जय महाकाल
मैं मानती हूँ कि कविता का धर्म सिर्फ सौंदर्य रचना नहीं है। उसका काम है दीवार पर उँगली रखकर पूछना - "यहाँ दरार क्यों है?" उसका काम है उस अँधेरे को नाम देना जिससे हम सब आँख चुराते हैं।
यदि इस संग्रह को पढ़ते हुए आपको लगे कि ये पंक्तियाँ आपकी भी हैं, तो समझिएगा कि कविता अपने लक्ष्य तक पहुँच गई। क्योंकि अंततः कविता ‘मेरी’ नहीं रहती, ‘हमारी’ हो जाती है।
कविता समय का सबसे ईमानदार दस्तावेज़ होती है। वह सत्ता से नहीं डरती, बाज़ार से सौदा नहीं करती। वह बस उस क्षण को दर्ज करती है जब मनुष्य सबसे अधिक मनुष्य होता है - अपने दुख में, अपने प्रेम में, अपने प्रतिरोध में।
प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ बीते कुछ वर्षों की मेरी यात्राओं का संकलन हैं। ये यात्राएँ केवल भौगोलिक नहीं हैं, वैचारिक और भावनात्मक भी हैं। महानगर के एकाकीपन से लेकर रिश्तों की ऊष्मा तक, स्त्री-अस्मिता के प्रश्नों से लेकर मानवीय करुणा की तलाश तक - इन कविताओं ने उन सब पड़ावों को छुआ है जहाँ से मैं गुज़री हूँ।
मैंने हमेशा महसूस किया है कि हमारे समय में ‘सुनना’ सबसे बड़ा कर्म है। हम बोलते बहुत हैं, सुनते कम हैं। कविता मुझे ‘सुनने’ का सलीका सिखाती है - अपनी धड़कन, दूसरों की चुप्पी, और समाज की हलचल। इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ उसी ‘सुनने’ की उपज हैं।
यहाँ न तो कोई वाद है, न कोई दुराग्रह। यहाँ सिर्फ जीवन है - अपनी सम्पूर्ण जटिलता, कोमलता और क्रूरता के साथ। यदि कहीं कोई पंक्ति आपको ठिठकाए, विचलित करे, या सोचने पर मजबूर करे, तो मैं अपने कवि-कर्म को सफल मानूँगी।
हिंदी कविता की समृद्ध परंपरा के सामने यह एक नन्हा सा निवेदन है। इसे स्वीकार करें।
*डॉ वंदना शर्मा*
*8/6/26*
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1. नानी का घर
5/6/26
नानी का घर
'नानी का घर' यह शब्द सुनते ही बहुत सारी मीठी यादें ताजा हो बरस पड़ती हैं। स्मृति-पटल के खजाने से बहुत से किस्से निकलते हैं -
सबको प्यारा लगता है
अपनी नानी का घर
मुझे भी प्यारा लगता है
अपनी नानी का घर
क्योंकि वहाँ मेरी मम्मी हँसती रहती है सारे दिन
खुद बच्ची बन जाती मम्मी, जिद करती
इतराती, इठलाती सारे दिन
खूब सोती, बातें बनाती
बेफिक्र खुद को जीती सारे दिन
मेरी नानी सुनाती कहानी
सिखाती जिंदगानी
आचार बनाती मट्ठी बनाती
रोज नई सब्जी बनाती
बड़ा सा आँगन, आँगन में झूला
सखियों का जमावड़ा, अनके किस्से
माँ - मौसी - मामी संग
मैं तो स्कूल का सारा काम भूला
मेरी नानी प्यारी नानी
और प्यारा है मेरी नानी का घर
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2 कहां गए वो पेड़
3/6/26
कहाँ गए वो पेड़ और बगिया
कहाँ गए वो फूल और कलियाँ
मेरा सुकून कहीं खो गया
मेरा पर्यावरण कहीं खो गया
कैसा शहर है ये
जिधर भी देखूँ नजर दौड़ाऊँ
इमारतें ऊंची ऊंची, तंग गलियां
हर जगह भीड़, धुँआ - धुँआ
कहाँ गया वो खुला नीला आसमां
वो चिड़िया अब नहीं आती
वो बरसात अब नहीं आती
प्रकृति जो सजाए हरी भरी धरती
असली सुकून वही है
वो नदियाँ वो बगिया
वो चिड़िया वो कलियाँ
मत करो वीरान धरती को पेड़ों से
एक पौधा लगाओ जुड़ो जड़ो से
सुनो जरा पक्षी भी करते हैं बातें
नदिया गुनगुनाती चले लहलहाते
क्या पाया इस भीड़ ने
सुकून खोकर उगायी इमारतें
फिर सुकून ढूँढने पहाड़ों पे जाते
आओ सजाएं अपनी धरती
जीवन बचाएगी यह प्रकृति
आने वाली पीढ़ी को उपहार ये देना
यही है सबसे सुन्दर अनमोल कृति |
डॉ वन्दना शर्मा
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3. मेरी सुन्दर सी बगिया
8/6/26
मेरी सुन्दर सी बगिया
आज मैं आपको मिलवाती हूँ अपने दोस्त से
मेरी बगिया है मेरी साथी
मेरे सुख दुख की साथी
स्पेस कम होता है किराये के घर में
लेकिन मेरी बालकनी ही बहुत है
मेरी सुबह का सुकून
मेरी शाम की साथी
तुलसी गेंदा, चंपा और चमेली
सदाबहार की जीवनता
अपराजिता की जीत
मेरे मन को अच्छे लगते
इन पौधों के गीत
जब नया फूल खिलता इन पर
खुशी से झूम उठता मन
शोर मचाकर सबको बताऊँ
नया फूल खिला है सबको दिखाऊँ
प्रकृति की अद्भुत रचना
पौधों को नित बढ़ते देखना
कितना सुकून है मेरी बगिया में
खुशी से रोज निहारती जाऊँ
अब और कहीं ना लागे मन
मुझको भाए मेरी सुन्दर सी बगिया
साथ निभाए मेरी सुन्दर सी बगिया
मेरी प्यारी सुन्दर सी बगिया
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4. जून का मौसम
बड़ा खराब लगता है ये जून का मौसम
सुबह तो जैसे होती ही नहीं, धूप चुभती है
छह बजे ही दोपहर हो जाती है
गर्म हवाएं तन को सताएं
मन को कुछ भी ना भाए
एक अजीब सी बेचैनी सारे दिन छाए
कहीं आना-जाना सब बंद
बस घर में ही रहो बंद
पेड़-पौधे भी झुलस रहे
बारिश को नैना तरस रहे
बंद कमरों में कैद बच्चे चिल्लाएं
माँ को भी गुस्सा आए
ये जून का मौसम ना मुझको भाए
क्या करूँ, क्या खाऊँ कुछ समझ न आए
चुभती गर्मी, आए पसीना, गर्म हवाएं
ऐसे में ऐसी भी कोई कब तक चलाए
हाय गर्मी हाय गर्मी हाय हाय हाय
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5. सबसे मुश्किल सवाल
सबसे मुश्किल सवाल
खाने में क्या बनेगा आज
सुबह का बन जाए तो
दोपहर को क्या बनेगा
शाम को क्या बनेगा
रोज-रोज यही सवाल
जिससे आज हर माँ बेहाल
इतने सारे विकल्प होते हुए भी
कुछ ना समझ आए
कभी ना मिलती सबकी राय
हाय कितना मुश्किल सवाल
खाने में क्या बनेगा आज
अलग हैं सबके नखरे
अलग हैं सबके स्वाद
ना-ना ये नहीं ये नहीं
ये नहीं तो क्या सही
कोई तो बताए क्यूँ होता है
ये इतना मुश्किल सवाल
मेरा ही है बुरा हाल
ना सब माँ के हैं ये हाल
सुबह उठते ही, रात होते ही
फिर वही सवाल, फिर वही सवाल
खाने में क्या बनेगा आज
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।। । 6. मोर नाचा
बाग में मोर नाचा, सबने देखा
मोर ने अपने पैरों को देखा
एक टीस उठी जैसे चाँद में दाग
क्यूँ नहीं किसी ने मेरा दर्द देखा
पंख मेरे अनन्य सुन्दर
पैर मेरे क्यूँ कुरूप फिर
चिढ़ाए मोरनी मुझको क्यूँ
कैसा है ये कुदरत का लेखा
सावन में जब बरसे पानी
कुदरत भी झूमे बन दीवानी
आ जाता मेरी आँख से पानी
क्यूँ रह जाता एक कांटा किसी कहानी में
कोई मोरनी मुझको देखो
मैं सुंदर पर सुंदर पंख नहीं है मेरे पास
अनदेखा कर अपनी कमी
पोंछ आँखों की नमी
छुओ आस्मां पर ना छूटे जमीं
तेरी-मेरी नहीं सबकी यही कहानी
थोड़ी खट्टी थोड़ी मीठी जिंदगी सयानी
ईश्वर का वरदान है जिंदगानी
सुंदर गुलाब सबने देखा
संग कांटों का हमेशा, ना देखा
बारिश में मोर नाचा सबने देखा
सुख दुख तो है विधि का लेखा |
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7.एक उम्र के बाद
एक उम्र के बाद
आता है ऐसा मोड़ भी
मन बेचैन रहता है
भाता नहीं कुछ भी
सभी बेगाने लगते हैं,
गैरों में कुछ अपने भी
खो जाती है हँसी कहीं, और मुस्कान भी
कोई बात करे ना करे, चाहे मन का सुकून ये दिल
सब कुछ खो देने पर कुछ पाना भी मुश्किल
जो समय पर ना मिले सब व्यर्थ है
प्रेम और सम्मान ही जीवन का अर्थ है
मन को जब आने लगा अकेलापन
कोयल की कूक मोर का बुलबुलापन
कभी याद आता है खोया बचपन
और वो याद भी बन जाती है तड़पन
जिंदगी को समझना ही क्या
जियो और जीने दो किसी से उलझना ही क्या
खुद में खोना भी जिंदगी है
खुद से मिलना भी जिंदगी है
किसी के काम आए तभी जिंदगी है
किसी रोते को हँसाए तभी जिंदगी है ।
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
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सबको पसंद आए जरूरी तो नहीं
सबको खुश रखना जरूरी तो नहीं
पूर्णता होना जरूरी तो नहीं
सबके लिए हमेशा तत्पर होना
जरूरी तो नहीं
जरूरी है किसी की आंख में खटकना भी
जरूरी है खुद को तलाशना भी
जरूरी है खुद से प्यार करना भी
जरूरी है कभी-कभी ना कहना
हमेशा हाँ कहना जरूरी तो नहीं
जरूरी है विनम्रता व्यवहार में
जरूरी है मानवता संसार में
जरूरी है सम्मान जिंदगी में
हमेशा खुद को झुकाना जरूरी तो नहीं
जरूरी है खुद को समय देना
जरूरी है कभी खुद से भी मिलना
जरूरी है प्रकृति के साथ रहना
हमेशा सबकी सुनो जरूरी तो नहीं
*वन्दना शर्मा*
*10/6/26*
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जय श्री राम
राम तुमने सिखलाई मर्यादा
पर ये जग सीख ना पाया
राम के आदर्शों को यहाँ
किसने अपनाया
राम ने वचन की खातिर छोड़ी सत्ता
बिना भेदभाव सबको अपनाया
पिता महत्व रिश्तों को
परिवार का महत्व सबको समझाया
राम तुमने दया, त्याग सिखाया
पर जग को लालच ही है भाया
राम तुमने सिखाई मर्यादा
पर ये जग सीख ना पाया
राम तुमने धर्म को गाया
पर क्या मानव धर्म बचा पाया
रामराज्य है सबका सपना
जय श्री राम सबने गाया
वन्दना शर्मा
11/6/24
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मेरी कलम
पेन, पेंसिल या कलम
नाम अनेक रूप अनेक
लेकिन काम तो सबका एक
बिना कलम के कहाँ भाव लिखे जाते हैं
बिना कलम के नहीं गीत लिखे जाते
" बच्चों की, बड़ों की सबकी साथी
बिना कॉपी, कागज के कैसे लिखे पाती
अब तक रही उपेक्षित
तरसती रही सम्मान के लिए
लिखती रही कलम
खुद को घिसती रही
श्रेय सारा ले जाते कवि
ना शुक्रिया ना आभार
कलम यही सोचती रही
कलम की ताकत से क्या सब अनजाने
की लाखों क्रान्ति, अनेक परिवर्तन
ना-ना हम तो कलम को पहचाने
प्यारा साथी माने,
धन्यवाद ऐ कलम तेरा
आभार तूने जो साथ निभाया
मेरी तन्हाई की साथी
कैसे तुझसे करे किनारा
दुनिया की भीड़ में, एक तू ही है सहारा
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
जय श्री राम 🙏
@कॉपीराइट सर्व अधिकार सुरक्षित डॉ वंदना शर्मा
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