खोटा सिक्का - 2 prem chand hembram द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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खोटा सिक्का - 2


चंद रुपयों से न तो पेट भर भोजन मिल सकता था और न ही रेल की टिकट खरीदी जा सकती थी। भूख, अपमान और अनिश्चित भविष्य की चिंता उसके साथ-साथ चल रही थी। किंतु भीतर कहीं एक सूक्ष्म स्वर उसे पुकार रहा था। न जाने क्यों उसके कदम काशी की ओर मुड़ गए।
उसने दूर आकाश की ओर देखा, मन ही मन माता-पिता को प्रणाम किया और बनारस जाने वाली ट्रेन में चढ़ गया।
कई दिनों की भूख और थकान ने उसके चेहरे की चमक छीन ली थी। आँखें धँस गई थीं और शरीर दुर्बल हो चुका था। टिकट न होने के कारण जब टीटीई ने उसे डाँटा और जुर्माना लगाने की बात कही, तब शिबू का सिर लज्जा से झुक गया।
उसी समय सामने बैठे एक सज्जन ने आगे बढ़कर उसकी टिकट बनवा दी।
शिबू ने कृतज्ञ दृष्टि से उनकी ओर देखा।
कुछ देर बाद उन सज्जन ने स्नेहपूर्वक पूछा, "बेटा, कहाँ जा रहे हो?"
न जाने क्यों, उनके अपनत्व भरे स्वर ने शिबू के मन का बाँध तोड़ दिया। उसने अपने घर, माता-पिता, अपमान और घर छोड़ने की पूरी घटना उन्हें बता दी।
उनका नाम रामगोपाल था।
रामगोपाल वर्षों से परित्यक्त और दूध देना बंद कर चुकी गायों की सेवा में लगे थे। देश के विभिन्न भागों में उनकी गौशालाएँ थीं। अनेक संस्थाएँ और दानदाता इस कार्य में उनका सहयोग करते थे। उनका जीवन सेवा और करुणा को समर्पित था।
शिबू की बात सुनकर वे देर तक मौन रहे।
फिर मुस्कराते हुए बोले, "शायद ईश्वर तुम्हें किसी विशेष उद्देश्य से यहाँ तक लाए हैं।"
इसके बाद उन्होंने शिबू को एक ऐसे व्यक्ति के विषय में बताया जिन्हें सब प्रेम से 'चौधरी चाचा' कहकर पुकारते थे।
कुछ दिनों बाद जब शिबू की उनसे भेंट हुई तो वह आश्चर्यचकित रह गया।
चौधरी चाचा उसके ही आसपास के क्षेत्र के निवासी थे और पंडित रामशंकर झा को भली-भाँति जानते थे।
मध्यम कद, तेजस्वी मुखमंडल और आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी चौधरी चाचा को देखते ही मन में श्रद्धा जाग उठती थी। युवावस्था में ही उन्होंने गृहस्थ जीवन का मोह त्याग दिया था। वर्षों की साधना और सेवा के पश्चात वे अनेक गौशालाओं तथा एक मठ के संचालन का दायित्व संभाल रहे थे।
रामगोपाल ने जब शिबू का परिचय उनसे कराया तो चौधरी चाचा की दृष्टि देर तक उसी पर टिकी रही।
प्रकृति और जीवों के प्रति ऐसा निष्कपट प्रेम, मन में ईर्ष्या-द्वेष का नामोनिशान नहीं, लोभ की गंध तक नहीं—ऐसा व्यक्तित्व उन्हें विरले ही देखने को मिला था।
एक दिन संध्या के समय गौशाला का कार्य समाप्त होने के बाद चौधरी चाचा ने शिबू को अपने पास बुलाया।
उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कुछ क्षण तक उसकी आँखों में देखते रहे।
फिर धीमे स्वर में बोले—
"बेटा, क्या तुम जानते हो कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसकी डिग्रियों से नहीं, उसके हृदय से आँका जाता है?"
शिबू ने विस्मय से उनकी ओर देखा।
चौधरी चाचा के मुख पर एक रहस्यमयी मुस्कान उभर आई।
उन्होंने कहा—
"लगता है ईश्वर ने तुम्हारे लिए कोई विशेष मार्ग निर्धारित कर रखा है।"
और फिर उन्होंने शिबू से एक ऐसा प्रश्न पूछा, जिसने उसके जीवन की दिशा ही बदल दी...
चौधरी  "शिबू तुम्हारा यहां आना मुझे से मिलना यह कोई संयोग नहीं है बेटा " 
भगवान की बड़ी निराली इच्छा है वह कोई बड़ा काम तेरे हाथों करना चाहता है "
तुम खुद को नहीं जानते शिबू तुम्हारे पास जो संपत्ति है वह वर्षों के तपस्या के बाद भी नदीब नहीं होती '
क्या तुम नहीं देखते हो ? कितने ऊंचे अफसर बड़ी कंपनियों के मालिक कई प्रतिष्ठित नेता मठ में आते हैं।प्रणाम करते हैं मुझे से आशीर्वाद लेते हैं ।" 
शिबू "हां चाचा मेरे मन में यह प्रश्न कई दिनों से उठ रहा था " 
चौधरी " बेटा शिक्षा के बिना मानुष अंधा होता है और विद्या के बिना ......
क्रमशः....…
जयगुरु 🙏 🙏 🙏 
वंदे पुरुषोत्तमम 
चंद्रा सत्संग केंद्र बोकारो झारखंड