Bayaan - Part 11 Radha rani Jha द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Bayaan - Part 11

Part 11 

 का अगला पन्ना खोलते ही मैं कुछ देर तक उसे देखती रही।

पता नहीं क्यों...

अब इस कहानी को पढ़ते समय मुझे ऐसा महसूस होने लगा था कि मैं सिर्फ़ शब्द नहीं पढ़ रही हूँ।

जैसे इन पन्नों में छिपी भावनाएँ मुझ तक पहुँच रही हों।

कई बार तो मुझे खुद पर गुस्सा आने लगता था।

आख़िर मैं इतनी बेचैन क्यों हो जाती हूँ?

आख़िर अभिन्नव का नाम पढ़ते ही मेरा ध्यान बार-बार उन्हीं पर क्यों चला जाता है?

मैंने फिर खुद को समझाया और पढ़ना शुरू किया।

"9 मई 2025"

उस दिन जब मैं और नयना निमंत्रण देने अभिन्नव के घर गए थे, तब उनकी दादी आँगन में बैठी हुई थीं।

मैंने हाथ जोड़कर कहा—

"दादी, माँ ने आपको उपनयन में आने के लिए कहा है।"

उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—

"अब तो मेरे पैर भी बहुत दुखते हैं बेटा।"

"मुझसे ठीक से चला भी नहीं जाता।"

"मैं कैसे आऊँगी?"

लेकिन मैं कहाँ मानने वाली थी।

मैं बार-बार ज़िद करने लगी।

"नहीं दादी, आपको आना ही होगा।"

"सब आपका इंतज़ार करेंगे।"

"आप नहीं आएँगी तो अच्छा नहीं लगेगा।"

मैं अभी उनसे बहस ही कर रही थी कि तभी पीछे खड़े अभिन्नव ने पहली बार मेरी तरफ़ देखकर कहा—

"तुम जाओ आराम से..."

"मैं अपनी दादी को ले आऊँगा।"

बस...

इतना ही।

सिर्फ़ इतना सा वाक्य।

लेकिन उस समय मेरे लिए वह किसी खज़ाने से कम नहीं था।

मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे दिल के अंदर हजारों दीपक जला दिए हों।

पहली बार उन्होंने मुझसे सीधे बात की थी।

पहली बार उन्होंने मुझे "तुम" कहकर संबोधित किया था।

और पहली बार मुझे लगा कि शायद...

मैं उनके लिए पूरी तरह अनजान नहीं हूँ।

मैं पूरे रास्ते मुस्कुराती हुई घर लौटी।

नयना मुझे देख-देखकर हँस रही थी।

लेकिन उस दिन मुझे किसी की परवाह नहीं थी।

शाम होते-होते आनंद के उपनयन के बाद सबके लिए भोजन का आयोजन रखा गया।

गाँव के बहुत से लोगों को निमंत्रण दिया गया था।

और मैं...

मैं बस एक ही इंसान का इंतज़ार कर रही थी।

अभिन्नव का।

हर बार जब दरवाज़े पर कोई आता, मेरा दिल उछल पड़ता।

मैं दौड़कर देखने लगती।

लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगती।

समय बीतता गया।

लोग आते गए।

खाना खाते गए।

और धीरे-धीरे रात भी गहराने लगी।

लेकिन अभिन्नव नहीं आए।

जब मुझे यकीन हो गया कि अब वह नहीं आएँगे...

तो मेरी सारी खुशी फिर से उदासी में बदल गई।

जिस मुस्कान को मैंने पूरे दिन सँभालकर रखा था...

वह धीरे-धीरे गायब हो गई।

उस रात मैं बहुत देर तक जागती रही।

बार-बार यही सोचती रही—

"उन्होंने आने का वादा तो नहीं किया था..."

"फिर मैं उनसे इतनी उम्मीद क्यों कर रही थी?"

अगला दिन आया।

और मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि मेरे साथ क्या होने वाला है।

आनंद किसी काम से बाहर गया हुआ था।

उसी दौरान रास्ते में उसकी मुलाकात अभिन्नव से हो गई।

बाद में मुझे पता चला कि आनंद ने उन्हें वहीं रोक लिया था।

और फिर नयना से कहा—

"जा, राधा दीदी को बुला ला।"

नयना तो जैसे इसी मौके का इंतज़ार कर रही थी।

वह दौड़ती हुई मेरे पास आई।

मेरा हाथ पकड़ा।

और बिना कुछ बताए मुझे लगभग घसीटते हुए बाहर ले गई।

मैं कुछ समझ पाती उससे पहले...

उसने मुझे जाकर सीधे अभिन्नव के सामने खड़ा कर दिया।

उस पल...

मेरे शरीर ने जैसे काम करना बंद कर दिया।

मेरे कानों में आवाज़ें तो आ रही थीं...

लेकिन समझ कुछ नहीं आ रहा था।

दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि मुझे लग रहा था सब सुन लेंगे।

मैंने न अभिन्नव को ठीक से देखा।

न कुछ कहा।

न कुछ पूछा।

बस खड़ी रह गई।

एकदम चुप।

जैसे किसी ने मेरी सारी हिम्मत छीन ली हो।

कुछ देर बाद जब मुझे थोड़ा होश आया...

तो मैंने तुरंत आनंद से कहा—

"चलो घर चलते हैं।"

"बहुत देर हो रही है।"

असल में देर नहीं हो रही थी।

मैं बस वहाँ और रुक नहीं सकती थी।

मेरे अंदर इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि मैं अभिन्नव से बात कर पाती।

घर पहुँचते ही मैंने आनंद और नयना दोनों को खूब डाँटा।

"पहले बता तो देते!"

"मैं ऐसे ही चली गई!"

"मैं ठीक से तैयार भी नहीं थी!"

"बाल भी सही नहीं थे!"

"और पता नहीं कैसी लग रही थी!"

नयना और आनंद मेरी बातें सुनकर हँसते रहे।

लेकिन मुझे सच में गुस्सा आ रहा था।

या शायद...

शर्म आ रही थी।

उस रात मैं देर तक आईने में खुद को देखती रही।

और बार-बार वही पल याद करती रही।

यहाँ तक पढ़कर मैं भी अनजाने में मुस्कुरा दी।

पता नहीं क्यों...

राधा की खुशी और घबराहट दोनों इतनी सच्ची लग रही थीं कि जैसे मैं उन्हें महसूस कर सकती थी।

लेकिन अगले पन्ने के आख़िर में जो लिखा था...

उसे पढ़कर मेरे हाथ अपने आप रुक गए।

डायरी में लिखा था—

"अगले दिन मैं जितनी खुश थी..."

"उतनी शायद पहले कभी नहीं हुई थी।"

"क्योंकि मुझे लगा था कि अब सब कुछ पहले से बेहतर होने वाला है।"

"लेकिन मुझे क्या पता था..."

"कि अगले ही दिन अभिन्नव एक ऐसी बात कहने वाले थे..."

"जिसने मेरी पूरी सोच बदल दी..."

"और शायद उसी दिन मेरी कहानी ने अपना सबसे बड़ा मोड़ लिया..."

"जारी रहेगा..." 📖✨