March 2025
कभी कभी ज़िंदगी हमें ऐसी चीज़ें दे देती है, जो हमने कभी माँगी भी नहीं होती…
पर वही चीज़ें हमारी सोच और दिल दोनों बदल देती हैं।
मैं राधा रानी, एक सीधी-सादी लड़की।
मेरी ज़िंदगी बिल्कुल आम थी।
ना कोई बड़ी ख्वाहिश, ना कोई अलग कहानी…
बस अपने लोगों के साथ छोटी छोटी खुशियों में जीने वाली।
मुझे लगता था मेरी लाइफ भी बाकी लोगों जैसी ही होगी…
पर शायद किस्मत ने मेरे लिए कुछ और ही लिख रखा था।
उस दिन घर की सफाई करते हुए मुझे एक पुरानी डायरी मिली।
धूल से भरी हुई, थोड़ी टूटी सी… जैसे सालों से किसी ने उसे छुआ ही ना हो।
उस पर हल्के अक्षरों में लिखा था —
“राधा रानी की डायरी”
मैं एक पल के लिए रुक गई।
ये मेरा ही नाम था।
दिल में अचानक अजीब सा एहसास हुआ…
डर भी था और जानने की चाह भी।
मैंने धीरे से डायरी खोली।
पहले पन्ने पर किसी लड़के और लड़की की कहानी लिखी थी।
लड़के का नाम था — अभिनव
और लड़की का नाम… राधा रानी।
मैं समझ नहीं पा रही थी…
ये सिर्फ नाम की समानता थी या सच में कोई रिश्ता?
मैं पन्ने पलटती गई और कहानी मुझे अपने अंदर खींचती चली गई।
अभिनव एक गुस्से वाला दूसरों की सोच से अलग और
ज्यादा बोलता था, लेकिन उसकी बातों में अपनापन था।वो हमेशा हंसता दूसरों के साथ खेलना कूदना दोस्ती यारी वो सब करते था लेकिन उसकी डायरी में सिर्फ अभिनव के बारे में ही सबसे ज्यादा लिखा होता था और अभिनव दिल का बहुत अच्छा था
राधा रानी बिल्कुल अलग थी।
हंसना, सुनना , छोटी छोटी चीज़ों में खुश हो जाना… दूसरों के लिए खुद की चीजों का त्याग करना लेकिन वो किसी को अपने बारे में कुछ नहीं बताती थी क्यूंकि उसकी बातें सुनने के लिए ना ही कोई था और ना ही वो ज्यादा बोलती थी यही उसकी दुनिया थी।
उसे लिखना पसंद था, और लोगों के चेहरे की मुस्कान में अपना सुकून मिलता था।
डायरी में लिखा था कि दोनों की पहली मुलाकात अचानक हुई थी।
ना कोई प्लान, ना कोई इरादा…
बस किस्मत ने उन्हें एक ही रास्ते पर ला खड़ा किया था।
धीरे धीरे बातें शुरू हुईं।
पहले सिर्फ हालचाल पूछना…
फिर घंटों तक बात करना…
और फिर बिना बात किए दिन अधूरा लगने लगा।
कभी कभी कुछ रिश्ते नाम से नहीं, एहसास से बनते हैं।
शायद ये रिश्ता भी वैसा ही था।
लेकिन कहानी यहाँ आसान नहीं थी…
कुछ पन्नों के बाद डायरी की लिखावट बदलने लगी।
जैसे लिखने वाला खुश नहीं रहा हो।
कई लाइनें अधूरी थीं…
और कुछ जगहों पर स्याही फैली हुई थी।
फिर एक जगह लिखा था —
"कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में आते तो हमेशा के लिए हैं…
पर किस्मत उन्हें हमारे पास रहने नहीं देती।"
मैं पढ़ते पढ़ते रुक गई।
दिल भारी सा होने लगा था।
पता नहीं क्यों, पर इस कहानी से एक अजीब सा जुड़ाव महसूस हो रहा था।
मैंने आखिरी पन्ना खोला।
वहाँ सिर्फ एक लाइन थी —
“अगर तुम ये डायरी पढ़ रही हो… तो समझ लेना कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
मैंने जल्दी से डायरी बंद कर दी…
लेकिन अब सवाल सिर्फ एक था —
ये कहानी किसकी थी?
और इसमें मेरा नाम क्यों था?
उस रात मुझे नींद नहीं आई…
क्योंकि कभी कभी डर भूतों से नहीं,
सच से लगता है।
और शायद… मेरी ज़िंदगी की असली कहानी अब शुरू होने वाली थी।