Bayaan - Part 8 Radha rani Jha द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Bayaan - Part 8

Part 8 

 के अगले पन्ने पर राधा ने काँपते हुए हाथों से लिखे हुए शब्द पढ़े—

"माँ ने उस दिन जो बताया, उसे सुनने के बाद जैसे मेरी पूरी दुनिया ही बदल गई थी।"

मैं बार-बार खुद से यही कह रही थी कि शायद मैंने कुछ गलत सुन लिया है।

शायद माँ मज़ाक कर रही हैं।

शायद ऐसा नहीं हो सकता।

लेकिन सच वही था जो माँ ने कहा था।

उन्होंने मुझे समझाते हुए बताया—

"अभिन्नव की दादी, तुम्हारी नानी की सगी भाभी लगती हैं।"

"इसी रिश्ते से अभिन्नव तुम्हारे मामा लगेंगे।"

बस...

इतना सुनना था कि मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।

मुझे नहीं पता था कि मैं इतना क्यों रो रही थी।

शायद इसलिए क्योंकि जिस इंसान को मैं अपने दिल में एक अलग जगह दे चुकी थी...

वह मेरे लिए कभी वैसा हो ही नहीं सकता था जैसा मैंने सोचा था।

उस रात मैं बहुत रोई।

इतना रोई कि मेरी आँखें सूज गईं।

मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे सारे सपने एक ही पल में टूट गए हों।

डायरी के पन्ने पर जगह-जगह आँसुओं के निशान बने हुए थे।

यहाँ तक कि यह पढ़ते हुए भी राधा रानी की आँखें भर आईं।

उसने धीरे से पन्ने पर हाथ फेरा।

उसे महसूस हो रहा था कि यह सिर्फ़ लिखे हुए शब्द नहीं थे...

किसी का टूटा हुआ दिल था।

डायरी में आगे लिखा था—

"धीरे-धीरे मैंने खुद को समझाना शुरू किया।"

"मैंने अपने मन से कहा कि जो होना नहीं है, उसके बारे में सोचने का कोई फायदा नहीं।"

लेकिन दिल इतनी आसानी से कहाँ मानता है।

मैंने बाहर निकलना लगभग बंद कर दिया।

पहले जहाँ मैं छोटी-छोटी बातों पर बाहर चली जाती थी...

अब घंटों घर के अंदर ही रहती।

कुंदन कई बार आकर कहता—

"वो आए हैं।"

लेकिन मैं जाने से मना कर देती।

कभी खिड़की तक नहीं जाती थी।

कभी दरवाज़े तक नहीं जाती थी।

मैं बस खुद को उनसे दूर रखने की कोशिश करती रहती।

जब मैंने कुंदन को पूरे रिश्ते वाली बात बताई...

तो वह भी कुछ देर तक चुप रहा।

उसकी आँखों में भी उदासी साफ़ दिखाई दे रही थी।

शायद वह जानता था कि यह बात मेरे लिए कितनी बड़ी थी।

उसने बस इतना कहा—

"कुछ रिश्ते हमारे हाथ में नहीं होते।"

और मैं फिर रो पड़ी।

दिन बीतने लगे।

धीरे-धीरे।

बहुत धीरे-धीरे।

मैंने बहाने बनाना छोड़ दिया।

बिना वजह बाहर निकलना छोड़ दिया।

उन्हें देखने की कोशिश करना छोड़ दिया।

लेकिन सच तो यह था कि मैंने उन्हें चाहना नहीं छोड़ा था।

मैं बस उसे अपने दिल के सबसे शांत कोने में छिपाने की कोशिश कर रही थी।

फिर एक दिन...

कुंदन अचानक मेरे पास आया।

उसके चेहरे पर अजीब सा भाव था।

मैंने पूछा—

"क्या हुआ?"

वह कुछ पल तक मुझे देखता रहा।

फिर बोला—

"आज अभिन्नव तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे।"

मेरा दिल अचानक तेज़ धड़कने लगा।

मैंने घबराकर पूछा—

"क्या पूछा?"

कुंदन मुस्कुराया।

और फिर धीरे से बोला—

"उन्होंने कहा—"

"मेरी भगेनी दिखाई नहीं दे रही है आजकल?"

मैं कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप रह गई।

मुझे अचानक याद आया—

उन्हें तो पहले से ही पता था कि मैं उनकी भगेनी लगती हूँ।

यानी जब मैं उन्हें दूर से देखती थी...

तब वह यह सच पहले से जानते थे।

फिर भी...

उन्होंने मुझे नोटिस किया था।

फिर भी...

उन्हें मेरे दिखाई न देने का एहसास हुआ था।

और फिर भी...

उन्होंने मेरे बारे में पूछा था।

पता नहीं क्यों...

इतने दिनों बाद पहली बार मेरे चेहरे पर मुस्कान आई।

ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे टूटे हुए दिल पर धीरे से मरहम लगा दिया हो।

मैं जानती थी कि हमारे बीच वैसा कुछ नहीं हो सकता।

लेकिन यह जानकर अच्छा लगा कि मेरी मौजूदगी उनके लिए बिल्कुल अनजानी नहीं थी।

उस रात मैंने डायरी में लिखा—

"कभी-कभी किसी का हमें याद करना ही काफी होता है।"

"ज़रूरी नहीं कि हर कहानी प्यार तक पहुँचे..."

"कुछ कहानियाँ सिर्फ़ दिल में बस जाने के लिए होती हैं।"

लेकिन शायद...

मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

क्योंकि अगले ही दिन...

कुछ ऐसा हुआ...

जिसकी उम्मीद न मुझे थी...

न कुंदन को...

और शायद...

खुद अभिन्नव को भी नहीं।

डायरी के आख़िरी कोने में सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—

"अगले दिन पहली बार हमारी आँखें सिर्फ़ मिली नहीं थीं..."

"कुछ और भी हुआ था..."

"जारी रहेगा..." 📖✨ 

अगर आपलोगों को यह कहानी अच्छी लग रही हो तो अच्छे रेटिंग दीजिए जिससे मुझे आगे लिखने में खुशी हो 

और मैं आपलोगों को बता दूँ यह एक सच्ची कहानी है। ।