आज मौसम सुहावना हो रहा था। आसमान में बादल छाए हुए थे। हल्की बारिश हो रही थी। धरती पर पानी टप टप टपक रहा था। बहुत दिनों बाद बारिश हुई थी पहली बारिश के बाद मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबू आ रही थी। शालू बारिश को देखते हुए कुछ गुन गुना रही थी। पीछे से उसके पति राहुल ने उसे एक कप कॉफी पकड़ाई और पास ही सोफे पर बैठते हुए बोला तुम्हे बारिश बहुत पसंद है ना। याद है एक बार क्या हुआ था वो भी बारिश का ही एक दिन था। हमारी ट्रेन का समय हो चुका था। और हमें गांव से निकलने में देर हो गई थी। गाड़ी छूटने ही वाली थी तो हम दोनों अपने कोच को भूल जनरल डिब्बे में चढ़ गए थे। शाम ६ बजे रेजेर्वेशन था ,लेकिन कन्फर्म नहीं हुआ ,वेटिंग ही रहा अंत तक। किसी तरह भागते -भागते पकड़ी थी गाड़ी। वहां इतनी भीड़ पाँव रखने को ज़गह नहीं। धक्का -मुककी ,रेलम-पेल। हां याद आया सब तुम्हारी गलती थी। कभी कोई काम समय से नहीं करते ना।मेरी गोद में मेरा एक साल का बेटा था जो भीड़ की वज़ह से रो रहा था। सहयात्री इतने निर्दयी और इतने दुष्ट किसी ने तरस नहीं खाया कि कोई ज़रा सी सीट भी ऑफर करता। मुझे आया गुस्सा बहुत सारा ----. मैंने गुस्से में घूरकर तुम्हे देखा और मैं अगले स्टेशन पर उतर गयी। तुम भी उतरे थे पीछे -पीछे। अब स्टेशन गांव का था , दूसरी ट्रैन भी नहीं दिल्ली के लिए। घमासान वाक् युद्ध हुआ दोनों के बीच। रात के ८ बजे थे बस स्टैंड भी दूर था। अब मुझे अपनी गलती का एहसास हो रहा था। पर अब कुछ सूझ नहीं रहा था। ईगो के कारन दोनों बात भी नहीं कर रहे थे। तभी एक पैसेंजर ट्रेन रुकी ,दोनों ने एक दूजे को घुरा , चढ़ गए। रात्रि का समय और गांव का स्टेशन होने के कारन वो डिब्बा खाली था। एक -दो ही यात्री उपस्थित थे। अगले स्टेशन तक हम ने बिलकुल बात नहीं की। एक खतरनाक ख़ामोशी व्याप्त। स्पेस मिलने कारण बच्चा तो सो गया। लेकिन अब रास्ते में पड़ने वाली मुसीबतो तुम्हारा पारा हाई हो गया हो गया। गजरौला जंक्शन पर दोनों उतर गए। शर्मंदगी और डर से मेरा बुरा हाल। पर गुस्से में तुम्हारा चेहरा देखकर सॉरी कहने की भी हिम्मत नहीं हुई। कोई ट्रेन नहीं थी दिल्ली के लिए लम्बे समय तक। रात का समय ,सुनसान स्टेशन , तुम्हारा गुस्सा और मैं बेचारी अकेली। काटो तो खून नहीं स्थिति हो रही थी। मैंने चुप रहने में ही समझदारी समझी।
दिन का समय होता तो अनेक विकल्प होते। पर बुरे फंसे मेरी बेबकूफी की वज़ह से। गुस्सा बहुत आता है न मुझे। थोड़ी देर नदी के दो किनारो की तरह दूर-दूर बेंच पर बैठे रहे। अजीब से ख्याल आने लगे मन में। कैसे जायेंगे अब ? सवारी नहीं साथ में छोटा सा बच्चा और पतिदेव ही गुस्से में छोड़कर चले गए तो क्या होगा ?मैं अकेली कैसे जाउंगी घर। किसी को फोन भी नहीं कर सकते जग हंसाई होगी क्युकी गलती तो मेरी थी ना। फिर क्या हुआ ? तुम अपना बैग उठाकर बिना कुछ बोले ही गुस्से में चल दिए। मैं परेशान कुछ समझ नहीं आरहा था क्या करूँ ?सारी रात तो स्टेशन पर नहीं रुक सकते ऊपर से माहौल इतना ख़राब एक अकेली लड़की रात में -----तो समझो कितने खतरे की बात। अपना ईगो छोड़ मैं तो चुपचाप बैग उठा तुम्हारे पीछे चल पड़ी। तुम भी तो घमंडी थे बिना पीछे मुड़े दूर निकल गए थे। एक बार भी नहीं सोचा मेरी बीबी कैसे आएगी क्यो करेगी।अँधेरे में परेशानी रही थी रास्ता देखने में। भगवानजी तब तुम बड़े याद आरहे थे। मैं तो बस यही सोच रही थी जैसे -तैसे बस घर पहुँच जाऊँ एक बार ,बाकी का युद्ध झेल लेंगे। एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा था तुमने।अगर मैं पीछे न जाती व्ही छूट जाती। बहुत गुस्सा आया हमे। कैसा खड़ूस पति है कोई परवाह नहीं हमारी। वाक्युद्ध समय अनुकूल नहीं था। दिल्ली की एक बस में चढ़ गए दोनों। पर बस में सीट नहीं ,हाथ में बच्चा ,दूसरे हाथ में बैग और मैं बेचारी , तुम्हे तो सीट आगे ही , मिल गई थी पर मुझे पीछे जाकर बैठना पड़ा था। सबसे पीछे जाकर मैं बच्चे के साथ बैठ गयी। तुम तो सो गए और मैं सोचने लगी आज तो बड़ा बुरा दिन था ,अगर मैं पीछे न आती तो गयी भैंस पानी में। जब कंडक्टर टिकिट लेने आया तो मैं पर्स में पैसे ढूंढने लगी टिकिट लेने के लिए। पर उसने नहीं लिए।शायद तुमने पहले ही ले लिया होगा करीब एकबजे पहुंचे घर। पुरे रास्ते कोई बात नहीं। सुनसान ख़ामोशी। हमे तो डर लग रहा था कहीं घर पहुंचकर फिर से वाक्युद्ध ?लेकिन रूम पर पहुंचकर तुमने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया सॉरी बोलै। और मेरा गुस्सा भी पिघल गया तुम्हारी बाहों में आकर। दोनों ये बाते याद कर हंसने लगे कितनी शरारती थी तुम। और तुम भी तो बहुत अकडू थे। अच्छा हुआ तुम सुधर गए। वरना मेरा क्या होता। चलो छोड़ो आज का देखो कितना सुंदर मौसम है चलो कही घूमने चलते हैं। राहुल गुस्सा होते हुए बोला फिर घूमने की बात कितनी घुमक्कड़ हो तुम। घूमने से पेट नहीं भरता। बारिश इसलिए हो रही है आओ एक साथ बतियाते हैं बारिश में भीग जाते हैं।