खोटा सिक्का - 5 prem chand hembram द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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खोटा सिक्का - 5


खोटा सिक्का
शिबू धीरे-धीरे अपने आसन से उठा। उसने एक बार चारों ओर बैठे लोगों पर दृष्टि डाली। सामने चौधरी चाचा, सतीश ओझा, कमरुद्दीन मियाँ, सपन मिश्रा, सुनील झा और गाँव के अन्य बुज़ुर्ग बैठे थे। थोड़ी दूरी पर युवक पंक्तिबद्ध बैठे थे, जबकि बरगद की छाया से कुछ हटकर माताएँ और बहनें उत्सुकता से सभा की ओर निहार रही थीं। वातावरण में ऐसा सन्नाटा था मानो पूरा गाँव किसी सत्य की प्रतीक्षा कर रहा हो।
शिबू ने दोनों हाथ जोड़कर सबको प्रणाम किया और शांत किंतु दृढ़ स्वर में बोला—
"मेरे पितृतुल्य ग्राम के वरिष्ठजन, मेरी माताओं, बहनों, भाइयों और प्रिय मित्रों!
मैं यहाँ किसी को बदलने नहीं आया हूँ और न ही अपने विचार किसी पर थोपने आया हूँ। यदि मेरी किसी बात में आपको तर्क, न्याय और समाज का हित दिखाई दे, तभी उसे स्वीकार कीजिए; अन्यथा उसे यहीं छोड़ दीजिए।
मुझे विश्वास है कि आप सभी ने रामायण, महाभारत और श्रीकृष्ण लीला अनेक बार देखी या सुनी होगी। हमारे गाँव में भी प्रतिवर्ष दुर्गा पूजा, काली पूजा और अनेक धार्मिक आयोजन होते हैं। लेकिन आज मैं पूजा की नहीं, पूजा के फल की बात करना चाहता हूँ।
सतीश ओझा चाचा, क्या आप बता सकते हैं कि हमारे गाँव में वर्ष भर की सामूहिक पूजा पर लगभग कितना खर्च होता है?"
सतीश ओझा ने उत्तर दिया, "दुर्गा पूजा और काली पूजा सहित दस लाख रुपये से ऊपर।"
भीड़ में हलचल हुई।
एक युवक खड़ा होकर बोला, "भाई, क्या तुम चाहते हो कि हम पूजा-पाठ बंद कर दें?"
शिबू मुस्कुराया।
"भाई, मैंने ऐसा कब कहा? मैं तो केवल एक प्रश्न पूछ रहा हूँ। क्या यहाँ उपस्थित कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि उसके घर में प्रतिदिन धर्मग्रंथों का अर्थ समझा जाता है? कितने घरों में बच्चे सुबह उठकर माता-पिता को प्रणाम करते हैं? कितनी बहुएँ अपने सास-ससुर को माता-पिता जैसा सम्मान देती हैं? कितने बेटे अपने वृद्ध माता-पिता के साथ प्रेम से बैठते हैं?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर 'हाँ' है, तो समझिए कि आपके घर में प्रतिदिन भगवान की पूजा हो रही है।
यदि उत्तर 'नहीं' है, तो हमें स्वयं को बदलने की आवश्यकता है, धर्म को नहीं।
आप सबने मूली खाई होगी। मूली खाने के बाद मूली की ही डकार आती है। इसका अर्थ है कि हमारे भीतर जो संस्कार भरते हैं, वही हमारे व्यवहार में प्रकट होते हैं।
विज्ञान भी कहता है कि जिस विचार या दृश्य को बार-बार मन के सामने लाया जाता है, मस्तिष्क उसी दिशा में ढलने लगता है। यही कारण है कि बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अपने विज्ञापन बार-बार दिखाती हैं, ताकि उनका उत्पाद लोगों के मन में बस जाए।
यदि प्रतिदिन बच्चों को प्रेम, सेवा, सत्य, उपनिषदों का सार, गीता का संदेश, कुरान का अर्थ और महापुरुषों के प्रेरक विचार सुनाए जाएँ, तो उनका चरित्र भी वैसा ही बनेगा।
मुझे दुःख है कि हमारे ही गाँव में कुछ ऐसे माता-पिता हैं जिन्हें सम्मान से दो समय का भोजन भी नहीं मिलता। यदि पूजा के बाद भी माता-पिता उपेक्षित रहें, तो हमें अपने आचरण पर विचार करना चाहिए।
मेरा विश्वास है कि यदि किसी का बेटा शराब का आदी हो जाए, पति बुरी संगति में पड़ जाए या परिवार का कोई सदस्य भटक जाए, तो उसे घृणा से नहीं, बल्कि प्रेम, धैर्य और श्रद्धा से सुधारा जा सकता है। परन्तु प्रेम बाँटने से पहले स्वयं प्रेम करना सीखना होगा।"
तभी कमरुद्दीन मियाँ उठे।
"शिबू, बातें तो तुम्हारी अच्छी हैं, लेकिन केवल भाषणों से गाँव नहीं बदलते। कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे युवाओं को रोजगार भी मिले।"
शिबू ने विनम्रता से उत्तर दिया—
"मियाँ चाचा, मेरा भी यही विचार है। यदि गाँव के लोग मिलकर एक सहकारी समिति बनाएँ तो दुग्ध उत्पादन, गोपालन और जैविक खेती का कार्य आरम्भ किया जा सकता है। इससे युवाओं को रोजगार मिलेगा, गोबर से जैविक खाद बनेगी, रासायनिक खाद पर निर्भरता घटेगी, खेतों की उर्वरता बढ़ेगी और प्रत्येक घर तक शुद्ध दूध पहुँचेगा।"
सभा में कुछ क्षणों का मौन छा गया। तभी चौधरी चाचा धीरे-धीरे अपने आसन से उठे। उनकी आँखों में अनुभव की चमक और चेहरे पर आत्मीय मुस्कान थी।
उन्होंने कहा—
"मेरे प्यारे भाइयों, माताओं, बहनों और गाँव के नौजवानों!
आज शिबू ने कोई नया धर्म नहीं बताया। उसने केवल हमें वही याद दिलाया है जिसे हम जानते हुए भी भूलते जा रहे हैं।
इस्लाम कहता है—ईमान लाओ। वेद और शास्त्र कहते हैं—प्रेम करना सीखो। गुरु ग्रंथ साहिब सेवा का मार्ग दिखाता है। गीता निष्काम कर्म की शिक्षा देती है। शब्द अलग-अलग हैं, पर सबका उद्देश्य एक ही है—मनुष्य को श्रेष्ठ मनुष्य बनाना।
अब मैं आप सबसे एक प्रश्न पूछता हूँ। यदि हमारे गाँव में हर वर्ष लाखों रुपये पूजा-पंडालों, सजावट और रोशनी पर खर्च होते हैं, तो क्या उनमें से कुछ धन गाँव के भविष्य के लिए नहीं लगाया जा सकता?
मैं पूजा बंद करने की बात नहीं कर रहा। पूजा हमारी आस्था है और आस्था बनी रहनी चाहिए। परन्तु यदि आस्था के साथ सेवा भी जुड़ जाए, तो वही पूजा समाज का कल्याण करेगी।
मेरा प्रस्ताव है कि आज से गाँव के युवक एक समिति बनाएँ। शिबू और उसके मित्र सहकारी दुग्ध उत्पादन की योजना प्रारम्भ करें। हम सब अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका सहयोग करें। इससे रोजगार बढ़ेगा, गाँव आत्मनिर्भर बनेगा, जैविक खेती को बल मिलेगा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित होगा।
...और यदि आप सबको कोई आपत्ति न हो, तो मैं अंत में केवल एक बात कहना चाहता हूँ।
आज से हम यह शिकायत नहीं करेंगे कि समाज ने हमें क्या दिया। आज से हम स्वयं से पूछेंगे—मैंने अपने गाँव, अपने माता-पिता और अपने समाज के लिए क्या किया?
याद रखिए, सबसे बड़ा यज्ञ किसी भूखे को भोजन देना है, सबसे बड़ा तीर्थ माता-पिता के चरण हैं और सबसे बड़ी पूजा अपने चरित्र को पवित्र बनाना है।
यदि आज यहाँ बैठा प्रत्येक युवक यह संकल्प ले ले कि वह अपने गाँव के विकास के लिए प्रतिदिन एक घंटा देगा, तो पाँच वर्ष बाद लोग इस गाँव को उदाहरण के रूप में याद करेंगे।
बोलिए, क्या आप सब इस संकल्प में मेरे साथ हैं?"
चौधरी चाचा के शब्द समाप्त होते ही पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। सबसे पहले हरधन का बेटा खड़ा हुआ। फिर एक-एक कर दर्जनों युवकों ने हाथ उठाकर समिति बनाने का संकल्प लिया। कई बुज़ुर्गों की आँखें नम थीं। दूर बैठी माताएँ मौन मुस्करा रही थीं।
भीड़ के पीछे खड़ी एक वृद्धा ने अपने आँचल से आँसू पोंछते हुए धीरे से कहा—


Jayguru 🙏🏻 🙏🏻 🙏🏻 
वंदे पुरुषोत्तमम 
चंद्रा सत्संग केंद्र 
बोकारो झारखंड