भोर की प्रार्थना समाप्त होते ही शिबू बिना किसी को कुछ बताए मठ से निकल पड़ा। पूर्व दिशा में उगते सूर्य की सुनहरी किरणें धरती पर बिखर रही थीं। पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को पवित्र बना रहा था।
चलते-चलते वह पास के एक बड़े गाँव में पहुँच गया। सड़क पर बच्चों से भरी निजी विद्यालयों की बसें दौड़ रही थीं। मंदिरों के लाउडस्पीकरों से भक्ति के नाम पर फिल्मी धुनों पर आधारित गीत गूँज रहे थे। शिबू कुछ क्षण रुक गया। उसके चेहरे पर आश्चर्य और चिंता दोनों के भाव थे।
वह चौराहे की एक चाय की दुकान पर बैठ गया।
चाय अभी सामने आई ही थी कि सफेद दाढ़ी वाले एक बुज़ुर्ग मुस्लिम सज्जन ने मुस्कराकर पूछा—
"बेटा, तुम इस गाँव में नए लगते हो। किसके यहाँ आए हो?"
शिबू ने आदरपूर्वक उत्तर दिया—
"चाचा, मैं किसी के यहाँ नहीं आया हूँ। पास के मठ में रहता हूँ।"
बुज़ुर्ग ने स्नेह से पूछा—
"अच्छा... फिर इधर आने का क्या प्रयोजन है?"
शिबू ने शांत स्वर में कहा—
"चाचा, मठ में प्रतिदिन वेद-मंत्र, गीता, रामचरितमानस, उपनिषद और अनेक धर्मग्रंथों का अर्थ सहित पाठ होता है। वहाँ का वातावरण सुनते ही मन शांत हो जाता है। मैं सोच रहा था—क्या ऐसा वातावरण गाँव में भी नहीं बन सकता?"
दुकान पर बैठे लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा। ऐसा प्रश्न उन्होंने पहले कभी नहीं सुना था।
शिबू आगे बोला—
"यदि सुबह-सुबह कबीर के दोहे, तुलसीदास की चौपाइयाँ, गुरु नानक की वाणी, सूफी संतों की शिक्षाएँ और मनुष्य को सत्य, प्रेम तथा सदाचार की ओर ले जाने वाले वचन सुनाए जाएँ, तो क्या गाँव का वातावरण अधिक पवित्र नहीं होगा? भक्ति का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मन का परिष्कार भी होना चाहिए।"
इतने में एक युवक उत्तेजित होकर बोला—
"भाई, अपना ज्ञान मठ में ही देना। यहाँ जैसा वर्षों से चलता आया है, वैसा ही चलेगा।"
शिबू मुस्कराया।
"मैं किसी की आस्था बदलने नहीं आया हूँ। मैं केवल इतना पूछ रहा हूँ कि यदि भक्ति मनुष्य को ऊँचा उठाती है, तो क्या उसकी भाषा और संगीत भी ऐसा नहीं होना चाहिए जो मन को भीतर से जागृत करे? कबीर के दोहे क्यों नहीं? तुलसीदास की चौपाइयाँ क्यों नहीं? अन्य धर्मग्रंथों के प्रेरणादायक वचन क्यों नहीं? भक्ति के नाम पर भौंडे फिल्मी गीतों की आवश्यकता ही क्या है?"
अब चाय की दुकान बहस का केंद्र बन चुकी थी। कुछ लोग शिबू की बात का समर्थन कर रहे थे, कुछ उसका विरोध।
उसी समय कोने में बैठे रामभक्त सतीश ओझा उठे। उन्होंने शिबू के कंधे पर हाथ रखा और बोले—
"बेटा, मान लिया हम तुम्हारी बात मान लें। फिर इससे होगा क्या?"
यह प्रश्न सुनते ही पूरा चौराहा शांत हो गया।
बहस इतनी बढ़ गई कि उसी शाम गाँव के सामुदायिक भवन में खुली सभा बुलाने का निर्णय लिया गया।
संध्या ढल चुकी थी।
सामुदायिक भवन के बाहर स्त्री-पुरुष, युवक, बुज़ुर्ग और बच्चे बड़ी संख्या में एकत्र थे। भीतर मौलवी साहब, मौलाना, पंडित, शिक्षक, किसान, व्यापारी और गाँव के अनेक प्रतिष्ठित लोग उपस्थित थे। वर्षों से इस गाँव में कीर्तन हुए थे, जलसे हुए थे, राजनीतिक भाषण हुए थे, पर किसी ने धर्म, शिक्षा और समाज को जोड़कर ऐसा प्रश्न कभी नहीं उठाया था।
सबकी निगाहें एक ही युवक पर टिकी थीं—शिबू।
सभा के सबसे ऊँचे आसन पर चौधरी चाचा विराजमान थे। उनके ठीक नीचे, उनके चरणों के समीप, शिबू विनम्र भाव से बैठा था।
कुछ क्षणों के मौन के बाद चौधरी चाचा उठे।
"मेरे श्रद्धेय भाइयों और बहनों!
जीवन में मैंने बहुत-सी किताबें पढ़ीं, बहुत-से भाषण दिए और लोगों को बहुत-से उपदेश दिए। पर आज स्वीकार करता हूँ कि प्रेम करना मैं पूरी तरह सीख नहीं पाया।
उपदेश देना सरल है, पर मार्ग दिखाना कठिन।
मार्ग वही दिखा सकता है जिसके हृदय में मनुष्य के प्रति सच्चा प्रेम हो।
आज इस युवक ने मुझे भी सोचने पर विवश कर दिया है।
आज मुझे अपने शिबू पर गर्व हो रहा है।"
इतना सुनते ही शिबू की आँखें भर आईं। वह उठकर चौधरी चाचा के चरणों में झुक गया।
"चाचा, आपने मुझे जितना सम्मान दिया है, मैं उसके योग्य नहीं हूँ। आपकी चरणधूलि सदा मेरे मस्तक पर बनी रहे, यही मेरी प्रार्थना है।
और जहाँ तक मेरे ज्ञान की बात है...
मेरे पिता प्रोफेसर रामशंकर झा एक सम्मानित विद्वान थे। यदि आज मैं दो शब्द भी ठीक से बोल पाता हूँ, तो वह उन्हीं के संस्कारों का परिणाम है।"
सभा में बैठे कई वृद्ध एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
भीड़ में से एक बुज़ुर्ग खड़े हुए।
"क्या तुम उसी रामशंकर झा के बेटे हो, जिनके पूर्वजों को काशीपुर रियासत से जागीर मिली थी?"
शिबू ने सिर झुकाकर कहा—
"जी... मैं उन्हीं का सबसे छोटा पुत्र हूँ।"
बस इतना सुनना था कि सभा में कानाफूसी शुरू हो गई।
"अरे... मदनमोहन झा का वंशज है!"
"उनके न्याय और विद्वता की मिसाल आज भी दी जाती है।"
"पहले इसकी बात सुन लेते हैं।"
तभी रामभक्त सतीश ओझा खड़े हुए।
"भाइयों! मेरा विचार है कि जो व्यवस्था वर्षों से चल रही है, उसे बदलने की क्या आवश्यकता है?"
उनकी बात समाप्त होते ही कमरुद्दीन मियाँ भी उठे।
"पंडित जी ठीक कह रहे हैं। जल्दबाज़ी में निर्णय लेना उचित नहीं होगा।"
इतने में हरधन नाई का बेटा गोवर्धन पीछे से बोला—
"चाचा, निर्णय बाद में होगा। पहले इनकी बात तो सुन लीजिए। बिना सुने किसी को गलत या सही कैसे कह सकते हैं?"
उसकी बात पर कई युवाओं ने समर्थन में सिर हिलाया।
सामुदायिक भवन की छत पर लगा गोल मर्करी का बल्ब पूरे प्रांगण को प्रकाश से भर रहा था। कुछ दूर महिलाएँ और बच्चे टकटकी लगाए सब देख रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो पूरा गाँव किसी नए विचार के जन्म का साक्षी बनने वाला हो।
शिबू ने गहरी साँस ली।
सामने पूरा गाँव था...
पीछे उसका संघर्ष...
और बीच में सत्य कहने का दायित्व।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा, दोनों हाथ जोड़कर सभा की ओर देखा और बोलने के लिए खड़ा हो गया...
जयगुरु। 🙏🙏🏻🙏🏻
वंदे पुरुषोत्तमम
चंद्रा सत्संग केंद्र
बोकारो झारखंड