खोटा सिक्का - 3 prem chand hembram द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

खोटा सिक्का - 3


खोटा सिक्का – भाग 03
संध्या का समय था। गौशाला में गायों को चारा दिया जा चुका था। पश्चिम दिशा में डूबते सूर्य की लालिमा पूरे आकाश में फैल गई थी। शिबू गौशाला के बाहर एक पुराने नीम के पेड़ के नीचे बैठा था। उसके मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे।
तभी चौधरी चाचा वहाँ आए और उसके पास बैठ गए।
कुछ क्षण मौन रहने के बाद वे बोले—
"बेटा, शिक्षा के बिना मनुष्य अंधा होता है और विद्या के बिना जीवन में प्रकाश नहीं मिलता। ज्ञान का प्रकाश अनेक बार आँखों का कार्य करता है।"
शिबू ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनने लगा।
चौधरी चाचा ने आगे कहा—
"आज लोग शिक्षा को केवल नौकरी पाने का साधन समझते हैं। परंतु शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को मनुष्य बनाना है। डिग्री से रोजगार मिल सकता है, लेकिन चरित्र नहीं।"
शिबू के मन में अपने पिता की बातें गूँज उठीं—
"तू किसी काम का नहीं है... खोटा सिक्का है।"
उसका सिर झुक गया।
चौधरी चाचा ने उसके मन को पढ़ लिया।
"क्या तुम जानते हो, लोग तुम्हें खोटा सिक्का क्यों समझते हैं?"
शिबू ने धीमे स्वर में कहा—
"क्योंकि मैं सफल नहीं हो पाया।"
चौधरी चाचा मुस्कराए।
"नहीं बेटा। क्योंकि संसार अधिकांशतः उसी वस्तु का मूल्य समझता है जिससे तत्काल लाभ मिले। बीज को लोग साधारण समझते हैं, क्योंकि उसके भीतर छिपे वृक्ष को नहीं देख पाते।"
शिबू मौन रहा।
"तुम्हारे भीतर ईमानदारी है, संवेदना है, सेवा का भाव है। ये गुण बाज़ार में नहीं बिकते, इसलिए लोग इनकी कीमत नहीं समझते।"
फिर उन्होंने मठ के प्रांगण में लगी संतों की प्रतिमाओं की ओर संकेत करते हुए कहा—
"देखो बेटा, इनमें से कितनों के पास बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ नहीं थीं, फिर भी संसार उन्हें सम्मान देता है। अपने आपको कमजोर समझना उस परमसत्ता की कारीगरी पर प्रश्नचिह्न लगाने जैसा है। सृष्टि सुंदर है, अंतर केवल दृष्टि का होता है। लाल चश्मा पहनोगे तो संसार लाल दिखाई देगा, काला चश्मा पहनोगे तो सब कुछ काला।"
उनकी बातें शिबू के हृदय में उतरती चली गईं।
अगले दिन से उसने गौशाला के कार्यों के साथ-साथ मठ के पुस्तकालय में भी समय बिताना प्रारंभ किया।
वहाँ उसने इतिहास, कृषि, समाज, धर्म, संतों की जीवनी और विज्ञान से संबंधित अनेक पुस्तकें पढ़ीं।
जितना वह पढ़ता गया, उतना ही उसे महसूस होने लगा कि महानता डिग्रियों से नहीं, बल्कि विचारों और कर्मों से जन्म लेती है। धीरे-धीरे उसके भीतर का भ्रम दूर होने लगा। उसका आत्मविश्वास लौटने लगा।
उसे समझ आने लगा कि मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति धन नहीं, बल्कि उसका चरित्र और उसके द्वारा समाज को दिया गया योगदान है।
समय के साथ शिबू का हृदय दूसरों के दुःख के प्रति दया और करुणा से भरने लगा। वह अब केवल अपने बारे में नहीं सोचता था।
एक दिन मठ के प्रांगण में बैठा वह दूर क्षितिज की ओर देख रहा था। अचानक उसे अपना गाँव याद आ गया।
गाँव की पगडंडी...
बरसात के बाद मिट्टी की सोंधी सुगंध...
पीपल का विशाल वृक्ष...
और उसी मिट्टी में बीता उसका बचपन।
स्मृतियों के साथ एक चेहरा भी उसकी आँखों के सामने उभर आया—सुचित्रा।
उसे याद आया कि जब संसार उसे असफल और निकम्मा समझने लगा था, तब भी सुचित्रा ने उसके भीतर छिपे मनुष्य को पहचाना था। उसने कभी उसका उपहास नहीं किया।
शिबू की आँखें नम हो गईं।
उसने मन ही मन कहा—
"जिस विश्वास को सुचित्रा ने मेरे ऊपर रखा है, उसे मैं कभी टूटने नहीं दूँगा।"
उसी क्षण उसके भीतर एक नया संकल्प जन्मा।
"मैं सिद्ध कर दूँगा कि मनुष्य का मूल्य केवल डिग्रियों से नहीं आँका जाता। चरित्र, परिश्रम और कर्म भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। मैं ऐसा जीवन जीकर दिखाऊँगा कि समाज स्वयं अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करने को विवश हो जाए।"
उसे सहकारी दुग्ध उत्पादन की योजना याद आई।
उसने निश्चय किया कि जब समय आएगा, वह पूरे मन से इस कार्य में सुचित्रा का साथ देगा और गाँव के युवाओं को भी स्वावलंबन की राह दिखाएगा।
परंतु अगले ही क्षण उसका मन उदास हो उठा।
"मैं वापस कैसे जाऊँगा?"
पिता को दिया गया वह वचन उसके कानों में गूँज उठा।
घर छोड़ते समय उसने प्रण किया था कि वह तब तक वापस नहीं लौटेगा, जब तक स्वयं को योग्य सिद्ध न कर दे।
दूसरी ओर सुचित्रा प्रतीक्षा कर रही थी।
समय बीत रहा था, परंतु उसके मन का संघर्ष समाप्त नहीं हो रहा था।
उसने आकाश की ओर देखा और धीरे से कहा—
"प्रभु, मुझे सही मार्ग दिखाइए। मैं लौटना चाहता हूँ, परंतु खाली हाथ नहीं।"
उधर गाँव में...
रामशंकर झा अपने आँगन में चारपाई पर बैठे थे।
रात का अंधकार धीरे-धीरे फैल रहा था, परंतु उनके मन का अंधकार उससे भी अधिक गहरा था।
अनायास उनकी दृष्टि मुख्य द्वार पर चली गई।
उन्हें याद आया—वही दरवाज़ा जहाँ से एक दिन शिबू घर छोड़कर चला गया था।
उनके मन में शिबू का बचपन उभर आया।
कभी वही बालक उनकी उँगली पकड़कर मेले जाता था।
कभी विद्यालय से लौटकर अपनी कॉपी दिखाता था।
कभी गलती करने पर डरकर माँ के पीछे छिप जाता था।
रामशंकर झा ने गहरी साँस ली।
आज पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि शायद उन्होंने अपने पुत्र को समझने में भूल की थी।
उधर रसोई में पद्मावती देवी चुपचाप बैठी थीं।
भोजन परोसते समय आज भी उनकी आदत नहीं बदली थी।
वे अनजाने में एक थाली अधिक निकाल लेतीं और फिर उसे वापस रख देतीं।
उनकी आँखें भर आईं।
"पता नहीं मेरा बेटा कहाँ होगा... खाना खाता भी होगा या नहीं..."
धीरे-धीरे आँसू उनके गालों पर बह निकले।
उन्होंने शिबू की पुरानी पुस्तकों को निकाला।
एक पुस्तक के भीतर से एक कागज़ निकला।
उस पर बचपन के टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—
"मैं बड़ा होकर अच्छा इंसान बनूँगा।"
कागज़ पढ़ते ही उनका हृदय भर आया।
उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना की—
"हे प्रभु, मेरे बेटे की रक्षा करना।"
उसी समय सैकड़ों किलोमीटर दूर शिबू भी खुले आकाश के नीचे बैठा था।
आज उसे माँ की बहुत याद आ रही थी।
माँ के हाथ की रोटी...
पिता की डाँट...
गाँव की पगडंडियाँ...
बचपन के मित्र...
सब कुछ उसकी आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूम रहा था।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
उसने आकाश की ओर देखते हुए कहा—
"माँ... मैं लौटूँगा अवश्य। लेकिन तब, जब स्वयं को सिद्ध कर सकूँगा।"
कुछ दिनों बाद शिबू ने आसपास के गाँवों का भ्रमण किया।
उसने देखा कि अनेक युवक बेरोजगारी, नशे और निराशा में डूबते जा रहे हैं।
उसका मन बेचैन हो उठा।
उसने सोचा—
"यदि मैं अकेला सफल भी हो जाऊँ, तो उससे क्या होगा? जिस समाज ने मुझे जन्म दिया, उसके लिए भी कुछ करना चाहिए।"
अगले दिन उसने अपनी बात चौधरी चाचा के सामने रखी।
चौधरी चाचा की आँखों में संतोष झलक उठा।
"यही वह प्रश्न है जिसकी प्रतीक्षा मैं कर रहा था।"
उन्होंने अपनी पुरानी अलमारी से एक डायरी निकाली और शिबू को सौंप दी।
डायरी के पहले पृष्ठ पर लिखा था—
"शिक्षा, संस्कार और स्वावलंबन — समाज निर्माण के तीन आधार स्तंभ हैं।"
शिबू देर तक उस वाक्य को पढ़ता रहा।
उसे ऐसा लगा जैसे उसके जीवन का उद्देश्य धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहा है।
परंतु उसे यह नहीं मालूम था कि भाग्य ने उसके लिए अभी एक और कठिन परीक्षा तैयार कर रखी है।
कुछ ही दिनों में अतीत का एक ऐसा व्यक्ति उसके सामने आने वाला था, जो उसके जीवन की दिशा ही बदल देगा...
क्रमशः...
जयगुरु 🙏 🙏 🙏 
वंदे पुरुषोत्तमम 
( चंद्रा सत्संग केंद्र )
बोकारो  झारखंड