Part 13
डायरी का अगला पन्ना खोलते ही मेरे हाथ कुछ पल के लिए रुक गए। न जाने क्यों, अब इस डायरी को पढ़ते-पढ़ते मुझे ऐसा लगने लगा था कि मैं सिर्फ किसी की कहानी नहीं पढ़ रही, बल्कि उसके साथ हर पल जी रही हूँ। राधा रानी की खुशी पढ़कर मैं मुस्कुरा देती थी और उसका दर्द पढ़कर मेरी आँखें भी नम हो जाती थीं। लेकिन मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि अगले कुछ पन्नों में उसकी जिंदगी का सबसे दर्दनाक और फिर सबसे खूबसूरत मोड़ मेरा इंतज़ार कर रहा था।
"16 अक्टूबर 2025"
उस दिन मैं हमेशा की तरह ट्यूशन गई थी। वहाँ मेरा एक क्लासमेट था—प्रिंस। रिश्ते में वह मेरा मामा लगता था, लेकिन हम दोनों साथ पढ़ते थे। मेरी बाकी सहेलियाँ भी वहीं थीं।
जैसे ही मैं पहुँची, प्रिंस मेरे पास आया और बोला,
"तूने अभिन्नव भैया का नंबर क्यों माँगा?"
मैं उसकी बात सुनकर हैरान रह गई।
मैंने तुरंत कहा,
"मैंने नंबर नहीं माँगा। मेरा भाई आनंद लेकर आया था।"
लेकिन...
उस दिन किसी ने मेरी बात पर विश्वास ही नहीं किया।
पूरे दिन हर कोई मुझसे यही पूछता रहा कि मैंने अभिन्नव का नंबर क्यों माँगा।
मैं हर बार यही कहती रही कि मैंने नहीं माँगा।
लेकिन कोई सुनने को तैयार ही नहीं था।
धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि यह बात पूरे गाँव में फैल चुकी है।
और गाँव में...
ऐसी बातें बहुत जल्दी लोगों की जुबान पर चढ़ जाती हैं।
उस दिन मैं बाहर से जितनी शांत थी...
अंदर से उतनी ही टूट चुकी थी।
ट्यूशन खत्म होने के बाद मैंने प्रिंस के छोटे भाई गौरव को रोका और पूछा,
"ये बात आखिर फैला कौन रहा है?"
उसने बिना झिझके जवाब दिया—
"अभिन्नव भैया..."
उस पल जैसे मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
गौरव ने बताया कि अभिन्नव सबसे यही कह रहे थे कि "राधा ने मेरा नंबर माँगा है।"
जबकि यह सच नहीं था।
मैंने कभी उनका नंबर नहीं माँगा था।
वह नंबर आनंद खुद लेकर आया था।
उस पल मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी भावनाओं को सबके सामने हँसी का विषय बना दिया हो।
जिस इंसान को मैं पूरे दिल से पसंद करती थी...
उसी ने मेरी भावनाओं की धज्जियाँ उड़ा दी थीं।
उस रात मैं बहुत रोई।
शायद पहली बार किसी के लिए इतना रोई थी।
मैंने अपनी डायरी में उस दिन की हर बात लिख दी।
और उसी रात मैंने फैसला कर लिया था...
कि अब मैं अभिन्नव को हमेशा के लिए अपने दिल से निकाल दूँगी।
17 अक्टूबर 2025
रात का समय था।
फोन मेरे हाथ में था और मैं पढ़ाई कर रही थी।
तभी अचानक एक मैसेज आया।
मैसेज अभिन्नव का था।
लेकिन फोन आनंद के पास था, इसलिए उन्हें लगा कि वे आनंद से बात कर रहे हैं।
उन्होंने पूछा,
"आनंद क्या कर रहा है?"
मैंने जवाब दिया,
"खाना खा रहा है।"
उस रात बात वहीं खत्म हो गई।
लेकिन अगले दिन...
मैंने फिर आनंद बनकर ही उनसे बात की।
तभी अचानक उनका एक मैसेज आया।
"तुम अपनी बहन से कहना मुझे माफ़ कर दे।"
उसके बाद जैसे मैसेजों की बारिश होने लगी।
उन्होंने लिखा—
"मैंने मजाक में किसी लड़की की फीलिंग्स का ऐसा मजाक उड़ाऊँगा, मुझे खुद नहीं पता था।"
"मुझे खुद से नफरत हो रही है।"
"प्लीज़ उसे बोलना मुझे माफ़ कर दे।"
फिर...
एक बार नहीं।
दस बार नहीं।
सैकड़ों बार...
लगभग पाँच सौ से भी ज़्यादा बार उन्होंने सिर्फ एक ही शब्द लिखा—
"Sorry..."
"Sorry..."
"Sorry..."
हर मैसेज पढ़कर लग रहा था कि उन्हें सच में अपनी गलती का एहसास हो चुका है।
लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि जिससे वे माफी माँग रहे हैं...
वह आनंद नहीं...
मैं खुद थी।
मैंने सिर्फ इतना लिखा—
"ठीक है... मैं अपनी बहन को बता दूँगा।"
उस रात भी उन्होंने दोबारा मैसेज किया।
फिर वही माफी...
फिर वही पछतावा...
और मैं हर बार आनंद बनकर यही कहती रही—
"कोई बात नहीं..."
18 अक्टूबर 2025
उस रात मैंने फैसला कर लिया।
अब और नहीं।
मैंने पहली बार उन्हें अपनी असली पहचान से मैसेज किया।
मैंने लिखा—
"मैं राधा हूँ..."
कुछ पल बाद उनका जवाब आया—
"ओह..."
फिर उन्होंने पूछा—
"तुम मुझे किस तरह पसंद करती हो?"
मैंने सच-सच लिख दिया—
"मुझे बस आपको देखना अच्छा लगता है।"
शायद...
मेरा जवाब उन्हें थोड़ा अजीब लगा।
उन्होंने सिर्फ इतना कहा—
"अच्छा..."
कुछ देर इधर-उधर की बातें हुईं।
फिर मैंने उन्हें "बाय" कह दिया।
अगली सुबह ट्यूशन से लौटकर मैंने उन्हें फिर मैसेज किया।
लेकिन इस बार उनका जवाब अलग था।
उन्होंने लिखा—
"अभी तुम दसवीं में हो। पहले बारहवीं पूरी कर लो, फिर आराम से बात करेंगे। मैं कहीं भागा नहीं जा रहा हूँ।"
उनका मैसेज पढ़कर मुझे थोड़ा बुरा तो लगा...
लेकिन कहीं न कहीं मुझे लगा कि उनकी बात गलत भी नहीं थी।
मैंने सिर्फ लिखा—
"ठीक है।"
फिर उन्होंने एक और बात कही।
"मैं हमेशा सोचता था कि मेरी शादी अरेंज मैरिज होगी... लेकिन अब तुम एक्सेप्शन हो।"
उस एक लाइन ने मेरे चेहरे पर फिर मुस्कान ला दी।
20 अक्टूबर 2025 — दीपावली
उस दिन सिर्फ दीपावली नहीं थी...
मेरी जिंदगी की एक नई शुरुआत भी थी।
सुबह मैंने उन्हें मैसेज किया—
"दीवाली तो विश कर ही सकते हो ना?"
उन्होंने तुरंत जवाब दिया—
"तुम भी तो कर सकती हो।"
मैं हँस पड़ी।
फिर मैंने लिखा—
"Happy Diwali..."
उन्होंने भी लिखा—
"Happy Diwali..."
रात को फिर हमारी बात शुरू हुई।
उन्होंने मुझे समझाना शुरू किया।
"मुझे लगता है तुम अभी छोटी हो। मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ..."
मैंने भी उन्हें समझाया—
"पाँच साल कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं होता।"
बातों-बातों में कब दो घंटे बीत गए, हमें पता ही नहीं चला।
न उन्होंने ठीक से दीपावली मनाई...
न मैंने।
आखिर में उन्होंने अचानक लिखा—
"I really like you..."
और फिर...
"आज से मैं तुम्हारा बॉयफ्रेंड हूँ।"
मैं मुस्कुराई और जवाब दिया—
"नहीं... पहले हम एक-दूसरे को अच्छे से समझ लेते हैं। उसके बाद जो सही लगेगा, वही करेंगे।"
उन्होंने तुरंत लिखा—
"ठीक है।"
फिर उन्होंने एक ऐसी बात बताई, जिसे सुनकर मैं पूरी तरह हैरान रह गई।
उन्होंने लिखा—
"मैं तुम्हें मार्च से पसंद करता हूँ।"
मेरे हाथ काँप गए।
क्योंकि...
मार्च से ही तो मैं भी उन्हें पसंद करती थी।
आठ महीने...
हम दोनों एक-दूसरे को पसंद करते रहे।
लेकिन किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि पहले जाकर बात कर सके।
मैंने पूछा,
"फिर आपने कभी बताया क्यों नहीं?"
उन्होंने जवाब दिया—
"क्योंकि तुम रिश्ते में मेरी भगिनी लगती हो। डर था कि कहीं तुम्हें बुरा न लगे। और मुझे यह भी नहीं पता था कि तुम मुझे पसंद करती हो या नहीं।"
उन्होंने आगे लिखा—
"जब तुम आयुषी के घर की छत पर आती थीं... मैं भी तुम्हें देखने के लिए ही अपनी छत पर आता था।"
मैं यह पढ़कर बिल्कुल स्तब्ध रह गई।
उन्होंने बताया कि वह रोज़ आनंद का इंतजार करते थे कि शायद आज वह मेरे बारे में कुछ बताए।
उन्होंने यह भी बताया कि जिस दिन मैं जानकी पूजा में मंदिर गई थी...
वह भी सिर्फ मुझे देखने मंदिर आए थे।
और जिस दिन कुंदन से उन्होंने दूसरी लड़की दिखाने की बात कही थी...
वह सिर्फ इसलिए झूठ बोले थे क्योंकि कुंदन उनके मन की बात समझ जाता और उनका मजाक उड़ाता।
उस रात मुझे पहली बार समझ आया...
कि मैं अकेली नहीं थी।
जिसे मैं हर बहाने से देखने जाती थी...
वह भी हर बहाने से मुझे देखने आता था।
शायद...
यहीं से हमारी कहानी सच में शुरू हुई थी।
लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी...
आगे हमारी मोहब्बत की राह में ऐसी परीक्षा आने वाली थी, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी...
जारी रहेगा...