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रावल खुमाण

रावल खुमाण (820-860 ईसवी)

खुमाण बाप्पा रावल के सीधे वंशज थे। यद्यपि उनके बीच चार से पाँच पीढ़ियों का अंतर था। आठवीं से दसवीं शताब्दी के मध्य मेवाड़ में तीन भिन्न-भिन्न रावल खुमाण होने का उल्लेख है। तीनों ही इस्लाम के प्रसार के विरोध में हिंदू ढाल बनकर जिए। किंतु इनमें खुमाण द्वितीय सर्वाधिक प्रसिद्ध हुए।

खुमाण के विषय में लिखित ऐतिहासिक प्रमाण बहुत कम मिलते हैं। इस महान राजा के विषय में जानकारी राजस्थानी भाषा में देवनागरी लिपि के पाँच हजार दोहों में लिपिबद्ध ‘खुमाण रासो’ नाम के ग्रंथ से प्राप्त होती है। इस ग्रंथ के माध्यम से हमें अरब आक्रमणकारियों के साथ खुमाण के युद्धों के विषय में विस्तार से जानकारी प्राप्त होती है।

‘खुमाण रासो’ नाम के इस महान ग्रंथ की रचना का श्रेय ‘दलपत विजय’ नाम के एक जैन मुनि को जाता है, किंतु मुनि ने इस ग्रंथ को कब लिखा, इस विषय में विवाद है। वाद-विवाद को इतिहासकारों के लिए छोड़कर हम केवल खुमाण द्वितीय के जीवन एवं उनके कार्यों पर ध्यान देंगे। रावल खुमाण का राज काल 820 से 860 ईसवी के मध्य का माना जाता है। भिन्न-भिन्न इतिहासकार अपने आकलन के अनुसार इस कालखंड को मानते हैं।

बाप्पा की मोक्ष प्राप्ति के पश्चात, कुछ दशकों तक अरबों ने भारत पर आक्रमण नहीं किया। फिर अरब खलीफा ने एक अरब सेनापति हाशिम को हिंदुओं पर आक्रमण करने के लिए भारत भेजा। हाशिम समुद्री मार्ग से होता हुआ गुजरात के रास्ते भारत पहुंचा। उसने राजस्थान की ओर मुँह किया, जहाँ कुछ सीमा तक उसे सफलता भी प्राप्त हुई। किंतु फिर चित्तौड़ के दक्षिण-पश्चिम में स्थित भीनमाल के राजा नागभट्ट एवं खुमाण के संगठन ने हाशिम का सामना किया।

उन्हें हाशिम और उसकी गतिविधियों के विषय में अपने गुप्तचरों द्वारा सूचनाएँ प्राप्त होती रहती थीं, परिणामस्वरूप एक भीषण युद्ध हुआ, जिसमें अरबों का विनाश कर, उन्हें कुछ दशकों के लिए भारत से समाप्त ही कर दिया गया।

खुमाण के ही काल में अरबों के मध्य आपस में ही इस्लामी खलीफा, सत्ता के लिए एक-दूसरे की हत्याएँ करने लग गए थे। एक दूसरे अरब सेनानायक ने भारत पर आक्रमण किया, यह था खुरासान का पुत्र अल मामू, जिसे 'महमूद' भी कहा जाता है। अरबों द्वारा भारत पर यह एक प्रमुख आक्रमण बताया गया है। यह गजनी के महमूद से भिन्न है।

‘खुमाण रासो’ ग्रंथ का प्रमुख उद्देश्य है, भारत पर बड़ी सेना लेकर आक्रमण करने वाले महमूद पर विजय का यशोगान। तत्कालीन हिंदू आस्था के स्तंभ खुमाण का साथ देने वाले सभी राजाओं का उल्लेख ‘खुमाण रासो’ में किया गया है। 'खुमाण रासो' के लेखक के अनुसार, खुमाण ने मेवाड़ का केसरिया ध्वज सदैव ऊँचा रखा। उन्होंने आक्रांताओं के भीषण आक्रमण का न केवल प्रत्युत्तर दिया, वरन् उन्हें पीछे हटने पर भी बाध्य कर दिया और अंततः महमूद को बंदी बना लिया।

खुमाण के सम्मान में, कश्मीर से लेकर रामेश्वरम् तक के कुल चालीस राजवंशों ने उनके नेतृत्व में एकत्र होकर अरब सेना को बुरी तरह पराजित किया। जैसी सेना, खुमाण द्वितीय के नेतृत्व में एकत्र हुई, वैसी पुनः भारत के इतिहास में कभी नहीं हुई। कर्नल जेम्स टॉड अपनी पुस्तक ‘एनल्स एंड एन्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान’ में इन राजवंशों के विषय में लिखते हैं–

गजनी से गहलोत आए,
असर से टाँक,
मदोल्येठे से चौहान,
रहिरगढ़ से चालुक्य,
सेत-बिंदर से जिस्केरा,
मंडोर से खैरावी,
मंगरोल से मकवाना,
नरवर से कच्छावा,
सांचोर से कालुम,
अजमेर से गौड़,
दिल्ली से तँवर,
पाटन से चावंडाट,
सिरोही से देवड़ा,
जालौर से सोनगरा,
गागरौन से खींची,
जूनागढ़ से जदू एवं
कन्नौज से राठौड़।

टॉड ने हिंदू गाथाओं एवं ग्रंथों का गहन अध्ययन कर इनमें से प्रत्येक राजवंश की वंशावली एवं काल का वर्णन किया है।

यद्यपि डॉ. रामगोपाल मिश्रा ने बड़े परिश्रम से छठी से बारहवीं शताब्दी में इस्लाम के विरुद्ध हिंदुओं के संघर्ष का सत्य सार्वजनिक करने का प्रयास किया है, किंतु फिर भी इस काल के बहुत अधिक हिंदू अभिलेख उपलब्ध ही नहीं हैं। दुर्भाग्यवश, इस्लामी लुटेरों ने हिंदू इतिहासकारों एवं राजाओं द्वारा इतिहास को संकलित करने के दो प्रमुख माध्यमों को लगभग समाप्त कर दिया।

हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि हमारे पूर्वजों का संगृहीत कितना मूल्यवान् ज्ञान व इतिहास इन लुटेरों की मतांधता के कारण नष्ट हुआ होगा! इसी प्रकार मंदिरों के स्तंभों तथा शिलालेखों को हिंदू मंदिरों के विध्वंस के समय ही तोड़कर नष्ट कर दिया जाता था।

हिंदुओं के लिए इन साम्राज्यवादियों की तर्कविहीन घृणा के चलते इन्होंने सातवीं से बारहवीं शताब्दी के महत्त्वपूर्ण काल के लगभग सभी अभिलेखों को विनष्ट कर दिया। निरंतर इस्लामी आक्रमणों एवं काल की निष्ठुर गति ने अधिकांश पुराने नगरों एवं गाँवों इत्यादि को लील लिया।

तथापि, खुमाण के समर्थन में समूचे भारतवर्ष से योद्धाओं का एकत्र हो अरबों की सेना से लड़ना, इस मिथक को तो तोड़ता ही है कि हिंदू कभी संगठित होकर नहीं लड़े !

‘अमरकाव्यम’ में खुमाण की सेना का वर्णन ऐसे मिलता है, “एक लाख रावल, 30 लाख अश्वारोही, 7 लाख पैदल, 9 सहस्त्र हाथी व एक सहस्त्र नगाड़ों की सेना खुमाण ने एकत्र की।” इसमें कोई संशय नहीं कि यह संख्या बहुत अतिशयोक्तिपूर्ण है, किंतु यह तो कहा ही जा सकता है कि खुमाण ने एक विशाल सेना से महमूद का सामना किया।

खुमाण द्वारा महमूद की पराजय निर्णायक थी। महमूद को बंदी बनाकर कई माह तक खुमाण ने उसका अपमान किया। पुनः भारत की ओर मुँह ना करने के अनिवार्य प्रण के बाद उसे छोड़ा गया। इस्लाम के खलीफा की सेना के पराजित होने से अरब आक्रांताओं का मनोबल टूट गया।

अभिलेखों के अनुसार, खुमाण ने उत्तर एवं पश्चिमी भारत में अरब स्कंधावारों को नष्ट किया एवं अपने जीवनकाल में 24 युद्ध लड़े तथा इराक और अफगानिस्तान तक चढ़ाई कर इस्लामी आक्रांताओं को भरपूर हानि पहुँचाई। आधुनिक हिंदू समाज के लिए यह लज्जा का विषय है कि खुमाण जैसे महान राजा को हमारे इतिहास से पूर्णतया विस्मृत कर दिया गया है। यह खुमाण जैसे शौर्यशाली राजाओं का ही प्रताप है कि विश्व की सबसे पुरातन हिंदू जाति आज भी पृथ्वी पर जीवित है।

ब्रिटिश इतिहासकार व विचारक अर्नोल्ड टॉयन्बी ने विश्व की पुरातन सभ्यताओं एवं अभिलेखों के अध्ययन से जाना कि अनुमानतः 25 पुरानी सभ्यताएँ अब तक विलुप्त होकर काल के गलियारों में खो चुकी हैं। वर्तमान में सबसे पुरानी सभ्यताओं में चीन के अतिरिक्त केवल हिंदू सभ्यता ही प्रमुखता से जीवित बची है। 

यह खुमाण जैसे राजाओं का ही पुण्य कर्म व पुरुषार्थ है कि आज भी विश्व की जनसंख्या का कुल 15 प्रतिशत, हम हिंदू हैं। खुमाण ने अरब आक्रमणों को पूर्णतया विफल कर दिया था और इसलिए सुदूर पूर्व के देश, यहाँ तक कि चीन भी अतिवादी इस्लामी लुटेरों से बचा रहा। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि यदि अरबों ने भारत पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली होती तो क्या परिणाम होता ?

इस्लाम के चीन और सुदूर पूर्व में प्रसार की इस भयावह संभावना की पुष्टि हमें आठवीं सदी के चीनी यात्री ओऊ कौंग के संस्मरणों से भी मिलती है। यद्यपि वह कश्मीर के ललितादित्य मुक्तापीड़ के विषय में लिखता है, “मुंग्ती ने (ललितादित्य) मध्य भारत के एक राजा (यशोवर्मन) के साथ मिलकर तिब्बत के पाँच दरें अवरुद्ध कर दिए।

यदि हिंदू भारत, इस्लाम के समक्ष समर्पण कर देता तो कदाचित् पूरे विश्व का इस्लामीकरण हो जाता, क्योंकि इस बात का उल्लेख कई जगह हुआ है कि अरब खलीफा को पश्चिम में यूरोप एवं पूर्व में भारत को विजय करने हेतु अपनी शक्तियों को दो भागों में विभाजित करना पड़ा था। एक ओर जहाँ पूरा विश्व, 732 ईसवी में चार्ल्स मार्टेल एवं उमय्यद खलीफा के बीच हुए टूर्स के युद्ध को जानता है एवं यशगान करता है। यहाँ हम बाप्पा और खुमाण जैसे महायोद्धाओं को विस्मृत कर बैठे हैं।

इस्लाम का पूर्व में विस्तार खुमाण जैसे महान राजा ने रोका, जिनका नाम तक किसी की स्मृति में नहीं है, ऐसे में उनके जीवन और कार्यों के विषय में क्या कहा जाए! यदि खुमाण ने अरबों को पराजित कर उन्हें नहीं खदेड़ा होता तो न केवल पूरे भारत का इस्लामीकरण हो जाता, बल्कि भारत के धन एवं सेनाओं के बल पर, इस्लामी साम्राज्यवाद, नरसंहार एवं दासता की भयंकर कालिमा में सुदूर पूर्व एवं चीन को भी ग्रस लेता।

इतिहासकार ईवान ऑस्टिन अपनी पुस्तक ‘मेवाड़ : संसार का सबसे प्राचीन राजवंश’ में लिखते हैं कि खुमाण व बाप्पा जैसे हिंदू महावीरों के कारण ही विश्व इस्लामी खिलाफत बनने से बच पाया। इन वीरों ने अरब विस्तारवाद की रीढ़ तोड़ दी, तथा भारत पाँच सौ वर्षों तक अरबों से सुरक्षित रहा।

जोन ऑफ आर्क, रिचर्ड लायनहार्ट एवं पेलागिस ऑफ स्पेन, जिन्होंने पश्चिम में इस्लाम के आक्रमण को रोका, उन पर कई चलचित्रों का निर्माण हुआ, उनकी स्मृति को जनमानस के मन में जीवित रखने हेतु पुस्तकें लिखी गईं। इधर भारतवर्ष में खुमाण जैसे नायकों को हमारे इतिहास से पूर्णतया मिटा दिया गया, यद्यपि उनका योगदान पूरी मानवता की रक्षा में उतना ही महत्त्वपूर्ण है, कदाचित् यूरोपीय नायकों से भी अधिक।

यह हिंदू विद्वानों द्वारा अभिलेखों के अपर्याप्त रख-रखाव पर भी कटु टिप्पणी है कि ऐसे महान योद्धाओं के विषय में इतिहास में कुछ विशेष नहीं मिलता !

जो कुछ इस पुस्तक में लेखक संकलित कर पाया, वह भी एक ब्रिटिश अफसर कर्नल जेम्स टॉड की राजस्थान के इतिहास पर एक विस्तृत पुस्तक में से लिखा है। खुमाण की स्मृतियों को जीवित रखने के लिए हिंदू समाज, टॉड का सदैव आभारी रहेगा। यद्यपि यह भी कहना पड़ेगा कि पुरातन काल से ही हिंदू राजाओं व पंडितों की दृढ़ता तथा दूरदृष्टि का ही परिणाम है कि ‘खुमाण रासो’ की वास्तविक प्रतिलिपि आज भी पुणे के एक संग्रहालय में सुरक्षित है।

हिंदुओं को अपने उन महान पूर्वजों का आभार मानना चाहिए, जिन्होंने असुरों एवं म्लेच्छों से भयंकर संघर्ष किया, जैसा कि हमारी हिंदू गाथाओं में उल्लेखित है। हमें इन महान राजाओं के बलिदानों को सदा स्मरण रखने के लिए उनके इतिहास का शोध एवं कुशल पुनर्लेखन करना होगा।

अपने जीवनकाल में खुमाण; राजस्थान के जन-जन में वैसे ही प्रसिद्ध थे, जैसे कि रोम में जूलियस सीजर। आज भी मेवाड़ में, यदि आप गिर जाएँ अथवा छींकें तो आपको कोई कहेगा ‘थनै खुमाण राखै’ अर्थात् ‘खुमाण आपकी रक्षा करें!’

राजसी पुरुषों के साथ ऐसा होता ही है। उन्हें अपने कंधों पर सत्ता के सुख व कष्ट का विरोधाभास ढोना ही होता है।

खुमाण जब अधेड़ अवस्था के हुए तो एक ब्राह्मण पुरोहित ने उन्हें अपना राज्य छोटे भाई जोगराज को देने का परामर्श दिया। खुमाण ने गुरु आज्ञा समझकर जोगराज को राजा घोषित कर दिया। किंतु जोगराज एक सत्तालोलुप, अन्यायपूर्ण व अदूरदर्शी शासक सिद्ध हुआ। वानप्रस्थ से खुमाण को लौटकर आना पड़ा तथा छोटे भाई को पदच्युत कर उसे देश निकाला देना पड़ा। खुमाण ने अपने दुष्ट भाई के सभी साथियों एवं सलाहकारों को मारकर, उस ब्राह्मण को भी पदमुक्त कर दिया, जिसने भाई को सिंहासन देने का परामर्श दिया था।

ऐसे निस्पृह, वीतरागी, बलशाली व विवेकी रावल खुमाण को एक दिन उनके ही पुत्र मंगल ने मार डाला। सत्ता का लोभ किस प्रकार मनुष्य को अंधा कर देता है! मंगल को भी मेवाड़ के सामंतों एवं मंत्रियों ने देश से निकाल दिया एवं एक अलग राज्य उसे दे दिया। सामंतों के आपसी परामर्श से भरतरी भट्ट को खुमाण का उत्तराधिकारी चुना गया।

भरतरी ने मेवाड़ की सीमाओं का बहुत विस्तार किया। भरतरी भट्ट के तेरह पुत्र हुए तथा ये सभी मालवा एवं गुजरात के क्षेत्रों में जाकर स्वतंत्र राज करने लगे। ये राजा कालांतर में ‘भाटवाड़ा गहलोत’ कहलाए।

मेवाड़ के रावलों ने सातवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य भारत के अन्य हिंदू राजाओं के साथ मिलकर इस्लामी साम्राज्यवाद से 500 वर्षों तक हिंदू धर्म व देश बचा कर रखा। भारत के स्वर्णिम इतिहास का यह अंश हम हिंदुओं की सामूहिक स्मृतियों से मिटा दिया गया है। यह खुमाण जैसे महानायकों की सफलता का मानक है कि भारतवर्ष पर अरब हमलावर कभी अपना धर्म व संस्कृति नहीं थोप पाए।

अरबों के मुस्लिम साम्राज्यवाद को सबसे बडी विफलता भारत में ही झेलनी पडी, क्योंकि हमारे महान पुरखे, लुटेरों व बलात्कारियों के इस समूह के सत्य स्वरूप को पहचानकर उन्हें लगातार खदेड़ते रहे। अरबों के भारत पर पाँच सौ वर्षों के असफल हमलों के बाद मुसलमानों में सत्ता का केंद्र अफगानों, तुर्कों व मध्य एशिया के हत्यारों के हाथों में चला गया, जो और भी अधिक नृशंस व अनैतिक जातियाँ थीं।

अरबों को इस पवित्र वैदिक भूमि को मलिन करने से रोकने वाले खुमाण जैसे महापुरुषों का विस्मरण न केवल इतिहास के साथ अन्याय है, बल्कि हमारी कृतघ्नता का भी द्योतक है। खुमाण की स्मृति को पुनर्जीवित करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है।