ऑनलाइन शॉपिंग Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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ऑनलाइन शॉपिंग

आर्यन के बेटे का दो दिन बाद जन्मदिन था। उसने अपने मम्मी-पापा को गाँव से बुलाने के लिए कहा। उसके पिता सुरेश ने इतनी जल्दी आने में असमर्थता जताते हुए कहा कि मैं अभी स्टेशन गया भी टिकट बुक कराने तो भी नहीं बुक हो पाएगा। और बिना रिजर्वेशन के इस उम्र में मेरी वश की नहीं है। आर्यन चहकते हुए बोला - "बस इतनी सी बात। ये कौन सी बड़ी बात है। मैं अभी फोन से अभी बुक कर देता हूँ। आजकल सब ऑनलाइन होता है। देखो आपके फोन में आ गई हो गई सूचना। हाँ बेटा मिल गया टिकट। ठीक है बेटा आते हैं।"जब आर्यन के माँ-बाप शहर पहुँचते हैं तो देखते हैं कि वहाँ ऊँची-ऊँची इमारतें हैं। एक ही इमारत में अनेक परिवार हैं। फ्लैट के बाहर नेमप्लेट नहीं, फ्लैट नम्बर लिखा हुआ। कोई किसी से बात नहीं करता है। सामने ही सब दरवाजा बंद कर लेते हैं। आर्यन भी अपनी सारी शॉपिंग ऑनलाइन ही करता है। सब्जी मंगानी हो तो ऑनलाइन, दूध मंगाना हो या अखबार मंगाना हो, या कोई बड़ा सामान सब ऑनलाइन ही मंगाता है।सुरेश अपनी बीवी के साथ इस फ्लैट संस्कृति में बोर हो रहा था। एक दिन सुरेश ने अपनी बीवी से कहा - "चलो कहीं पार्क में ही घूमने चलते हैं। यहाँ दीवारों को देख-देखकर तो थक गया हूँ।" दोनों पास के ही पार्क में टहलते हैं। वहाँ और भी जो बुजुर्ग बैठे थे उनसे परिचय बढ़ाते हैं। आते हुए रास्ते से घर के लिए ताजी सब्जियां भी ले आते हैं।उन्हें बाहर आकर सबसे मिलना, बातें करना बहुत अच्छा लगता है। अब ये उनकी रोज दिनचर्या में शामिल हो गया। रोज शाम को पार्क जाते, सब्जी वाले, दूध वाले और चाट वाले से बातें करते। पार्क में अब उनके बहुत से मित्र भी बन गए थे।एक दिन सुरेश अपनी बीवी को साड़ी दिलाने पास के ही दुकान पर गए। दुकान पर ज्यादा भीड़ नहीं थी। दुकानदार उदास बैठा था। सुरेश के पूछने पर दुकानदार ने बताया कि - "क्या बताऊँ भाईसाहब। आजकल धंधा बहुत मंदा हो गया है। आजकल के बच्चे ऑनलाइन शॉपिंग करना पसंद करते हैं। घर से बाहर निकलकर खरीदने की जरूरत नहीं समझते। छोटा सामान हो या बड़ा, इलेक्ट्रॉनिक सामान हो या दवाई सब ऑनलाइन मंगाते हैं। हम जैसे छोटे दुकानदार ग्राहक की बाट जोहते रहते हैं। जिनकी अपनी दुकान है वो तो फिर भी नुकसान को झेल लेते हैं। लेकिन हम कैसे दुकान का किराया निकाले, कैसे घर का खर्च चलाएं। ये ऑनलाइन बाजार तो हम सबका व्यापार बंद कर देगा।" सुरेश ने दुकानदार की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि - "ठीक कह रहे हो भैया। बाजार में मंदी इसी वजह से है। सारा पैसा ये विदेशी कंपनियां ले जाती हैं। कैश भी बड़ी मुश्किल से दिखाई देता है। सब ऑनलाइन जो होने लगा। पहले रुपया तो पूरे बाजार में घूमता था। मैंने तुम्हें दिया। तुमने किसी और से माल लिया। लेकिन इस ऑनलाइन शॉपिंग ने तो स्थानीय बाजार खत्म ही कर दिया।" सुरेश अपनी बीवी के लिए एक साड़ी लेकर घर आ जाते हैं।कुछ दिनों बाद एक दिन आर्यन का बेटा पार्क से स्केटिंग कर वापस आ रहा था कि सामने वाली गाड़ी ने ठोकर मार दी। सब्जीवाले ने उसे उठाकर अस्पताल पहुँचाया और सुरेश को फोन किया। बच्चे के सिर में चोट लगी थी। खून अधिक बहने से बेहोश हो चुका था। जब उसे खून चढ़ाने के लिए खून की आवश्यकता हुई तो उसी कपड़े वाले ने तुरंत अपना खून देकर बच्चे की जान बचाई। तब तक सुरेश और आर्यन भी आ चुके थे। दोनों ने स्थानीय दुकानदारों का धन्यवाद दिया। जब आर्यन दवाई और इलाज का बिल देने गया उस समय उसके फोन का सर्वर डाउन था। नेट ही नहीं चल रहा था। बिल कैसे भरे। बिना नेट के तो भुगतान हो नहीं सकता। नर्स ने कहा कि नेट नहीं चल रहा तो कैश जमा कर दो। नेट समस्या तो कभी भी हो सकती है। उस समय आर्यन के पास कैश नहीं था। आर्यन बहुत परेशान हुआ। अब क्या करे। सुरेश के पूछने पर उसने बताया कि ऑनलाइन भुगतान नहीं हो पा रहा है। तब सुरेश और सुरेश के मित्र उन्हीं दुकानदारों ने मिल अस्पताल का बिल दिया। आर्यन ने सभी का तहे दिल से शुक्रिया किया और अपने बेटे को लेकर सुरेश के साथ घर वापस आ गया।सुरेश ने अपने बेटे आर्यन को समझाया कि देखो आज वही सब स्थानीय दुकानदार काम आए जिनसे हम रोज सामान लेते थे, अक्सर एक-दूसरे का हाल पूछते थे। वक्त पड़ने पर हमारा समाज, हमारे पड़ोसी ही काम आते हैं। अस्पताल में न तो तुम्हारा मोबाइल काम आया न तुम्हारे आभासी मित्र।इसलिए समय रहते अपनी ऑनलाइन शॉपिंग की आदत बदलो। स्थानीय दुकानदारों से सामान खरीदो। अपने व्यवहार से अपने सच्चे दोस्त बनाओ। दुनिया बहुत सुंदर है। जिंदगी को इस फ्लैट की दीवारों में मत कैद करो। सबसे मिलो बात करो। यही जिंदगी है।समाप्त ---डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली