कैफे वाली मुलाकात Vandna Sharma द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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कैफे वाली मुलाकात

जून की छुट्टियों में मायके जाना हुआ। मायके जाओ और शॉपिंग न करो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। अपनी मम्मी के साथ बाजार में घूम रही थी कि पुरानी मित्र पूजा दिखाई दी। खुशी का ठिकाना नहीं रहा उसे देखकर। हम तीनों पास के कैफे में चले गए बात करने। कॉफी और बचपन की बातें वाह क्या बात है।मेरी मित्र पूजा अपने कॉलेज के दिनों में बहुत स्मार्ट थी। उसके बात करने का तरीका, कपड़े पहनने का तरीका सब लाजवाब था। मिलनसार स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण पूजा की बहुत सारी दोस्त थी। लेकिन उसमें घमण्ड बिल्कुल नहीं था। मैं बहुत सी साधारण सी, किताबों में डूबी रहने वाली, धार्मिक और सरलता से भरी लड़की थी फिर भी वो हमेशा मेरे साथ रही। तेरह साल पहले मेरी शादी हो गई और मैं दिल्ली चली गई। पूजा की शादी यहीं पास के गांव में हुई थी।पूजा के पापा की तबादले वाली नौकरी थी। उसकी पढ़ाई कई शहरों में हुई थी। मसूरी, चण्डीगढ़, गोवा, दमन आदि जगह उसका बचपन बीता। सब बढ़िया चल रहा था लेकिन समय एक सा नहीं रहता। सुख-दुख तो लगे रहते हैं। एक दिन पूजा के पापा की नौकरी छूट गई। और उन्हें यहां अपने पैतृक गांव आकर बसना पड़ा। प्राइवेट नौकरी की कोई गारंटी नहीं होती, कभी भी मालिक निकाल सकता है।पूजा से मेरी दोस्ती स्नातक डिग्री महाविद्यालय में हुई। उसे मेरा कविता लिखना अच्छा लगता था। मैंने उसे भी थोड़ा बहुत कविता लिखना सिखाया। विद्यालय के हर कार्यक्रम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती। अभिनय और गायन में उसका कोई जवाब नहीं था। महिला सशक्तिकरण की बाते करती। कहती - "लड़कियों को अपनी पहचान जरूर बनानी चाहिए और आर्थिक रूप से निर्भर भी होना चाहिए जिससे शादी के बाद अपनी हर जरूरत के लिए हाथ न फैलाना पड़े।"पूजा समाचार वाचिका बनना चाहती थी। वो इतनी कार्यकुशल थी कि अपनी ड्रेस भी खुद डिजाइन कर लेती। विधि का विधान देखिए और किस्मत का लेखा कहे कि इतनी सुंदर और कार्य कुशल लड़की की शादी अपना उम्र से बारह साल बड़े व्यक्ति से करा दी। मां बाप भी क्या करते गरीबी बहुत बुरी चीज है। पर उसने कभी जिंदगी से शिकायत नहीं की। ईश्वर की लेखनी को स्वीकार कर हर हाल में सामंजस्य स्थापित किया।तेरह साल बाद आज मिली है तो बहुत सी बातें तो होनी थी। उसकी कहानी सुनकर आंखें डबडबा आई। उसने बताया कि उसके दो बच्चे हैं। एक बड़ा बेटा कार्तिक बारह साल का जो अब सातवीं में पढ़ता है। और एक छोटी सी प्यारी बेटी सौम्या जो अभी तीन साल की हुई है। पास के स्कूल में ही उसका दाखिला कराया है। अभी नर्सरी में ही है। विधि का विधान देखो तीन साल पहले जब उसकी बेटी होने वाली थी उसके पति हृदयघात से गुजर गए। उसकी बेटी भी अपने पापा का चेहरा नहीं देख पाई। उस पर तो दुखों का पहाड़ ही टूट गया जैसे। ससुराल वालों ने भी उसकी बेटी को बहुत सुनाया । मनहूस बेटी है पैदा होने से पहले ही बाप को खा गई।डिलीवरी के समय ही सबने उससे रिश्ता तोड़ लिया। इस हालत में वो बेचारी कहाँ जाती। उसके पिता भी शादी के दो साल बाद ही गुजर गए थे। उसकी दुख की घड़ी में सिर्फ उसकी माँ साथ थी। भाई-बहनों की शादी हो चुकी थी। सब अपनी गृहस्थी में खुश थे।ये तो गनीमत थी कि उसके पास रहने को अपनी एक छत थी। उसके पति ने एक छोटा सा घर तो बना लिया था। पूजा ने अपनी माँ को अपने पास ही रख लिया बेटी की देखभाल के लिए। जैसे ही बेटी एक माह की हुई। उसने पास के स्कूल में ही अध्यापन की नौकरी कर ली। स्कूल से आकर भी खाली समय में ट्यूशन पढ़ाती। उसने हिम्मत नहीं हारी। अपने दोनों बच्चो को अच्छी परवरिश दे रही है। आर्थिक तंगी की वजह से बच्चो को सरकारी स्कूल में ही पढ़ा रही है लेकिन संस्कार अच्छे दे रही है। बच्चो के साथ और व्यस्त जिंदगी में उसका समय अच्छा कट जाता है। उसने सच स्वीकार लिया कि अपनी किस्मत खुद लिखनी है, किसी के आगे सहायता के लिए हाथ नहीं फैलाना। बच्चो को स्वाभिमान से जीना सिखा रही है। अब उसके बच्चे बड़े हो रहे हैं तो उसने एक कोचिंग सेंटर खोलने की भी योजना बनाई है। उसकी कहानी सुनकर मेरी आंखें भर आई। लेकिन अपनी मित्र की कर्मठता और खुद्दारी पर गर्व है मुझे। बातों में समय का पता ही नहीं चला।दिन ढल गया था। सूरज छिपने ही वाला था। पूजा के अदम्य साहस और जिजीविषा से सबको प्रेरणा मिलती है। अपने कोचिंग के उद्घाटन का निमन्त्रण देकर गर्व के साथ धीमी मुस्कान लिए वो कैफे से चली गई।    पूजा ने साबित कर दिया कि अगर इरादा पक्का हो तो हालात इंसान को नहीं, इंसान हालात को बदल देता है।

समाप्त।

डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली