ईश्वर की कृपा Vandna Sharma द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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ईश्वर की कृपा

ईश्वर की कृपा 

मोहन नाम का एक युवा बहुत आलसी था। सारे दिन बिस्तर पर ही पड़ा रहता। एक दिन उसकी बूढ़ी माँ ने उसे बहुत फटकार लगाई और घर से निकाल दिया। मोहन ने सोचा अब कहाँ जाऊँ, क्या करूँ, कोई उपाय तो करना होगा जो बिना काम करे खाने को मिल जाए।वह राजा के महल के सामने जाकर ऐसी जगह बैठ गया कि महल से आते-जाते राजा की नजर उस पर जरूर पड़े। तीन दिन हो गए उसे महल के आगे बैठे हुए, राजा भी उसे रोज देखता पर कहता कुछ नहीं। चौथे दिन राजा ने अपना दरबारी भेजा मोहन को बुलाने के लिए। मोहन को राजा के सामने पेश किया गया। राजा के पूछने पर मोहन ने कहा कि महाराज मुझे काम की तलाश है, क्या आप मुझे कुछ काम देंगे। राजा ने उससे पूछा कि क्या काम कर सकते हो। मोहन ने बड़ी चतुराई से जवाब दिया कि महाराज मैं वो काम कर सकता हूँ जिसे आपका कोई दरबारी नहीं कर सकता। पर शर्त एक है दिन का एक लाख रुपया लूँगा। राजा ने सोचा कोई बड़ा पराक्रमी व्यक्ति है, जो मुश्किल से मुश्किल काम भी कर सकता है। राजा ने कुछ सोचकर हाँ कर दिया और उसे राजमहल में ही रहने को एक कमरा दे दिया, जिससे जरूरत पड़ने पर उससे काम लिया जा सके।कुछ दिन तो आराम से कटे हैं। खाने और सोने में। एक दिन रानी का नौलखा हार गुम हो जाता है। सब जगह तलाश की जाती है, कहीं नहीं मिलता। एक दरबारी राजा को मोहन का नाम याद दिलाता है। दरबार में मोहन को बुलाया जाता है। राजा उसे रानी के हार को ढूंढने का हुक्म देते हैं। मोहन राजा से एक दिन का समय माँगता है। राजा समय दे देते हैं।अब मोहन बहुत परेशान हुआ उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था इस मुसीबत से बचने का। रात को इसी चिंता में उसे नींद नहीं आ रही थी। वो नींद बुलाने के लिए गुनगुनाने लगा - "आजा री निंदिया, आजा री मुंदिया।"ईश्वर की कृपा जिस पर होती है उसके सारे काम स्वतः ही पूर्ण होने लगते हैं। मोहन के ऊपर भी ईश्वर कृपा बरसा रहे थे। सौभाग्य से निंदिया और मुंदिया उस महल की नौकरानी का नाम था जो रानी के साथ ही रहती थी चौबीस घंटे। उन दोनों ने ही वो हार चुराया था। जब वे दोनों मोहन के कमरे के सामने से गुजर रही थी तो उन्हें मोहन का बड़बड़ाना सुनाई दिया। "आजा री निंदिया, आजा री मुंदिया।"दोनों नौकरानी डर गई, सोचा ये मोहन बाबा तो बहुत पहुँचे हुए हैं। इन्हें हमारा नाम भी ज्ञात हो गया है, अगर इन्होंने महाराज को बता दिया तो हमें मृत्युदंड भी मिल सकता है। दोनों डरते हुए मोहन के पास गई और हाथ जोड़कर काँपते हुए माफी माँगने लगी। उन दोनों ने सारी घटना कह सुनाई। मोहन ने ध्यान से दोनों को सुना और ईश्वर को धन्यवाद दिया। फिर अभिनय करते हुए बोला कि ठीक है मैं महाराज को नहीं बताऊँगा लेकिन तुम दोनों उस हार को उपवन में लगे झूले के पास फंसा कर आ जाओ। बाकी सब मैं संभाल लूँगा।अगले दिन मोहन को राजा के समक्ष पेश किया गया। मोहन ने नौकरानी से हार को जिस जगह छुपाने के लिए कहा था वहीं दरबारियों को भेजा। और योजनानुसार हार वहीं मिला। राजा बहुत खुश हुआ। सभी दरबारी जय-जयकार करने लगे। राजा को लगा कि कोई मंत्र सिद्ध है मोहन के पास। राजा ने खुश होकर मोहन को अपना खास सलाहकार बना दिया।कुछ दिन तो सब ठीक-ठाक चलता रहा। लेकिन एक दिन पड़ोसी राज्य ने चढ़ाई कर दी। सभी दरबारी घबरा गए। सब दरबारियों ने मोहन को सबक सिखाने की सोची। एक मंत्री ने राजा को सुझाव दिया कि महाराज ये मोहन किस काम का आयेगा। उसने ही कहा था न कि जो काम किसी से नहीं होगा, वो करेगा। राजा को यह बात पसंद आई। राजा ने मोहन को बुलाकर आदेश दिया कि मोहन तुम्हें ही राज्य की रक्षा करनी है, कुछ भी करो लेकिन इस संकट से मुक्त दिलाओ।मोहन घबरा गया, अब करे तो करे क्या। उसने एक रात का समय माँगा सोचने के लिए। रात को मोहन बड़ा परेशान। ईश्वर को याद करने लगा। हे प्रभु बचा लो इस मुसीबत से, मैं अपने गाँव लौट जाऊँगा।ईश्वर की कृपा देखिए। जिसे बचाने वाला स्वयं भगवान हो उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।मोहन ने रात को ही भागने की सोची। वह महल के अस्तबल पहुँचा। वहाँ बहुत सारे घोड़े खड़े थे। बस एक घोड़ा बैठा हुआ था, मोहन ने जैसे ही उस घोड़े पर हाथ फेरा वो खड़ा हो गया और मोहन गलती से उस पर बैठ गया। घोड़ा सरपट दौड़ने लगा।मोहन का डर से बुरा हाल था। वो डर से चिल्लाने लगा। और ईश्वर को याद करने लगा। घोड़ा उसी दिशा में दौड़ रहा था जिधर से दुश्मन सेना आ रही थी।मोहन ने जान बचाने के लिए एक पेड़ की शाखा पकड़ी ही थी कि तेज गति के कारण वो टूटकर मोहन के हाथ में आ गई। दुश्मन सेना को लगा कि कितना बहादुर योद्धा है अकेले ही बिना शस्त्र के पेड़ उखाड़ता तेज गति से चला आ रहा है।सारी सेना डरकर भाग गई। मोहन वहीं सीमा के पास गिरकर बेहोश हो गया। अगले दिन सैनिकों ने उसे फटेहाल पड़ा देखा तो लगा कि अकेले मोहन ने सारी सेना के साथ युद्ध किया और अंत में बेहोश हो गया होगा। सैनिक मोहन को उठाकर महल ले गए और राजा को सारा किस्सा सुनाया।राजा मोहन से बहुत प्रसन्न हुआ। और इनाम माँगने के लिए कहा। मोहन बोला - महाराज मैंने कुछ नहीं सब ईश्वर ने किया है। ये सब उसी ऊपर वाले की कृपा है। लेकिन महाराज अब मैं अपने गाँव वापिस जाना चाहता हूँ। मुझे अपनी माँ की बहुत याद आ रही है। राजा ने प्रसन्न होकर मोहन को बहुत सारा धन देकर विदा किया। जैसी प्रभु की इच्छा🙏---डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली