---बुआ - महक की कहानी
आज सबसे उपेक्षित रिश्ता है बुआ। कोई नहीं बुलाना चाहता बुआ को। बुआ के नाम से ही घर की बहुओं के मुँह बन जाते हैं। पहले होती होंगी बुआ रुआब, मैंने तो आज तक नहीं देखी। मुझे लगता है पहले बुआ मायके आकर भूल जाती होंगी कि अब वो मेहमान हैं, ये उनका घर नहीं। और अनजाने में ज़िद करती होंगी और भाभियाँ, उनको गलत समझती होंगी। हमारे समाज का ताना-बाना ही कुछ ऐसा बुना गया है कि शादी के बाद अधिकतर लड़कियों को पराया ही महसूस होता है। कुछ अपवाद छोड़कर अधिकतर घरों में देखा गया है कि शादी के बाद लड़की को घर का सदस्य ही नहीं मानते, उसे दूसरे घर से आया मेहमान ही समझते हैं। मेहमान मतलब कुछ समय के लिए आओ, खाओ और अपने घर को जाओ। उसे घर की सारी बातें छुपाने लगते हैं। उन्हें अब किसी भी वार्तालाप में शामिल नहीं किया जाता। बेचारी बुआ ना मायका अपना, ना ससुराल अपना। ससुराल में भी उसके साथ पराये जैसा ही व्यवहार होता है। बस घर के सारे काम करो गूँगी बनकर, पर कुछ ना बोलो, कुछ ना सुनो। यह कहानी भी ऐसी ही लड़की की है। नाम था उसका महक। चार भाई-बहनों में सबसे छोटी, सबकी लाडली। कभी पानी भी खुद लेकर नहीं पिया उसने मायके में। बड़ी बहन की लाडली थी वो, उसका सारा काम करके देती। इसीलिए महक थोड़ा आलसी भी हो गई थी क्योंकि सब कुछ करा-कराया मिल जाता था। लेकिन पढ़ाई में अच्छी थी। अच्छे मार्क्स लाती थी। जिन्दगी में मोड़ तब आया जब उसकी बड़ी बहन की शादी हो गई। घर की सारी जिम्मेदारी उसने अपने कंधों पर उठा ली। सारा काम बखूबी करती। सबको आश्चर्य भी होता कि कैसे उसने सारा घर सँभाला हुआ था। लेकिन महक की छोटी भाभी, जो बहुत आलसी थी, घर का कुछ काम ना करती। हमेशा पढ़ाई का बहाना लेकर पड़ी रहती। महक से जलती थी। उसे नीचा दिखाने का कोई मौका ना छोड़ती। महक के मम्मी-पापा पहले से ही अलग रहते थे। उन्हें घर की जिम्मेदारियों से कोई मतलब नहीं था। महक के पापा भी भाभी की बातों में आ जाते और महक को ही डाँटते। डरते थे बहू को डाँटने से कि उल्टा जवाब दे दिया तो समाज क्या कहेगा। किसी ना किसी बात पर महक की डांट पड़ती रहती। अपनी गलतियों का ठीकरा भी महक के सर ही फोड़ देती। महक की कोई सुनने वाला नहीं था। वह अपने ही घर में उपेक्षित सी हो गई थी। पापा ने बिना महक से पूछे उसका रिश्ता तय कर दिया। लेकिन महक ने कुछ ना कहा। उसने सोचा 'यही कौन सा मायके में, सुख है।ईश्वर की इच्छा मानकर उसने शादी के लिए हाँ कर दी। लेकिन उसके दुःख अभी खत्म कहाँ हुए थे। शादी के एक महीना पहले बड़ी भाभी भी आ गई। दोनों बहुएँ अपनी-अपनी गॉसिप में व्यस्त रहतीं या एक कमरे में दुबकी रहतीं सबकी चुगली करती थीं।महक से कभी नहीं पूछा कि उसे क्या चाहिए। वो दोनों तो जैसे मेहमान बनकर आई थीं। महक की विदाई के समय भी सोती रहीं, उठकर नहीं आईं। महक का मन अपने इन दोगले रिश्तों से भर चुका था। जब छोटी भाभी के घर लड़का हुआ तो उसने दोनों ननदों को बुलावा भेजा पर भाई को नहीं भेजा बुलाने। महक की तो तब नई-नई शादी हुई थी वो नहीं आ पाई क्योंकि उसके ससुराल वालों का मानना था कि लड़का होने पर भाई को आना चाहिए लीबाने। वो अकेली कैसी आती। मन मारकर रह गई। बस बड़ी बहन आई थी। सबके लिए कपड़े और भतीजे के लिए चाँदी के कड़े भी लाई थी। लेकिन उसकी भाभी खुश ना थी। छोटी भाभी लालची थी। महक के भाई को भड़काने लगी जब महक आई ही नहीं तो कैसा नेग। उसे कुछ नहीं देंगे। वैसे भी तुम्हारी दो-दो बहनें हैं दोनों को कपड़े देंगे तो बजट खराब होगा। बड़ी ननद ने यह सब सुन लिया वो अगले दिन ही काम का बहाना कर अपने घर चली गई। महक जब भी अपने मायके आती उसे परायापन फील होता। उसकी भाभी ने उसका कमरा अपने बच्चों को दे दिया और उसका सारा सामान कबाड़ी को बेच दिया। महक जब आती तो उसका सामान एक बैग में ही पैक रहता। उससे पूछकर खाना भी नहीं बनता। महक ने अब धीरे धीरे मायके आना बंद कर दिया। राखी डाक से ही भेज देती। उसके दोनों भाइयों ने भी नहीं पूछा क्यो बात है क्यों नहीं आई। समय तेजी से बदलता है। दोनों भाभियों के बच्चों की भी शादी हो जाती हैं। अब उनकी बेटियां मायके आती हैं। जब उनके बेटे अपनी बहनों के साथ उपेक्षा भरा व्यवहार करते हैं। तब महक के भाइयों को महक की याद आती है।कुछ महीने बाद रक्षाबंधन पर महक के भाई-भाभी खुद उसके ससुराल आए। आँखें झुकी हुई थीं। हाथ में मिठाई का डिब्बा और महक के बचपन की वही गुड़िया थी, जिसकी एक टाँग टूटी थी। भाई ने रुंधे गले से कहा माफ करना बहन आने में देर हो गई लेकिन हम अपनी गलती पर शर्मिंदा है।"हमें समझ आ गया है बहन, बहने अपना बचपन जीने मायके आती हैं। कुछ लेने नहीं आतीं। वो तो अपने भाई-भाभियों को लाड़-दुलार, दुआएँ और अनमोल उपहार देकर जाती हैं। और हाँ बहन, अब हमने घर की बेटियों और बुआ के लिए एक कमरा भी सजाकर तैयार किया है जो हमेशा घर की बुआ/बेटियों का रहेगा। हमें समझ आ गया है कि बुआ मेहमान नहीं, घर की नींव होती है। घर की जान होती है।" महक ने भाई को गले लगा लिया। बरसो की नाराजगी आंसू में पिघल गई।आँसू तो आए, पर इस बार ये गम के नहीं, अपने मायके के वापस मिलने की खुशी के थे। समाप्त ---
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi