अंतिम यात्रा Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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अंतिम यात्रा

अंतिम यात्रा  

कहानी  '

अंतिम यात्रा' शब्द सुनकर ही दिल काँपने लगता है। यह समय सभी को आना है। दुनिया का अंतिम सत्य भी यही है। दुनिया में लाखों लोग रोज मरते हैं। दिल दहल जाता है ऐसी खबरें पढ़कर। धन-दौलत भी किसी काम नहीं आती। जिस शरीर पर इतना इतराता है आदमी, मेकअप की अनेक परतें चढ़ाता है वही शरीर एक दिन जलकर राख हो जाता है।  किसी परिचित या आत्मीय जन के बारे में सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दिल चीत्कार उठता है। पूरी जिंदगी मनुष्य एक-दूसरे से ईर्ष्या-द्वेष करता है, धोखा देता है, लालच के वशीभूत हत्यारा भी बन जाता है। रिश्तेदार आपस में बात करना भी बंद कर देते हैं। पर भूल जाते हैं अंतिम सत्य। एक दिन सबको यहीं जाना है।  सुरेश नाम का युवक बिहार का रहने वाला था। एक फार्मा कंपनी में जॉब करता था। अच्छी सैलरी थी लेकिन व्यवहारिक नहीं था। बस अपने काम से काम। भौतिक वादी विचारधारा से प्रभावित था। भगवान को नहीं मानता था। पुरानी परंपराओं और आस्था का मजाक उड़ाता था। कोई पिछले जन्म के कर्म अच्छे होंगे कि अभी तक उसकी जिंदगी अच्छी गुजर रही थी। उसकी बीवी तनु बड़ी घमंडी थी। सारा दिन फोन में लगी रहती, वीडियो बनाती रहती। कामवाली लगी हुई थी तो घर के काम की भी कोई चिंता नहीं। जब कोई उसे अच्छी सलाह देता जैसे कि - "बेटा, फोन पर घर की सारी बात नहीं बताते। आजकल बहुत क्राइम हो रहे हैं। फेसबुक काम नहीं आएगी। काम अपने ही आते हैं।"  तनु पलटकर जवाब देती, "तुम लोग चिढ़ते हो मेरी लोकप्रियता से।" सारा दिन फेसबुक व्यू और लाइक्स चेक करने में लगी रहती। अपने बच्चों पर भी कम समय देती। धीरे-धीरे उसने अपने सभी रिश्तेदारों से बात करना बंद कर दिया। फेसबुक को ही अपना परिवार और दोस्त मानती। लोगों की झूठी तारीफ ने उसका दिमाग खराब कर दिया।  कोई समझाने की बात कहता तो मुँह बनाती या उससे झगड़ा कर लेती। बोलती, "जब मेरे पति को कोई दिक्कत नहीं है तो तुम्हें क्या? मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कोई मेरे बारे में कुछ भी कहे।" दिन पर दिन तनु घमंडी होती जा रही थी। किसी से सीधे मुँह बात नहीं करती। उसने सारे रिश्ते फेसबुक पर ही बना लिए थे।  समय एक सा नहीं रहता। ऊपरवाला सबके कर्मों का हिसाब रखता है और वक्त आने पर सबको सबक भी सिखाता है। कहते हैं ना, ईश्वर की लाठी में आवाज नहीं होती पर पड़ती बहुत तेज है।  तनु के पति सुरेश की नौकरी छूट जाती है। तनु के बढ़ते खर्चों से घर में पैसों की दिक्कत हो जाती है। अब रोज पति-पत्नी में झगड़े होने लगते हैं। सुरेश तनु को समझाता है कि अब तो सुधर जाओ, रील बनाना छोड़कर रिश्ते बनाओ। बुरे वक्त में अपने घरवाले ही काम आते हैं, फेसबुक वाले नहीं।  तनु पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वो अपने फोन में ही लगी रहती है।  एक दिन तनु बीमार हो गई। बहुत तेज बुखार होने के कारण वो बेहोश हो गई। बेहोशी में ही तनु ने एक सपना देखा।  तनु की बीमारी की वजह से मृत्यु हो जाती है। उसका पति भी उसकी बॉडी को जल्दी अंतिम संस्कार के लिए ले जाना चाहता है। सभी पड़ोसी भी उसकी बुराई करने में लगे हुए हैं कि बड़ी खराब महिला थी, हर समय मोबाइल में ही लगी रहती थी। कहीं भी जाती, कैमरा ही ऑन रहता। क्या खा रही है, क्या कहाँ जा रही है सब सोशल मीडिया पर बताती थी। उसका वश चलता तो अपनी अंतिम यात्रा की भी लाइव वीडियो बनाती। तनु के ससुराल वाले और मायके वाले से रिश्ते खराब थे तो उसकी अंतिम यात्रा के लिए भी कोई नहीं आया। उसकी अर्थी को कंधा देने वाला भी कोई नहीं मिला। सुरेश हारकर उसे ट्रक में डालकर उसकी अंतिम यात्रा के लिए ले जाता है।  तनु पसीने से नहा रही है। घबराकर उसकी आँख खुलती है। थोड़ी देर बाद तक सदमे में बैठी रहती है। आज उसने अपनी अंतिम यात्रा जो देखी थी। थोड़ी देर बाद जब उसे होश आता है तो वह सुरेश से बोलती है, "मुझे तुरंत सभी घरवालों से मिलना है।" तनु सुरेश के कंधे पर सर रख रोने लगती है। सुरेश तनु को अपने गृह जनपद अपने घर ले जाता है। वहाँ पहुँचकर तनु रोने लगती है। सबसे अपनी गलती के लिए माफी माँगती है।  तनु के ससुराल वाले अच्छे थे, उसको माफ कर देते हैं। अंत में तनु कहती है - "आज सपने में मैंने अपनी अंतिम यात्रा देखी। और सारा सपना कह सुनाती है। तनु अपने आँसू पोंछते हुए बोली - मुझे समझ आ गया है कि फेसबुक, सोशल मीडिया एक दलदल है जो लोगों की जिंदगी बर्बाद कर देता है, उनके अपनों से दूर कर देता है। जरूरत पड़ने पर अपने घरवाले ही काम आते हैं।"  तभी सुरेश गमगीन माहौल को हल्का करते हुए कहता है कि, "अंतिम यात्रा में घर वाले ही कंधा देते हैं न कि फेसबुक वाले। और सभी खिलखिलाकर हँसने लगते हैं।"  ॥

जय श्री राम ॥  --- 

डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली