी छात्रा थी क्योंकि इतनी गहराई से तो उसे वो ही जानती थी।
सीमा कॉलेज की यादों में पहुंच जाती है।
रिद्धि एक भोली सी प्यारी सी लड़की, एम.ए में पहली बार जब वो हिंदी क्लास लेने आई थी। क्लास में जहां अन्य सभी लड़कियां पढ़ने कम फैशन दिखाने ज्यादा आती हैं वहीं प्यारी सी रिद्धि सादगी से भरी साधारण से सूट-सलवार में भी प्यारी लग रही थी।
रिद्धि को कविता लिखना अच्छा लगता। अपनी पहली कविता मुझे ही सुनाती। मैं बस इतना कह पाती "अरे वाह बहुत बढ़िया" और वो दोगुनी खुशी से पढ़ने-लिखने में जुट जाती। कहती - "मैम आपका 'अरे वाह' कहना ही मेरे लिए बहुत बड़ा पुरस्कार है।"
सीमा का भाई विवेक भी उसी विद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाता था। विवेक की ज्ञान भरी बातें और पढ़ाने के तरीके से रिद्धि इतना प्रभावित हुई कि वो उसे धीरे-धीरे पसन्द करने लगी। विवेक का आकर्षक व्यक्तित्व और मधुर व्यवहार, छात्रों को सम्मान देना, उसे बहुत भाया। उसने कभी बताया नहीं लेकिन सीमा को मनोविज्ञान की अच्छी समझ थी। वो चेहरा देखकर ही सामने वाले के भाव पढ़ लेती।
रिद्धि शोध-पत्र लिखने के बहाने सीमा के घर आने लगी। सीमा उसकी हर संभव सहायता करती। रिद्धि बहुत सी सुशील, संस्कारी और मृदुभाषी थी। सीमा के घर सभी उसे पसंद करते। कभी-कभी वो सीमा की माँ की भी गृहकार्यों में सहायता कर देती। कभी गरमागरम पकौड़े बनाकर खिलाती, कभी कॉफी बना देती। अक्सर विवेक के शोध कार्य में उसकी सहायता भी करती। उसके इसी व्यवहार के कारण घर में सब उसको बहुत पसंद करते।
सीमा भी उससे बहुत प्रभावित थी। वो भी उसे मन ही मन विवेक की दुल्हन बनाना चाहती थी।
एक दिन सीमा को किसी सेमिनार में मुख्य अतिथि बनकर जाना था दिल्ली, विवेक भी उसके साथ जा रहा था। जैसे ही रिद्धि को पता चला वो भी अपना सामान पैक कर पहुंच गई - "मैम मुझे भी आपके साथ चलना है। मेरी मम्मी ने जाने की आज्ञा दे दी है।"
रिद्धि विवेक के साथ घूमने जाना चाहती थी। तीनों सेमिनार के बाद साहित्य अकादमी गए, वहां लाइब्रेरी में दिनभर अनेक पुस्तकें पढ़ते रहे, नई सड़क पुस्तक बाजार गए वहां से सीमा ने कुछ पुस्तकें खरीदीं। दोपहर बाद तीनों चांदनी चौक घूमे वहां की चाट खाई, शॉपिंग की। तीनों ने बहुत अच्छा समय साथ बिताया। शाम को तीनों ने बिरला मंदिर घूमा। एक साथ बहुत से फोटो लिए और खुशी-खुशी तीनों रात को ट्रेन से अपने घर आ गए।
मनुष्य सोचता कुछ है, और होता कुछ है। समय तो निरंतर चलता रहता है, कुछ फैसले नियति करती है, कुछ इंसान संकोच के चलते रास्ता बदल लेते हैं और कहानी बदल जाती है।
सीमा की शादी दिल्ली हो जाती है। उसका अब रिद्धि से मिलना भी बंद हो जाता। विवेक भी रिद्धि को पसंद करता था, लेकिन अपने घर में किसी को बताया ही नहीं। सिर्फ सीमा ही इस प्रेम कहानी के बारे में जानती थी। लेकिन शादी के बाद वो भी अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गई। जब घर में विवेक की शादी की बात चली तो सीमा को भी लड़की देखने के लिए जाना था। सीमा को तब उस समय रिद्धि की याद आई। लेकिन विवेक ने उस लड़की को हाँ कर दिया तो सीमा ने चुप रहना ही उचित समझा। विवेक की शादी कहीं और हो गई। और सब रिद्धि के बारे में भूल ही गए।
आज फिर तेरह साल बाद फेसबुक पर रिद्धि और सीमा की मुलाकात हुई। सीमा ने रिद्धि से उसका मोबाइल नम्बर लिया और शाम को चाय पीते हुए उसे फोन लगाया। रिद्धि सीमा की आवाज सुन बहुत खुश हुई।
रिद्धि ने बताया कि उसकी शादी भी दस साल पहले जयपुर में हो गई थी। वो अब जयपुर में है। उसके दो बच्चे हैं एक बेटा और दूसरी बेटी। वो अपनी गृहस्थी में खुश है और सीमा की कविताओं की बड़ी फैन है। उसने सभी कविताएं पढ़ी हैं।
सीमा रिद्धि से पूछना चाहती थी कि ये सब कब कैसे हुआ। क्या उसे विवेक की याद आती है। लेकिन वो उसकी अतीत की यादों को कुरेदना नहीं चाहती थी।
सीमा रिद्धि की खुशी में खुश थी। वो पुरानी बातें पूछना तो चाहती थी लेकिन चुप रह गई। सीमा ने जल्दी ही रिद्धि से मिलने का वादा किया और फोन रख दिया।
सीमा ने देखा कि आसमान में बिजली कड़क रही है, काले बादल छाए हैं। उसने रिद्धि की यादों से खुद को बाहर निकाला और बालकनी में सूख रहे कपड़े हटाने लगी। नियति का खेल ईश्वर ही जाने।
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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली