स्कूल के दिन Vandna Sharma द्वारा बाल कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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स्कूल के दिन



स्कूल के दिन  

आज अपने बेटे को स्कूल भेजते हुए ख्याल  
आया कि कभी हम भी स्कूल जाते थे। फर्क  
सिर्फ इतना है हम सारा काम स्वयं करते थे।  
स्वयं तैयार होते, खुद ही बैग पैक करते और तो  
और हमें स्कूल तक छोड़ने भी कोई नहीं जाता।  
हम खुद ही पैदल-पैदल स्कूल जाते। और !  
कितने समझदार थे हम। एक ये हैं आजकल  
के बच्चे, टिफिन भी पैक करके दो। बैग भी  
पैक करो, छोड़ने भी जाओ, लिवा कर भी लाओ।  
हमें तो जो मिलता खा लेते कभी नखरे नहीं  
किये। और ये देखो आजकल के बच्चे, यह  
नहीं खाना, वो नहीं खाना। सौ नखरे।  
खाना लेकर उनके आगे-पीछे दौड़ो।  
मैं और मेरा भाई पैदल ही जाते थे  
स्कूल खेलते हुए, कूदते हुए। बारिश में भी  
घरवाले छुट्टी ना करने देते। पानी में तैरकर  
नहीं चलकर पानी उछालते गिरते-पड़ते  
पहुंच ही जाते स्कूल और उस पर मैडम जी की  
डाँट क्या जरूरी था स्कूल आना। घर  
पर नहीं पढ़ सकते क्या। प्रार्थना सभा में वो  
सावधान। विश्राम करना। पीटी वाले सर का  
एक-दो-तीन चार करना। मैम को खुश  
करने के लिए अगला पाठ पहले से ही  
पढ़कर जाना और मैम से शाबाशी मिलने  
पर फूला ना समाना। वो दिन भी  
क्या थे।  

---  



वो दिन भी क्या दिन थे  

वो दिन भी क्या दिन थे  
जब हम भी स्कूल जाते थे  
मैम से तारीफ सुनने के लिए  
घर से पाठ को पढ़कर जाते थे  
मैं सुनाऊं, मैं सुनाऊं  
क्लास में खूब चिल्लाते थे  
घर आकर मम्मी को  
सारे बाते बतलाते थे  
धूप हो या हो बारिश  
रोज विद्यालय जाते थे  
रात को पहाड़ा रटते थे  
स्कूल में रोज सुनाते थे  
वो दिन भी क्या दिन थे  
जब हम भी स्कूल जाते थे  
कभी-कभी क्लास भी अपनी  
पेंटिंग से सजाते थे  
15 अगस्त हो या 26 जनवरी  
देशभक्ति गाना गाते थे  
होती जब स्कूल से छुट्टी  
लाइन बनाकर घर जाते थे  
घर जाकर फेंके कपड़े, सामान  
इधर-उधर, बैग किधर  
और मम्मी से पिट जाते थे  
वो दिन भी क्या दिन थे  
जब हम भी स्कूल जाते थे ।  

1/7/26  
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 
=============
बड़े होने का बहुत शौक था बचपन में  
बड़े होकर, बचपन बहुत याद आता है  
वो स्कूल बहुत याद आता है 
कितनी उलझने हैं ज़िन्दगी में  
कितना मन को मारना पड़ता है  
बड़े होने की इतनी बड़ी कीमत  
आंसू छुपाने पड़ते हैं, हँसकर  
दिल रोये, लबों को मुस्कराना पड़ता है  

वो बचपन कितना प्यारा था  
वो स्कूल कितना प्यारा था 
ना कोई शर्म, ना झिझक, ना संकोच  
खुलकर रोना, हँसना, बेझिझक चिल्लाना  
कभी रूठना, कभी मनाना  
पल में कुट्टी पल में दोस्ती  
पहली बेंच पर बैठने के लिए लड़ना  
वो दोस्त का टिफिन खाना, उसको चिढ़ाना  
वो पहला स्कूल, और पहली स्कूल टीचर  
वो कैंटीन में मस्ती करना  
छुट्टी की घंटी के बजने का इंतज़ार करना  
बारिश में भीगते हुए जाना  
फिर स्कूल टीचर से डांट खाना  
बारिश में क्या ज़रूरी था आना  
परीक्षा खत्म होने की खुशी  
जुलाई में वो नई क्लास में आना  
एक रविवार कितना था खास  
उंगली पर दिन गिनते करते इंतज़ार  
क्यों हम इतने बड़े हो गए  
बचपन गया है, बचपना नहीं  
फिर से बच्चे बन जाते हैं  
कोई समझाए कितना ही  
हमको समझना नहीं  
क्योंकि वो बचपन फिर से जीना है  

---  
डॉ वंदना शर्मा 
======================

*स्कूल का टाइमटेबल*

पहला पीरियड है हिन्दी 
लगी हुई जिसपर बिन्दी 

दूसरा पीरियड है इतिहास 
जिसमें भरी पड़ी बकवास 

तीसरा पीरियड है भूगोल 
जिसमें आता नम्बर गोल 

चौथा पीरियड है विज्ञान 
मुझको नहीं इसका कोई ज्ञान 

पाँचवा पीरियड है गणित 
जोड़-घटा पहाड़े अनगिनत 

छठा पीरियड है अंग्रेजी 
पढ़ने में ना लागे जी 

सातवां पीरियड है संस्कृत 
ना ढूँढो इसके तार संयुक्त 

आठवां पीरियड है कला 
मैं चित्रकार बनने चला 

किसने बनाई ये पढ़ाई 
करनी होगी उसकी बड़ाई 
कहाँ से उसके दिमाग में आई 
कि जरूरी है बड़ा पढ़ाई 
==================
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली 
स्कूल की यादें 
आपको कैसी लगी मेरी यादें, अपना अनुभव भी जरूर बताए क्यो आपकी भी यादें कुछ ऐसी ही थीं।
स्कूल जाना पहले बोरिंग लगता था अब याद आता है वो बेफिक्र जीना, ना कल की चिंता न किसी से बैर। सबकी अपनी दांपली सबकी अपनी खैर।