देसी जुगाड बड़ा कमाल Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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देसी जुगाड बड़ा कमाल

लोक कथा  देशी जुगाड बड़ा कमाल एक समय की बात है। किसी गाँव में एक पंडित जी रहते थे। वो थोड़ा कम पढ़े-लिखे थे लेकिन बुद्धि बहुत थी उनके पास। आध्यात्मिक ज्ञान भी था। गाँव में उनके ज्ञान का डंका बजता था। कोई भी ग्रामीण तिथि पूछने आता तो उन्हें पत्रा पढ़ना भी नहीं आता था। उसका उन्होंने एक जुगाड़ कर रखा था। हिन्दी माह में दो पक्ष होते हैं। प्रत्येक पक्ष में पन्द्रह तिथि होती हैं और पूर्णिमा को मिलाकर 16 तिथि होती हैं। पंडित जी एक कमरे में 15 बड़े डंडे रखे हुए थे। पूर्णिमा का पता लगाना तो आसान है, उस दिन पूरा चाँद होता है। तो उन्होंने कमरे की आमने-सामने की दोनों दीवारों पर 15-15 डंडे खड़े कर रखे थे। एक दिन गुजरने पर एक डंडा नीचे गिरा देते। जितने डंडे खड़े होते उतनी ही तारीख गिनकर बता देते।  एक दिन क्या हुआ, उनके यहाँ मेहमान आए हुए थे। उनके बच्चे बड़े शैतान थे। उन्होंने उस कमरे को जिज्ञासावश खोला तो उसमें बहुत सारे डंडे रखे थे, कुछ नीचे पड़े थे। बच्चों ने खेल-खेल में सभी डंडे एक जगह मिला दिए।  उसी दिन पंडित जी के घर एक ग्रामीण तिथि पूछने आया। पंडित जी उसे सम्मान के साथ बिठाया और कहा - "आप बैठिए, मैं पंचांग देखकर आता हूँ।"  पंडित जी ने अन्दर जाकर देखा तो सारे डंडे एक साथ जमीन पर गिरे पड़े थे। उन्हें कुछ न सूझा, सोच में पड़ गए। अब क्या बताऊँ यजमान को। सच बोलता हूँ तो बड़ी बदनामी होगी। उन्हें एक उपाय सूझा।  पंडित जी ने बाहर आकर यजमान से बोला - "आज तो ग्रहों की बड़ी विचित्र स्थिति है। सभी ग्रह एक साथ आ गए हैं। आज है घपड़ चौदस की मावस'। आज के दिन गंगा स्नान करने से बहुत पुण्य मिलता है।"  यह खबर पूरे गाँव में फैल गई। सभी ग्रामीण गंगा स्नान के लिए गंगा घाट जाने लगे।  किसी दूसरे गाँव के पंडित जी उस गाँव से गुजर रहे थे। उन्होंने गंगा घाट पर इतनी भीड़ देखी तो रुककर एक ग्रामीण से पूछा - "भाई, आज कौन सी तिथि है, जो यहाँ इतनी भीड़ है गंगा नहाने के लिए?"  उस व्यक्ति ने बताया कि आज तो घपड़-चौदस की मावस' है। आज के दिन गंगा-नहाने का बहुत महत्व है। पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए पर बोले कुछ नहीं, क्योंकि उनका मानना था मूर्खों से बहस नहीं करनी चाहिए।  एक दिन पंडित जी दूसरे गाँव से बाजार करके लौट रहे थे तो रास्ते में उन्हें एक गधा दिखाई दिया जो उनका रास्ता रोक रहा था। जैसे ही पंडित जी ने उस गधे को मारने के लिए डंडा उठाया, वो पास की ईख में घुस गया। अब उस गधे से निकला ना जाए।  पंडित जी तो घर आकर सो गए और वो गधे वाली बात भूल गए। अगली सुबह एक धोबी आया। उस समय उनके पास, वो गधा इसी धोबी का था। धोबी वहीं पंडित जी अपनी साधना कर रहे थे। धोबी वहीं इंतजार करते हुए बैठ गया। जब पंडित जी ने आँखें खोलीं तो धोबी बोला - "पंडित जी, एक विकट समस्या आ गई है। मेरा गधा गुम हो गया है कल से। मिल ही नहीं रहा। अब बिना गधे के मेरा व्यापार कैसे होगा?"  पंडित जी ने कुछ देर आँखें बंद की, सोचा तो उन्हें कल रात वाली गधे की घटना याद आई।  उन्होंने अपनी आँखें खोलीं, धीरे से मुस्कुराए और बोले - "चिंता मत करो, उत्तर दिशा में जाओ, दाएँ हाथ पर जो पहला ईख का खेत है, उसमें ही तुम्हारा गधा फँसा पड़ा है।" धोबी ऐसा ही करता है। धोबी को गधा मिल जाता है। और पूरे गाँव में पंडित जी का यश फैल जाता है।  इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किताबी ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है अनुभवी ज्ञान और बुद्धि। डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi