यादों की पोटली Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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यादों की पोटली

वो दिन भी क्या दिन थे  जानकी देवी की लड़की की शादी थी आज। घर फिर भी सूना लग रहा था। कोई रिश्तेदार नहीं आया था। जो आस-पड़ोस के जान-पहचान वाले थे वो भी रात को ही आयेंगे सिर्फ खाना खाने। जानकी के घमंडी स्वभाव के कारण किसी से न बनती थी, क्योंकि जानकी रिश्तों से ज्यादा पैसों को महत्व देती थी। हर बात पर उसकी जबां पर पैसा आ ही जाता। उसके इसी दिखावे की आदत के कारण सभी रिश्तेदारों ने उससे बात करना बंद कर दिया। आज उसकी बेटी की शादी में कोई नहीं आया।  जानकी ने संकोच करते हुए अपने पति से कहा - "अजी सुनते हो, मुझसे तो नाराज हैं दीदी पर आप तो उनके भाई हो, जरा अपनी दीदी को बुला लाओ, मुझे तो रस्मो-रिवाज का पता ही नहीं है कैसे करूँ। आप जाओगे तो दीदी मना नहीं करेगी।"  जानकी का पति रामप्रसाद अपनी दीदी को लिवाने जाता है। जानकी उदास बैठी सोच रही है आज हमारे पास रुपया-पैसा, गाड़ी-बंगला सब है लेकिन अपने नहीं है खुशी बाँटने के लिए। इंसान दुःख तो अकेला झेल सकता है लेकिन खुशी में जरूर कोई चाहिए उसे बताने के लिए कि आज वो बहुत खुश है।  शाम को रामप्रसाद अपनी दीदी के साथ जब घर में आता है तो जानकी खुशी के आंसू थाम नहीं पाती और अपनी ननद के गले लग फूट-फूट कर रोने लगती है और अपनी गलती के लिए माफी माँगती है।  रामप्रसाद की दीदी उसे माफ कर देती है और सारा काम काज खुद संभाल लेती है। सारी रस्में विधि-विधान से पूरी कर सुबह तारो की छाव में अपनी भतीजी को खुशी-खुशी ससुराल के लिए विदा करती है।  दुल्हन के जाने के बाद सभी हॉल में एकत्र होते हैं। जानकी भी वहीं अपनी ननद के पास बैठ जाती है। दीदी अपना जमाना याद कर हुए कहती हैं -  वो दिन भी क्या दिन थे। जब मेरी शादी हुई थी ना तब सारा गाँव एक ही परिवार हुआ करता था। गाँव के सारे लोग ही मिलकर सारी व्यवस्था करते थे। जो हम खाना वाली, बर्तन वाली और क्या बोलते है वो कैटरिंग को पैसा देते हो ना हमें ना देना पड़ता था। गाँव की लड़की की शादी का दहेज भी ऐसे ही जुड़ जाता था। किसी चाचा ने कुछ दिया, किसी ताऊ ने कुछ दिया। गाँव की सारी औरतें मिलकर ही रसोई की सभी व्यवस्था संभाल लेती थी। आजकल की तो बस मेकअप में ही लगी रहती है, ना खाना बनाना आता है, ना गाना, बजाना आता। बस फूहड़ गानों पर कूदती रहती है। हमारे जमाने की तो ढोलक बजाना, गाना, काढ़ना, बुनना सब जानती थी। घर के आंगन में ही सब चूल्हे रख एक साथ बतियाते हुए खाना बनाती थी। किसका बर्तन किसके घर है ये भी होश ना रहता। भजन गाती थी और सारा काम निपटा देती। हँसी-ठिठोली में ही सारा ब्याह हो जाता और लड़की के बाप पर जोर भी ना पड़ता।  आजकल सुविधाएं भले ज्यादा हो पर प्यार खत्म हो गया रिश्तों से। प्यार क्या आजकल तो रिश्ते ही खत्म हो गए। आने वाली पीढ़ी को क्या पता होगा चाचा, ताऊ क्या होते हैं? बुआ, मामी कौन होती है। आजकल तो एक-एक बच्चा करे है ये एक-एक बच्चे वाली क्या जाने परिवार क्या होते हैं। परिवार का सुख क्या होता है।  रिश्ते आजकल बचे ही कहाँ है, ना सहनशक्ति बची है, बच्चों में, ना रिश्ते निभाने की इच्छा।  आजकल के बच्चे या तो शादी ही नहीं करना चाहते, करते भी हैं तो एक-दो महीने में तलाक हो जाते हैं। हमारे जमाने में तो तलाक शब्द ही ना होता। मरते दम तक साथ निभाते थे लोग। आजकल के बच्चे जिम्मेदारी से भागते हैं, शादी करेंगे तो जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी, एक-दूसरे के परिवार का भी ध्यान रखना पड़ेगा, बच्चे होंगे तो बच्चों का पालन करना पड़ेगा। स्वार्थ इतना हावी हो गया है आज लोग सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं। कैसा कलयुग आ गया है आज। बच्चे बड़ो को आँख दिखाते हैं।  दीदी अपनी ही रो में बोले जा रही थी। और सभी बड़े चाव से उनकी बातें सुन रहे थे। बुआ एक क्षण रुकी, बोली ऐसे क्या देख रहे हो सब। सब हँसने लगे और एक साथ बोले वो दिन भी क्या दिन थे।  --- x ---  

डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली