Part 10
का अगला पन्ना खोलते ही मेरा दिल फिर से तेज़ धड़कने लगा।
पता नहीं क्यों...
जैसे-जैसे मैं इस कहानी में आगे बढ़ रही थी, मुझे बार-बार ऐसा महसूस हो रहा था कि मैं इन बातों को सिर्फ़ पढ़ नहीं रही...
बल्कि कहीं न कहीं इन्हें महसूस भी कर रही हूँ।
कुछ पंक्तियाँ तो ऐसी थीं जिन्हें पढ़कर लगता था कि मैं पहले भी इन्हें जानती थी।
लेकिन कैसे?
इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था।
मैंने सिर झटककर फिर से पढ़ना शुरू किया।
"मेरे भाई आनंद के उपनयन संस्कार का दिन आ चुका था।"
सुबह से ही घर में बहुत चहल-पहल थी।
सब लोग तैयार होकर जानकी मंदिर जाने वाले थे।
उस दिन मैंने अपना सबसे पसंदीदा लहंगा पहना था।
सच कहूँ तो...
उस दिन मुझे अपने कपड़ों से ज़्यादा इस बात की खुशी थी कि शायद अभिन्नव भी वहाँ आएँगे।
जब हम सब जानकी मंदिर पहुँचे...
तो मेरी नज़र सबसे पहले उन्हें ही ढूँढ़ने लगी।
और फिर...
मैंने उन्हें देख लिया।
बस उसी पल मेरा चेहरा खिल उठा।
क्योंकि उस दिन सुबह से मैं उन्हें अपने घर पर नहीं देख पाई थी।
और अब अचानक उन्हें सामने देखकर ऐसा लग रहा था जैसे दिन की सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो।
पूजा समाप्त हुई।
धीरे-धीरे लोग घर लौटने लगे।
मैं भी अपने परिवार के साथ वापस चलने लगी।
लेकिन तभी...
मेरी नज़र पीछे गई।
कुंदन और अभिन्नव हमारे पीछे-पीछे आ रहे थे।
शायद किसी और कारण से...
लेकिन उस समय मेरे दिल ने कोई और ही कहानी बना ली थी।
मेरे कदम अपने आप धीमे हो गए।
मैं चाहती थी कि यह रास्ता कभी खत्म ही न हो।
उस समय जो खुशी मुझे महसूस हो रही थी...
उसे शब्दों में लिख पाना आज भी मुश्किल है।
ऐसा लग रहा था जैसे मैं धरती पर चल ही नहीं रही।
रात हुई।
और हमेशा की तरह कुंदन हमारे घर आया।
मैं तो जैसे उसी का इंतज़ार कर रही थी।
जैसे ही वह आया, मैं उत्साह में उसके पास पहुँच गई।
मैंने जल्दी-जल्दी पूछा—
"क्या बात कर रहे थे?"
"मेरे पीछे क्यों आ रहे थे?"
"क्या मैं अच्छी लग रही थी?"
"सच बताना... बहुत सुंदर लग रही थी ना?"
लेकिन उस दिन कुंदन मुस्कुरा नहीं रहा था।
उसका चेहरा अजीब तरह से उदास था।
मैंने घबराकर पूछा—
"क्या हुआ?"
कुछ देर चुप रहने के बाद उसने कहा—
"राधा... वो तुम्हें कभी पसंद नहीं करेंगे।"
मेरे कानों को जैसे विश्वास ही नहीं हुआ।
मैं कुछ पल तक उसे देखती रह गई।
फिर धीरे से पूछा—
"क्यों?"
तब कुंदन ने जो बताया...
उसे सुनकर जैसे मेरी सारी खुशी एक पल में बिखर गई।
उसने कहा—
"वो तुम्हारे पीछे नहीं आ रहे थे।"
"वो उन लड़कियों में से किसी को पसंद करते थे जो तुम्हारे साथ थीं।"
मेरा दिल जैसे बैठ गया।
कुंदन आगे बोला—
"उन्होंने मुझसे कहा था कि उनमें से एक लड़की दिखाओ।"
"मैंने मज़ाक में कहा कि अपनी भगेनी को ही देख लीजिए।"
"लेकिन उन्होंने तुरंत कहा—"
"अरे नहीं... वो तो मेरी भगेनी है। उसे कैसे पसंद कर सकता हूँ?"
बस...
उसके बाद मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया।
उस रात मेरी सारी खुशी उदासी में बदल गई।
मैं देर तक रोती रही।
कभी अपनी किस्मत को दोष देती।
कभी उस रिश्ते को।
और कभी खुद को समझाने की कोशिश करती।
लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था।
अगले दिन मुझे और मेरी ममेरी बहन नयना को गाँव के कुछ घरों में निमंत्रण देने जाना था।
उन्हीं घरों में अभिन्नव का घर भी था।
सच कहूँ तो...
मैं जितनी घबराई हुई थी, शायद उतनी पहले कभी नहीं हुई थी।
जब हम उनके घर पहुँचे...
तो आँगन में उनकी दादी बैठी थीं।
घर में और कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
हम उनसे बात कर ही रहे थे कि तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ आई।
मैंने मुड़कर देखा।
और फिर...
कुछ पल के लिए सब कुछ जैसे रुक गया।
भीषण गर्मी का दिन था।
और अभिन्नव हाथ में दूध का बर्तन लिए घर लौट रहे थे।
उन्होंने सिर्फ़ एक साधारण सी बनियान पहन रखी थी।
धूप और गर्मी की वजह से उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं।
उनके बाल बिखरे हुए थे।
और चेहरे पर वही सादगी थी...
जिसने जाने कब से मेरे दिल में जगह बना ली थी।
मैं उन्हें देखती ही रह गई।
शायद कुछ ज़्यादा देर तक।
क्योंकि अचानक उन्होंने भी मेरी तरफ़ देखा।
इस बार सिर्फ़ एक पल के लिए नहीं।
उन्होंने मुझे ध्यान से देखा।
इतना ध्यान से...
जितना पहले कभी नहीं देखा था।
मेरा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि मुझे लग रहा था सब सुन लेंगे।
और फिर...
पहली बार...
उन्होंने मुझसे सीधे बात की।
उनके मुँह से निकले पहले शब्द सुनकर मैं कुछ सेकंड तक समझ ही नहीं पाई कि क्या जवाब दूँ।
लेकिन जो उन्होंने कहा...
उसने मेरी सारी उदासी पल भर में गायब कर दी।
उस एक वाक्य ने मेरे चेहरे पर ऐसी मुस्कान ला दी...
जो शायद कई दिनों से खो गई थी।
यहाँ तक पढ़कर मैंने अनजाने में डायरी को थोड़ा और कसकर पकड़ लिया।
पता नहीं क्यों...
मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं भी उस जवाब को सुनना चाहती हूँ।
उतनी ही बेचैनी से...
जितनी उस दिन राधा सुनना चाहती होगी।
लेकिन अगले पन्ने पर सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—
"9 मई 2025..."
"वह दिन जब अभिन्नव ने पहली बार मुझसे बात की थी..."
"और उनके पहले शब्दों ने मेरे दिल की दुनिया बदल दी थी..."
"लेकिन मुझे नहीं पता था कि उन्हीं शब्दों के बाद मेरी कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुँचने वाली है..."
"जहाँ से वापस लौटना शायद किसी के बस में नहीं था..."
"जारी रहेगा..." 📖✨