ऑनलाइन राखी Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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ऑनलाइन राखी

रक्षाबंधन  प्रीति सुबह का काम खत्म कर, बच्चों का टिफिन पैक कर अपनी साहित्यक पत्रिका पढ़ने बैठी। तभी दरवाजे की डोरबेल बजी जैसे ही दरवाजा खोला सामने अपनी बहन अदिति को देख खुशी से उछल पड़ी। झट से उसे गले लगाया और अपने बेडरूम में ले गई।  बातों ही बातों में अदिति ने अपनी बड़ी बहन से पूछा - "दी राखी का क्या प्रोग्राम है जाओगी, इस बार राखी पर मायके। प्रीति थोड़ा उदास हो गई। अदिति को कॉफी का कप पकड़ाकर उसे बालकनी में ले गई। बालकनी में उसने बहुत से पौधे लगाए थे। सुन्दर-सुन्दर पेंटिंग लगा रखी थी। झूले पर बैठते हुए प्रीति ने अदिति से कहा - "वो दिन भी क्या दिन थे जब हम छोटे बच्चे थे। रक्षा बन्धन का बेसब्री से इन्तजार करते। कैलेंडर में रोज का एक दिन गिनते। हमारी तीनों बुआजी और उनके बच्चे भी आते। घर में कितनी रौनक रहती थी, हम चारों भाई-बहन, मम्मी-पापा, तीनों बुआजी, उनके बच्चे सब मिलाकर सोलह सदस्य हो जाते। सारा दिन घर हंसी-ठहाको से गूंजता रहता। तीन दिन तक सारे मेहमान रुके रहते और हम भी स्कूल की छुट्टी कर लेते।  रात को तीनों बुआजी और मम्मी जी सारी बातें करते हुए ही मिलते। पता नहीं रात को सोते थे या नहीं। सुबह आंख खुली तो उनका भजन-कीर्तन हो जाता। सब अपने-अपने किस्से सुनाते। तीनों बुआ से मेरा लगाव कुछ ज्यादा ही था।  अदिति अब समय बदल गया है। अब दो बुआजी स्वर्गवासी हो गई और तीसरी बुआ अपने पोते खिलाने में लगी रहती है वो भी नहीं आती। पापा की आंखों में बुआ के घर न आने का दुख देखा है मैंने। और हमारे दोनों भाई तो और भी महान हैं जब से शादी हुई परदेस जाकर बस गए, आते ही नहीं हैं।  राखी का त्यौहार तो अब बस औपचारिकता रह गया है। हम दोनों बहने डाक से राखी भेजती हैं और दोनों भाई आनलाइन पैसे भेजते हैं। अब वो वाली बात नहीं रही। बहुत दुख होता है अदिति ये सोचकर कि जिन बड़े भैया को मैंने हमेशा पिता का सम्मान दिया अब वो पूरे साल खबर भी नहीं लेते। कभी फोन ही नहीं करते।  और जिस छोटे भाई के लिए मैंने सबकुछ किया। एक माँ की तरह उसका ख्याल रखा। वो भी बदल गया। तुझे याद है ना अदिति जब छोटा भाई बाहरवी में था तो वो घण्टो पढ़ाई करता था ना तो मैं उसके लिए खाने में कुछ ना कुछ मीठा बनाकर देती, क्योंकि मैंने पढ़ा था एक जगह मानसिक थकान होने पर कुछ मीठा खाने से  आराम मिलता है। सारी-सारी रात जागकर मैं उसके प्रोजेक्ट बनाती, उसके लिए असाइनमेंट बनाती। एक-एक पैसा जोड़कर उसके हर बर्थडे पर कपड़े लाती। कभी अपने शौक पूरे नहीं किए उसकी जरूरतों के लिए पैसे जोड़ती। जब वो दिल्ली चला गया था पढ़ने, कभी-कभी आता था छुट्टियों पर। अपनी सारी बात मुझसे ही करता। पापा तो सिर्फ पढ़ाई के लिए पैसे देते थे, बाकी फालतू खर्चों के लिए मुझसे ही मांगता।  मैंने उसे कभी किसी चीज के लिए मना नहीं किया। आज वही भाई इतना बदल गया कि अपनी बीवी के साथ बैठकर हँसते हुए मेरी बुराई सुनता रहता है। यही फर्क होता है भाई-बहन के प्यार में। एक बहन अपनी ससुराल में अपने भाई की बुराई किसी से नहीं सुन सकती और भाई अपनी बीवी से रोज सुनता रहता है। धीरे-धीरे रिश्तों में खाई बढ़ती ही जाती है।  पता है अदिति मेरी सिर्फ यह गलती थी कि मैंने छोटी भाभी को सोशल मीडिया पर सक्रिय होने के लिए मना किया कि आजकल बहुत क्राइम हो रहे अपनी सब बातें फेसबुक पर शेयर मत किया करो न ही अपनी व्यक्तिगत जिंदगी की सभी फोटो पोस्ट किया करो। उसने तो मेरे खिलाफ ही मेरे भाई को भड़का दिया पता है क्या कहा उसने, खुद भाई ने बताया कि "प्रीति दी मेरी कामयाबी से जलती है, चिढ़ती है वो मुझसे इसीलिए वीडियो बनाने को मना करती है।"  प्रीति का गला रूंध गया। अदिति ने उसे कसकर भींच लिया - "बस कर दी... रो मत। तूने सबका भला सोचा, यही तेरी गलती है। अब अपना सोच। समय सबसे बड़ा जज है, वो सबका हिसाब करेगा। उनसे बात करना बंद कर दे।"  फिर अदिति ने उसकी आँखें पोंछी और हौले से बोली - "और सुन, इस राखी पर घर जरूर आना। भले भैया-भाभी न आएं... माँ-पापा का आँगन तो है ना? मैं भी आऊँगी अपने बेटे को लेकर। हम खूब मस्ती करेंगे। अगर भैया नहीं आए, तो वीडियो कॉल पर ही सही... ऑनलाइन राखी बांध लेंगे। रिश्ता दिल से होता है दी, दूरी से नहीं टूटता।"  दोनों बहनें खिलखिलाकर हँस पड़ीं। खिड़की के बाहर गमले में लगा गुलाब और सदाबहार भी जैसे उनके साथ हँस दिया। पहली बार लगा - राखी टूटी नहीं, बस उसका मतलब बदल गया है।  मायका अब सिर्फ चारदीवारी नहीं, माँ की ममता और बहन का साथ है।  

डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली