Part 14 डायरी का अगला पन्ना खोलते ही मेरे चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ गई। पता नहीं क्यों, अब हर नया पन्ना पढ़ते समय ऐसा लगता था जैसे मैं किसी कहानी का अगला अध्याय नहीं, बल्कि किसी की धड़कनों का अगला राज़ जानने वाली हूँ। कई बार तो मैं खुद से पूछ बैठती थी...
"अगर यह सिर्फ़ एक कहानी है... तो इसे पढ़कर मेरा दिल इतनी तेज़ धड़कने क्यों लगता है?"
मैंने उस सवाल का जवाब ढूँढ़ने की कोशिश नहीं की।
बस चुपचाप अगला पन्ना पलट दिया।
"दीपावली के अगले दिन..."
हमारी बात शुरू हुए अभी एक ही दिन हुआ था।
लेकिन पता नहीं क्यों...
ऐसा लग रहा था जैसे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों।
सुबह मैंने हमेशा की तरह अपना व्हाट्सएप स्टेटस लगाया।
थोड़ी देर बाद उनका मैसेज आया।
उन्होंने लिखा—
"आज पहली बार तुम्हें अच्छे से देखा..."
"बहुत सुंदर लग रही थी तुम।"
मैं कुछ पल तक स्क्रीन को ही देखती रह गई।
यकीन ही नहीं हो रहा था।
यह पहली बार था...
जब अभिन्नव ने मेरी तारीफ़ की थी।
मेरे चेहरे की मुस्कान रुक ही नहीं रही थी।
मैं बार-बार वही मैसेज पढ़ रही थी।
शायद...
किसी लड़की के लिए उसकी पसंद के इंसान से मिली पहली तारीफ़ हमेशा सबसे खास होती है।
उस दिन मैं पूरे दिन बिना वजह मुस्कुराती रही।
लेकिन खुशी के साथ-साथ एक ज़िम्मेदारी भी थी।
मैं दसवीं कक्षा में थी।
बोर्ड की परीक्षाएँ पास आ रही थीं।
और मुझे पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देना था।
अभिन्नव भी यही चाहते थे।
वो अक्सर मुझे पढ़ाई के लिए समझाते।
समय पर पढ़ने को कहते।
फोन कम चलाने को कहते।
और हमेशा यही कहते—
"पहले अपना भविष्य बनाओ..."
"बाकी सब बाद में भी हो जाएगा।"
उनकी यही बात मुझे सबसे अच्छी लगती थी।
क्योंकि वह सिर्फ़ मुझे पसंद नहीं करते थे...
मेरे भविष्य की भी परवाह करते थे।
धीरे-धीरे दस-बारह दिन बीत गए।
इन दिनों में हमने एक-दूसरे के बारे में बहुत कुछ जाना।
या यूँ कहूँ...
उन्होंने मुझे अपने बारे में बहुत कुछ बता दिया।
उन्होंने अपनी पुरानी क्रश के बारे में बताया।
अपने बचपन की शरारतें बताईं।
अपने डर बताए।
अपनी कमजोरियाँ बताईं।
यहाँ तक कि कुछ ऐसे राज़ भी बताए...
जो शायद उन्होंने किसी और को कभी नहीं बताए थे।
कई बार मुझे लगता था...
उन्हें मुझ पर खुद से भी ज़्यादा भरोसा था।
लेकिन...
मैंने उन्हें अपने बारे में कोई राज़ नहीं बताया।
ऐसा नहीं था कि मुझे उन पर भरोसा नहीं था।
भरोसा था...
बहुत था।
लेकिन मैं पहले उन्हें और समझना चाहती थी।
मैं चाहती थी कि हमारा रिश्ता विश्वास की नींव पर बने...
जल्दबाज़ी पर नहीं।
कुछ ही दिनों बाद बिहार का सबसे प्यारा पर्व...
छठ पूजा आ गया।
हमारे गाँव में अलग-अलग पोखरों पर छठ होता था।
जहाँ मैं पूजा करने जाती थी...
वहाँ अभिन्नव का परिवार नहीं आता था।
और जहाँ उनका परिवार जाता था...
वहाँ हमारा परिवार नहीं जाता था।
लेकिन...
उस सुबह कुछ अलग हुआ।
मैं घाट पर खड़ी थी।
तभी दूर से मैंने उन्हें आते हुए देखा।
बाद में उन्होंने खुद बताया...
कि उस दिन वो सिर्फ़ मुझे देखने के लिए मेरे घाट तक आए थे।
हमारी नज़रें मिलीं।
बस कुछ सेकंड के लिए।
हम दोनों मुस्कुराए भी नहीं।
कुछ बोले भी नहीं।
क्योंकि वहाँ पूरा गाँव था।
लेकिन कभी-कभी...
खामोशी भी बहुत कुछ कह जाती है।
इसी कहानी में एक और किरदार था—
मन्नत।
वह कुंदन का दोस्त था।
दूसरी जाति का था।
और लगभग एक साल से मुझे पसंद करता था।
उसने एक बार मुझे प्रपोज़ भी किया था।
लेकिन मैंने साफ़ मना कर दिया था।
ऐसा नहीं था कि वह अच्छा लड़का नहीं था।
वह बहुत अच्छा था।
हैंडसम भी था।
लेकिन...
दिल का क्या करें?
मेरे लिए तो अभिन्नव ही सब कुछ बन चुके थे।
मुझे लगता था...
जिन गुणों की मैं तलाश करती थी...
वे सब मुझे उन्हीं में दिखाई देते थे।
उसी दिन जब अभिन्नव अपने पोखर की तरफ़ लौट रहे थे...
तभी मन्नत और कुंदन ने उन्हें रोक लिया।
उन्होंने उन्हें कोई चोट नहीं पहुँचाई।
बस थोड़ा डराया।
लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई।
जब मुझे यह सब पता चला...
तो मैं बहुत नाराज़ हो गई।
मैंने कुंदन को खूब डाँटा।
यहाँ तक कह दिया—
"आज के बाद मुझसे बात मत करना।"
मुझे लगा था...
मैंने सही किया।
लेकिन शायद...
मैं गलत थी।
घर पहुँचते ही अभिन्नव का मैसेज आया।
इस बार उनका अंदाज़ पहले जैसा बिल्कुल नहीं था।
वो बहुत गुस्से में थे।
उन्होंने लिखा—
"ये सब तुम्हारी वजह से हुआ है।"
"क्या मैं तुम्हारे लिए पूरी दुनिया से लड़ता फिरूँ?"
उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा।
मैं बार-बार उन्हें समझाने की कोशिश करती रही कि मेरी इसमें कोई गलती नहीं थी।
मैंने किसी को कुछ करने के लिए नहीं कहा था।
लेकिन...
उस समय उनका गुस्सा इतना ज़्यादा था...
कि वो मेरी कोई बात सुनने को तैयार ही नहीं थे।
उस दिन...
मैंने पहली बार अभिन्नव का वह रूप देखा...
जिसके बारे में आनंद ने मुझे पहले ही बताया था।
वो सचमुच बहुत गुस्से वाले थे।
और उस दिन...
मैं उन्हें संभाल नहीं पाई।
कुछ देर बाद उन्होंने लिखा—
"कुछ दिनों तक हम बात नहीं करेंगे।"
वह एक लाइन पढ़ते ही...
जैसे मेरी पूरी दुनिया रुक गई।
लेकिन मैंने उन्हें रोका नहीं।
मैंने सोचा...
अगर उन्हें यही सही लगता है...
तो शायद यही ठीक होगा।
मैंने बस लिखा—
"एक मिनट..."
उन्होंने पूछा—
"क्या?"
मैं बहुत कुछ कहना चाहती थी।
लेकिन...
कुछ भी नहीं कह पाई।
मैंने सिर्फ लिखा—
"कुछ नहीं... बाय।"
कुछ सेकंड तक उनका कोई जवाब नहीं आया।
फिर अचानक उनका मैसेज आया—
"मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ..."
"लेकिन मेरे लिए मेरी इज़्ज़त भी उतनी ही ज़रूरी है।"
"और सच कहूँ..."
"मैं तुमसे बिना बात किए रह भी नहीं पाऊँगा।"
"आज से हम बस चुपचाप बात करेंगे..."
मैंने वह मैसेज पढ़ा...
और जाने क्यों...
ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी रुकती हुई साँसें वापस लौटा दी हों।
मेरी आँखों में आँसू थे...
लेकिन इस बार वे दुख के नहीं...
सुकून के आँसू थे।
मैंने धीरे से जवाब लिखा—
"ठीक है..."
और शायद...
उसी दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ...
कि प्यार सिर्फ़ मुस्कुराने का नाम नहीं होता।
कभी-कभी...
एक-दूसरे को समझने के लिए टूटना भी पड़ता है।
मैंने डायरी का पन्ना पलटा...
लेकिन अगले पन्ने पर सिर्फ़ एक ही लाइन लिखी थी—
"मुझे लगा था कि अब हमारी कहानी हमेशा खुशियों से भरी रहेगी..."
"लेकिन मुझे क्या पता था कि किस्मत अभी हमारी सबसे कठिन परीक्षा लेना बाकी रखे बैठी थी..."
"जारी रहेगा..." 📖✨