नकाब और तन्हाई - 1 Shaziya Khan द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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नकाब और तन्हाई - 1

यह कहानी एक काल्पनिक सुपरहीरो से प्रेरित है, लेकिन इसके किरदार और जज़्बात पूरी तरह से मौलिक हैं।" लेखक _समीर खान 


क़िस्त 1: शिकागो की ठंडी धूप

शिकागो की शाम और ऊपर से गिरती हल्की बर्फ की फुहारें। कांच की बड़ी-बड़ी इमारतों पर जब डूबते सूरज की नारंगी रोशनी पड़ती है, तो पूरा शहर किसी ताश के महल की तरह चमकने लगता है। सड़कों पर गाड़ियों का शोर है, लोग अपने कोट के कॉलर ऊपर किए तेज़ी से अपने घरों की तरफ भाग रहे हैं।



इन्हीं इमारतों के बीच एक पुरानी और जर्जर सी बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल पर 'जैक' खड़ा था।



जैक—जिसकी उम्र अभी मुश्किल से 22-23 साल होगी। गहरी भूरी आँखें और उलझे हुए बाल। वह अपने कमरे की उस बड़ी सी कांच की खिड़की के पास खड़ा था, जिसका एक कोना थोड़ा चटका हुआ था। इस खिड़की से उसे शिकागो का 'लूप' (डाउनटाउन) साफ़ दिखता था।


जैक के कमरे में ज्यादा सामान नहीं था। एक पुराना लोहे का पलंग, ढेर सारी किताबें, और मेज़ पर बिखरे हुए कुछ तार और लेंस। कमरे के एक कोने में एक बैग आधा खुला पड़ा था, जिसमें से नीले और लाल रंग के उस कपड़े की चमक साफ़ दिख रही थी जिसे दुनिया 'उम्मीद' कहती थी।



जैक ने गहरी सांस ली। उसके हाथ की उंगलियां अभी भी कांप रही थीं। पिछले दो घंटों से वह शहर की दूसरी तरफ एक जलती हुई इमारत से लोगों को निकाल रहा था। उसकी पसलियों में गहरा दर्द था, शायद दीवार से टकराने की वजह से चोट आई थी। लेकिन इस चोट का दर्द उस खामोशी से कम था जो इस वक्त उसके कमरे में फैली थी।



उसने मेज़ पर रखी अपनी पुरानी डायरी उठाई। जैक जब हाथ में पेन थामता था, तो वह 'सुपरहीरो' नहीं रहता था। वह सिर्फ एक लड़का बन जाता था जो अपनी उलझनों से डरता था।



उसने लिखा:


"आज फिर एक माँ ने मुझे गले लगाकर शुक्रिया कहा। उसने मुझे 'फरिश्ता' कहा। काश मैं उसे बता पाता कि ये फरिश्ता रात को ठंडी चाय और खाली दीवारों के बीच सोता है। शिकागो की इन ऊँची इमारतों ने मेरा कद तो बढ़ा दिया, पर मेरी तन्हाई और भी गहरी कर दी।" काश मैं किसी से कहे पाता ।वो बस सोच कर रहे गया।



तभी दूर कहीं एम्बुलेंस का सायरन सुनाई दिया। जैक के कान खड़े हो गए। उसे पता था कि उसकी ड्यूटी अभी खत्म नहीं हुई है। उसने खिड़की के पास रखी अपनी कॉफ़ी की ठंडी प्याली को देखा। खिड़की के कांच पर जमी धुंध पर उसने अपनी उंगली से एक छोटा सा जाल बनाया और फिर उसे पोंछ दिया।



उसने अपना नकाब उठाया। वो नकाब जो उसे ताकत तो देता था, पर उसकी पहचान छीन लेता था।


उसने आहिस्ता से बुदबुदाया, "शहर की हर उलझन को सुलझाना आसान है जैक, पर इस दिल की गिरह को कैसे खोलोगे?"


खिड़की खोलते ही बर्फ की ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आया। जैक ने नकाब पहना और अंधेरे में ओझल हो गया। पीछे रह गई तो सिर्फ वो चटकती हुई खिड़की और डायरी का वो पन्ना, जिस पर स्याही अभी सूखी भी नहीं थी।(जारी है)

लेखक _समीर खान