महाराणा कुंभकर्ण (कुंभा)
(1433-1468 ईसवी)
महाराणा लाखा के पश्चात् उनके पुत्र मोकल, जो लाखा की अधिक उम्र में जन्मे थे, मेवाड़ के महाराणा बने। मोकल अपने पिता महाराणा लाखा के समान ही आक्रामक और बुद्धिमान थे। उन्होंने पड़ोसी मुस्लिम राज्यों मालवा और गुजरात से युद्ध करके उन्हें पराजित करते हुए मेवाड़ की सीमाओं का विस्तार किया। लाखा व हम्मीर की भाँति मोकल ने भी तथाकथित दिल्ली सल्तनत की विशाल सेना को धूल चटाई ऐसा अनुमान है, यह गियासुद्दीन तुगलक द्वितीय रहा होगा, जिसे मोकल ने पराजित कर मेवाड़ से बाहर खदेड़ा।
दुर्भाग्यवश, इससे पहले कि मोकल अपने शौर्य का ध्वज और आगे तक लहराते, उनके दूर के भाई ‘चाचा और मेरा’ ने अचानक इस विजययात्रा को रोक दिया। एक दिन आखेट के समय मोकल के एक अनपेक्षित व्यंग्य से दोनों भड़क गए और दोनों ने मिलकर नींद में ही उनकी हत्या कर दी। इस दुःखद अंत से पूर्व मोकल इस्लामिक हत्यारों से लड़ने और मेवाड़ की सीमाओं का विस्तार करने वाले एक साहसी महाराणा थे। उनकी कई पत्नियाँ थीं और उनकी दो रानियाँ लगभग एक ही साथ गर्भवती हुईं।
लोककथाओं में कहा गया है कि छोटी रानी को बड़ी रानी से ईर्ष्या थी। उन्होंने बड़ी रानी पर कुछ 4 तांत्रिक विधि करवाई, जिससे बड़ी रानी ने गर्भधारण की अवधि को पार कर लिया, फिर भी उन्हें प्रसव पीड़ा आरंभ नहीं हुई। ऐसी मान्यता है कि इस विधि को करने के लिए एक मिट्टी के घड़े पर तंत्र किया गया था, जिसे छोटी रानी ने अपने अभीष्ट की पूर्ति के लिए रख छोड़ा था। जब राजपरिवार के शुभचिंतकों ने यह सुना कि बड़ी रानी को प्रसव नहीं हो रहा तथा वैद्यों ने हाथ खड़े कर दिए हैं, तो वे मदद के लिए एक जीवित देवता, बाबा रामदेवजी के पास मारवाड़ के रेगिस्तान में स्थित ‘रामदेवरा’ गए।
बाबा रामदेव ने पहले ही अपनी देह को त्यागने का प्रण ले लिया था और वे समाधि में प्रवेश कर चुके थे। उन्होंने मेवाड़ के राजपुरुषों को अपने चाचा धर्मस्वरूप जी के पास जाने का परामर्श दिया। धर्मस्वरूप जी को भी बाबा रामदेव जैसी ही आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त थीं। धर्मस्वरूप जी मेवाड़ के राजपरिवार का दुःख समझते हुए उनकी सहायता हेतु मेवाड़ की ओर चल पड़े।
माना जाता है कि रास्ते में उन्होंने कई चमत्कार किए और आज भी मेवाड़ राजपरिवार में उनके द्वारा की गई सहायता को स्मरण करते हुए उनके मंदिरों पर उत्सव होता है तथा मेले इत्यादि का भी आयोजन किया जाता है।
लेकिन रानी पर डाले गए जादू को तोड़ने और प्रसव शीघ्र करवाने के सभी प्रयास विफल रहे। तब धर्मस्वरूप जी ने एक अंतिम उपाय सोचा। उन्होंने सामंतों से कहा कि ढोल बजाकर व मिठाई बाँटकर पुत्र के जन्म की झूठी घोषणा कर दें। कहा जाता है कि जब छोटी रानी ने नगाड़ों की ध्वनि सुनी, तो क्रोध में आकर उन्होंने मिट्टी का वह घड़ा तोड़ दिया, जो बड़ी रानी पर उनके द्वारा करवाए गए तांत्रिक कर्म का आधार था।
घड़ा टूटते ही उसका प्रभाव भी समाप्त हो गया तथा बड़ी रानी को तुरंत ही प्रसव पीड़ा होने लगी और वर्ष 1417 ईसवी में उनके एक पुत्र का जन्म हुआ। एक बालक, जो अपनी माता के गर्भ में सामान्य अवधि से पूरे एक महीने अधिक, अर्थात् दस महीने रहा था।
मिट्टी के घड़े को संस्कृत में ‘कुंभ’ कहा जाता है और इससे नवजात बालक का नाम भी ‘कुंभकर्ण’ रखा गया था। प्रेमवश उन्हें मेवाड़ में ‘कुंभा’ कहा जाता था। कुंभा को मेवाड़ का विशाल राज्य विरासत में प्राप्त हुआ था, जो उसकी पिछली तीन पीढ़ियों—हम्मीर, लाखा और मोकल द्वारा एकत्र धन और संपदा के साथ अच्छी तरह से संरक्षित था।
कुंभा, मेवाड़ के सबसे सफल राजाओं में एक सिद्ध हुए। बहुत से आधुनिक युग के इतिहासकारों द्वारा उन्हें भारतवर्ष पर शासन करने वाले सभी महान राजाओं, जैसे अशोक, हर्ष, समुद्रगुप्त या चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की श्रेणी में माना गया है।
कुंभा को राज्योचित गुण अपने परिवार से विरासत में प्राप्त हुए थे। उनके दादा एक कुशल योद्धा थे, माता तीक्ष्ण बुद्धिमति, राठौड़ वंश से आई (राणा लाखा की पत्नी) उनकी दादी, दादा राव रणमल राठौड़ और उनके साथी अथवा विरोधी सरदारों, सभी का प्रभाव कुंभा के जीवन पर रहा।
इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को उस समय के मेवाड़ राजपरिवार में चल रही आंतरिक कलह और जोड़-तोड़ को बताना नहीं है, अतः हम कुंभा के शासनकाल में हुए सैन्य अभियानों, मेवाड़ की किलेबंदी, विभिन्न कलाओं एवं वास्तुकला के उत्थान पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे।
मेवाड़ पर कुंभा के लगभग चार दशक लंबे शासन के समय इन सभी क्षेत्रों में मेवाड़ ने अद्वितीय ऊँचाइयों को छुआ। हम संक्षेप में कुंभा के व्यक्तित्व के बारे में बात करेंगे, जिसने मेवाड़ वंशावली में अपनी अमिट छाप छोड़ी। हम यह भी विस्तार से जानेंगे कि कैसे कुंभा का जीवन इस्लामिक राज्यों मालवा, गुजरात और नागौर की संयुक्त ताकतों को नष्ट करने में व्यतीत हुआ। शताब्दियों तक ऐसी विषम परिस्थितियों के उपरांत भी मेवाड़ में इतने ऊर्जावान और सफल राजा होते रहे; ऐसा मानव इतिहास में अन्य कहीं भी नहीं हुआ है।
मेवाड़ अब अपने गौरवशाली उत्थान के पथ पर था, जिसे उन वीर पुत्रों और पुत्रियों के बलिदान पर निर्मित किया जा रहा था, जिन्होंने अपनी मातृभूमि को तुर्क हत्यारों से बचाने के लिए आगे बढ़कर अपने प्राणों की आहुति दी थी। चित्तौड़ में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा मृत्यु व नाश के भयानक नृत्य के पश्चात् एक शताब्दी बीत चुकी थी। जहाँ उसने चित्तौड़ के प्रत्येक हिंदू मंदिर और समस्त महत्त्वपूर्ण भवनों को नष्ट कर दिया था, पद्मिनी और अन्य वीरांगनाओं द्वारा किए गए जौहर, अग्निस्नान के पश्चात् अब मेवाड़ अपने प्रतिशोध के साथ पुनर्जीवित हो रहा था। चित्तौड़, खिलजी और तुगलक के घातक आक्रमणों से उबर चुका था तथा मेवाड़ के चारों ओर हिंदू धर्म के नए रक्षक उठ खड़े हुए थे।
जैसा कि जेम्स टॉड बाबर द्वारा किए गए तुर्क आक्रमण के विषय में सुंदरता से वर्णन – “कॉकस की भौंहों और ऑक्सस के तट पर एकत्र तूफानों का विस्तार अब उनके पौत्र सांगा के शीश पर फटने वाला था और यह सब स्वयं महाराणा कुंभा द्वारा ही प्रभावित था।”
इस कथन में टॉड, कुंभा के पोते महाराणा सांगा और बाबर के बीच 1527 में खानवा में होने वाले संघर्ष का उल्लेख कर रहे हैं। हम्मीर की ऊर्जा, लाखा की कला के प्रति रुचि और प्रतिभा से प्रेरित कुंभा ने अपने हर उद्यम में सफलता प्राप्त की और एक बार पुनः मेवाड़ के ‘केसरी ध्वज’ को घग्गर के तट पर ला खड़ा किया, जहाँ उनके पूर्वजों ने मोहम्मद गौरी के विरुद्ध महान पृथ्वीराज चौहान के साथ मिलकर युद्ध किया था।
यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि मोहम्मद गौरी द्वारा पृथ्वीराज की हार के पश्चात् तुर्कों और अफगानों से लेकर उज्बेक और तातारियों तक विभिन्न मुस्लिम आक्रमणकारियों ने दिल्ली को लूट-लूटकर विदीर्ण कर दिया था।
उस समय दिल्ली में उसी तरह का सत्ता संघर्ष चल रहा था, जैसा कि अरब में खलीफा के पद के लिए हिंसक संघर्ष हुआ था। इस काल में 24 पुरुष और एक महिला शासक ने उत्तराधिकार प्राप्त करने हेतु हत्या-विद्रोह-कपट तथा द्रोह का पथ अपनाया और दिल्ली पर थोड़े-थोड़े समय के लिए अस्थिर कब्जा किया। जबकि इसी समयावधि में मेवाड़ में केवल 11 शासकों ने सिंहासन सँभाला और अपना शासन सुचारु रूप में चलाया।
यद्यपि मेवाड़ के इन राणाओं में भी अधिकांश की मृत्यु अल्पकाल में ही धर्म और मातृभूमि की रक्षा करते हुए इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष में हुई। दिल्ली में तीन शताब्दियों तक चलने वाले इस सत्ता संघर्ष में हुए रक्तपात से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस्लामी समाज, किस तरह की बर्बर परिपाटी को सामाजिक और राजनीतिक अस्तित्व में लाते हैं।
भारत पर हिंसक इस्लाम का निरंतर आक्रमण इस बात का एक बहुत ही शिक्षाप्रद उदाहरण है कि मतांध बर्बर समाज किस प्रकार से उन्नत सभ्यताओं को नष्ट कर सकते हैं। किंतु साथ ही यह भी सिद्ध हो जाता है कि यदि उस सभ्यता के रक्षक, बर्बर कट्टरपंथियों से संघर्ष करने हेतु दृढसंकल्प हों तो उन्हें रोका भी जा सकता है। मेवाड़ के महाराणाओं ने अपने जीवन आदर्शों और कार्यों से यह स्थापित किया।
उस समय में तथाकथित दिल्ली सल्तनत को राणा हम्मीर सिंह और उनके पुत्र राणा लाखा तथा पौत्र मोकल ने पहले ही पराजित कर दिया था। कुंभा के काल में दिल्ली के आस-पास कोई प्रभावी मुस्लिम शासक नहीं था।
दिल्ली के आस-पास किसी प्रासंगिक शासक का न होना भी इस तथ्य को रेखांकित करता है कि तथाकथित दिल्ली सल्तनत केवल वामपंथियों के रुग्ण मस्तिष्क में ही चल रही थी।
वास्तव में इस काल्पनिक सल्तनत में न तो कोई सातत्य था, न ही कोई मौलिक प्रभाव।
इस्लामी कट्टरपंथियों ने अपने कुत्सित हाथ अब मध्य और पश्चिमी भारत की ओर बढ़ा लिये थे, किंतु विशाल और शक्तिशाली मेवाड़ का साम्राज्य, तुर्क आक्रमणकारियों के समक्ष एक अभेद्य कवच की भाँति खड़ा था।
मेवाड़ की लोककथाओं के अनुसार, कुंभा ने अपने जीवनकाल में 56 युद्ध लड़े। जिनमें वे एक भी युद्ध में पराजित नहीं हुए।
हम कुंभा के ऐसे चार अभियानों के विषय में बात करेंगे।
कुंभा ने मालवा, गुजरात और नागौर के मुस्लिम राज्यों को पराजित कर, नागौर को अपने अधीन कर लिया। इसके अतिरिक्त मारवाड़ के मंडोर पर अधिकार कर उन्होंने मारवाड़ को भी मेवाड़ में सम्मिलित कर लिया। यह एक ऐसा कार्य था, जो उनसे पहले अथवा उनके पश्चात् किसी भी राजा ने नहीं किया था।
मालवा पर विजय व महमूद का मानमर्दन
मालवा पर शक्तिशाली सुल्तान, महमूद खिलजी का शासन था, जिसने अपने श्वसुर होशंग शाह की हत्या करके मालवा की सत्ता हथिया ली थी। महमूद एक कपटी, सशक्त योद्धा और धर्मांध कट्टरपंथी होने के साथ ही मेवाड़ का प्रबल शत्रु भी था।
महमूद के साथ कुंभा का पहला सामना 1440 ईसवी के आस-पास मालवा के सारंगपुर में हुआ और राणा कुंभा ने उसे बुरी तरह पराजित किया। महमूद युद्ध छोड़ पलायन कर गया और मांडू के दुर्ग में जाकर छुप गया। कुंभा ने उसका पीछा किया और उसे वहीं से पकड़ लिया। पराजित महमूद को चित्तौड़ लाया गया और छह मास तक कारागृह में रखा गया।
इसी तरह की परिस्थितियों में हम्मीर द्वारा तुगलक के साथ किए गए अपमानजनक व्यवहार के विपरीत कुंभा ने महमूद के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया और युद्ध में हुई हानि के बदले उससे धन-हाथी एवं अश्व दंडस्वरूप लेकर उसे सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया।
अपने इस्लामी शत्रुओं को समाप्त न करने की हिंदू राजाओं की यह प्रकृति किसी भी प्रकार तर्कसंगत नहीं कही जा सकती।
इसी विकृति के कारण इतने प्रतापी हिंदू राजा भी इस्लामी हिंसा को भारत से पूर्णतया कभी मिटा नहीं पाए।
इस्लामी अतिक्रमण का बीज नाश नहीं करना, हमारे विलक्षण पुरखों की सबसे बड़ी भूल रही।
जेम्स टॉड भी पृथ्वीराज, हम्मीर और कुंभा जैसे हिंदू राजाओं के इस गुण पर आश्चर्य करते हैं और लिखते हैं– “हिंदुओं के चरित्र में अहंकार, राजनीतिक अंधापन, गौरव तथा उदारता का विचित्र मिश्रण है। अपने घोर विरोधी को भी क्षमा कर देना हिंदू राजाओं की क्षमाशीलता की अति है।”
यद्यपि महान महाराणाओं के इन उदार और क्षमाशील कृत्यों को केवल एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा, किंतु बार-बार जब इसी तरह से हिंदू धर्म पर आघात करने वाले कपटी और दुष्ट शत्रुओं को क्षमा करने की परिपाटी देखते हैं तो हमें भी आश्चर्य होता है कि मेवाड़ के महान महाराणा भी इन त्रुटियों की पुनरावृत्ति क्यों करते रहे ?
इसी छद्म उदारता के कारण इस्लामी आक्रांताओं ने न केवल पुनः एकत्र होकर अधिक शक्ति के साथ भारतभूमि पर आक्रमण करने का साहस किया, वरन् इस्लामी आक्रांताओं द्वारा प्रताड़ित प्रजा और मेवाड़ के साहसी योद्धाओं के बलिदान को एक क्रूर मजाक बनाकर रख दिया। इसके अतिरिक्त इस तरह से इस्लामी आक्रांताओं को भी एक विपरीत संदेश गया कि वे चाहे जितनी बार आक्रमण करें, यदि पराजित होकर युद्धबंदी भी बनाए गए तो उनकी हत्या नहीं होगी, उन्हें क्षमा कर दिया जाएगा; और इसी कारण इन अनैतिक, निर्लज्ज सिरफिरों में भारतभूमि पर बार बार आक्रमण करने की लालसा और अधिक प्रबल हो जाती थी।
यह विचारणीय विषय है कि किस प्रकार गौरी, तुगलक और खिलजी के साथ किया गया क्षमाशील व्यवहार हमारे देश और धर्म के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। 1191 ईसवी में तराई के प्रथम युद्ध के पश्चात् जब पृथ्वीराज ने गौरी को जीवित छोड़ा तो अपमान की अग्नि में जलते हुए गौरी ने पुनः भारत पर आक्रमण किया और इस बार उसने छल से पृथ्वीराज पर विजय प्राप्त कर उन्हें न केवल बंदी बनाया, वरन् उन्हें अंधा कर के मार ही डाला। मेवाड़ के सहस्रों राजपूत योद्धाओं ने भी तराई के युद्ध में अपना बलिदान दिया था।
जिन इस्लामी मूल्यों को 500 वर्षों तक बाप्पा रावल, खुमाण, नागभट्ट, ललितादित्य और इनके जैसे असंख्य हिंदू योद्धाओं ने भारतभूमि में घुसने नहीं दिया था, उन्हीं इस्लामी मूल्यों को केवल पृथ्वीराज की क्षमाशीलता के कारण भारतभूमि को विदीर्ण करने का अवसर मिल गया। गौरी ने पृथ्वीराज को पत्र लिखकर इस्लाम स्वीकार करने की शर्त रखी थी। हमारे ब्राह्मण गुरुओं व विचारकों ने पृथ्वीराज को इस्लाम का सत्य क्यों नहीं समझाया, यह समझ से परे है। यदि पृथ्वीराज के सहायक व परामर्शदाता, उन्हें गौरी की सोच समझा पाते तो कोई कारण नहीं था कि ऐसे पागल हत्यारे को पराजित करने के बाद जीवित छोड़ दिया जाता।
1191 में गौरी की पराजय पर राम गोपाल मिश्रा लिखते हैं– “पृथ्वीराज अपनी विजय को सरलता से नैसर्गिक परिणति की ओर ले जा सकते थे। गौरी का वध व उसकी सेना का नाश सम्मुख था। किंतु पृथ्वीराज ने पराजित गौरी और उसकी सेना को बिना हानि के जाने दिया। यद्यपि पृथ्वीराज का यह निर्णय हिंदू शास्त्रों के अनुसार था, किंतु धार्मिक रूप से एक उन्मत्त व पागल शत्रु के लिए सर्वथा अनुचित था। जो इस्लामी हत्यारा अपनी विजय के लिए किसी भी नैतिकता या विचारधारा को नहीं मानता था, उस पर दया का कोई औचित्य नहीं था। हिंदुओं में यह प्रतिभा ही नहीं थी कि ऐसे क्रूर शत्रु के वास्तविक स्वरूप को समझ सकें। ऐसे सिरफिरों के प्रतिकार के लिए एकदम नए मापदंड व उपाय होने चाहिए थे। अन्यथा भारत का स्वतंत्र रहना असंभव था।”
500 वर्षों तक जिस इस्लाम को बाप्पा, खुमाण, जैत्र सिंह, ललितादित्य, नागभट्ट, अनंगपाल इत्यादि राजाओं ने कितने-कितने कष्ट पाकर रोका था, वह पृथ्वीराज की एक भूल के कारण भारत में घुसने में सफल हुआ।
1192 ईसवी में महाराज पृथ्वीराज की उस पराजय से भारत आज तक उबर नहीं पाया है।
इसके पश्चात् हम्मीर द्वारा तुगलक को क्षमा करना दूसरी सबसे बड़ी भूल थी। तुगलक अवसर पाकर दिल्ली भाग गया और पुनः अपनी सेना तथा साधन एकत्र करके उसने भारत के दक्षिणी भाग पर आक्रमण कर दिया। भारत का सौभाग्य है कि उस समय दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य ने तुगलक का सामना किया और उसे पराजित किया, परंतु फिर भी तुगलक ने दक्षिण में हिंदू संस्कृति को बहुत हानि पहुँचाई।
तुगलक के लिए मुस्लिम इतिहासकार भी लिखते हैं कि उसकी हिंदू घृणा अतुलनीय थी। वह हिंदुओं की हत्या कर, उनके मुंडों की मीनार बना कर विक्षिप्त तांडव किया करता था।
कुंभा के प्रकरण में भी जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, हम देखेंगे कि महमूद खिलजी ने कुंभा की उदारता का उत्तर किस कृतघ्नता से दिया और अपने जीवनकाल में उसने छह बार और मेवाड़ पर आक्रमण किए। यद्यपि प्रत्येक आक्रमण में कुंभा ने उसे बुरी तरह पराजित किया, किंतु इन युद्धों में जन-धन की भारी क्षति तो पहुँची ही थी। केवल अपनी उदारता और क्षमाशीलता के ध्वज को लहराने हेतु मेवाड़ के भविष्य को पुनः पुनः उसी संकट में डालने का क्या औचित्य था ?
हिंदू राजाओं द्वारा किए गए इन उदार किंतु अविवेकपूर्ण कृत्यों से ज्ञात होता है कि धर्म तथा कौटिल्य द्वारा परिभाषित राजधर्म का उन्हें कम ज्ञान था।
इसके विपरीत, हमारे अवतार, भगवान् श्रीकृष्ण ने कौरवों को कभी क्षमा नहीं किया। महाभारत के युद्ध के अंत में जब कौरवों के शिविर में केवल दुर्योधन ही शेष रहा, तब भी श्रीकृष्ण ने भीम के साथ खड़े रहकर संकेत के द्वारा भीम को दुर्योधन की जँघा पर वार करने का स्मरण कराया। जब श्रीकृष्ण से युद्ध के नियमों पर युधिष्ठिर चर्चा करते हैं तो योगेश्वर का उत्तर था–
“मायावी मायया वध्यः। सत्यमेतद युधिष्ठिर।” 9.30.6 अर्थात् “मायावी व्यक्ति का वध माया से करना उचित है। यही एकमात्र सत्य है, हे युधिष्ठिर।”
रामायण में भी यही उपदेश दिया गया है–
“पूर्वापकारिणं हत्वा न ह्यधर्मेण युज्यते” 2.96.2453
अर्थात् “अपराधी को मारना अधर्म नहीं है।”
कौटिल्य ने भी राज्यद्रोही को क्षमा करने का उल्लेख अपने ग्रंथों में कहीं नहीं किया है। हिंदू राजाओं द्वारा इस्लामी शत्रुओं को क्षमा करने के इन कृत्यों का आधार केवल सात्त्विक अहंकार ही कहा जा सकता है, जब अहंकार सत्व के वस्त्र धारण करके आता है। वीर सावरकर ने इसे ‘सद्गुण विकृति’ का नाम दिया है। मतांध हत्यारों को क्षमा करना अपनी प्रतिष्ठा के ध्वज को लहराने में तो सहायक हो सकता है, किंतु इसकी परिणति सहस्रों वर्षों तक जन-धन की हानि और धर्म तथा राष्ट्र के विनाश के रूप में होती है।
जो हत्यारा अपने धर्म के विस्तार के लिए हत्या व बलात्कार को उचित मानता है, उस पर दया का क्या प्रयोजन! मेवाड़ के पुरोहितों, सामंतों व चारणों को भी यह ध्यान रखना चाहिए था कि महाराणाओं को इस प्रकार का आत्मघाती निर्णय न करने देते एवं उचित परामर्श देते।
उस समय के हिंदू संस्कारों के अनुसार कदाचित् इस प्रकार के व्यवहार की अनुमति रही होगी, किंतु हम्मीर एवं कुंभा के समक्ष पृथ्वीराज का उदाहरण पहले से था, अतः उन्हें राजधर्म का पालन करते हुए शत्रु का वध कर देना चाहिए था।
मेवाड़ की पूरी गाथा में प्रताप ही ऐसे नायक हैं, जिनको कभी इस प्रकार की उदारता का बुखार नहीं चढ़ा। हम दिवेर के अध्याय में देखेंगे कि प्रताप ने निर्ममता से उस प्रत्येक शत्रु को परलोक पहुँचा दिया, जो तुर्कों को मेवाड़ से समूल उखाड़ने के पुनीत कार्य में बाधा बना। इस प्रकार प्रताप न केवल एक योद्धा के रूप में चमके, वरन् एक दूरदृष्टा के रूप में उन्होंने अपने पूर्वजों की त्रुटियों से शिक्षा लेकर तुर्कों पर कोई दया नहीं दिखाई।
गुजरात की विजय
अब गुजरात के शासक कुतुब-उद्-दीन तथा कुंभा के मध्य हुए सैनिक संघर्ष की बात कर लेते हैं। कुंभा की सेना, उत्तर भारत से मेवाड़ के रास्ते सूरत की ओर जाने वाले व्यापारियों से बहुत राजस्व प्राप्त करती थी, और इसी कारण गुजरात का शासक, मेवाड़ को पराजित कर इस समस्या का निवारण चाहता था। इधर कुंभा ने सिरोही तथा बूँदी जैसे महत्त्वपूर्ण राज्यों को भी मेवाड़ में सम्मिलित कर लिया था, क्योंकि कुंभा को संदेह था कि मेवाड़ के निकटवर्ती राज्य कभी भी गुजरात से संधि कर लेंगे तथा उनके लिए कष्टदायी होंगे। इसके अतिरिक्त सिरोही तथा बूँदी, गुजरात के पश्चिमी व्यापारिक पथ को अपने नियंत्रण में लेने की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण थे।
कुंभा ने गागरौन, अजमेर, चाकसू इत्यादि के अतिरिक्त सुदूर स्थित जयपुर के निकट सांभर पर भी अधिकार कर उन्हें मेवाड़ की सीमाओं में सम्मिलित कर लिया।
1456 में मालवा तथा गुजरात के इस्लामी शासकों ने आपस में मित्रता कर ली। गुजरात के चांपानेर के निकट इन दोनों के बीच एक संधि हुई, जिसके पश्चात् दोनों ने मिलकर मेवाड़ पर आक्रमण किया, ताकि कुंभा को एक ही बार में सदा के लिए समाप्त किया जा सके।
गुजरात के चांपानेर में हुई इस संधि के विषय में मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है–“राणा कुंभा के विरुद्ध किए जा रहे प्रयासों में महमूद खिलजी एक ओर से, तो कुतुब-उद्-दीन दूसरी ओर से आक्रमण करेंगे। दोनों मिलकर कुंभा को समाप्त कर देंगे एवं कुंभा के राज्य को आपस में बराबर बाँट लेंगे। गुजरात से लगे सभी क्षेत्र कुतुब-उद-दीन के राज्य में शामिल होंगे तथा मेवाड़ और अहीरवाड़ा के क्षेत्र मालवा के हो जाएँगे।
इस समय मेवाड़ सभी ओर से घिर गया था, क्योंकि कुंभा के ही एक भाई क्षेमा ने भी विद्रोह कर कुंभा के विरुद्ध शस्त्र उठा लिये थे। 1456-57 ईसवी की शीत ऋतु में दोनों मुस्लिम सेनाओं ने मेवाड़ पर एक साथ आक्रमण कर दिया। कुतुब ने दक्षिण-पश्चिम की ओर से सिरोही में पैर जमाए और कुंभलमेर को ध्वस्त करता हुआ चित्तौड़ की ओर मुड़ गया। कुंभा ने निडर होकर कुतुब का सामना किया और उसे पराजित किया।
यद्यपि मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार राणा ने कुतुब को धन लेकर गुजरात पुनः लौटने को कहा, जो त्रुटिपूर्ण लगता है, क्योंकि चांपानेर की संधि के अनुसार कुतुब को वैसे भी दक्षिण-पश्चिमी मेवाड़ का प्रमुख भाग मिलना था। यदि वह विजयी हुआ होता तो केवल कुछ रुपए लेकर ही क्यों हटता ? अपना पूरा भाग लेकर ही वहाँ से जाता।
जब राणा, कुतुब को पराजित करने में व्यस्त थे और उसे गुजरात की ओर धकेल रहे थे, मालवा के महमूद ने उत्तर-पूर्व मेवाड़ तथा अजमेर पर आक्रमण किया, किंतु उसे वहाँ मेवाड़ के सामान्य सैनिकों ने ही पराजित कर दिया। महमूद ने मांडलगढ़ में शरण ली और वहाँ कुंभा ने उसे पराजित किया।
फरिश्ता द्वारा लिखित मुस्लिम इतिहास में इस युद्ध का परिणाम कुछ इस प्रकार लिखा गया– “मालवा के सेनानायकों ने अपने राजा को सैनिकों की कम होती संख्या एवं शिविर की बिगड़ती स्थितियों के आधार पर वापस लौट जाने की सलाह दी और इस सलाह को मानकर सुल्तान मांडू लौट गया।”
फरिश्ता के लेखन को अनुवादित करने वाले कर्नल ब्रिग्स लिखते हैं, “जिस युद्ध को अनिर्णीत लिखा जाए, उसे पराजय ही माना जाए।”
अतः कुंभा ने इस्लामी सेनाओं को एक साथ और भी बुरी तरह से पराजित किया और कुतुब को भी गुजरात भाग जाना पड़ा।
राणा ने यहीं इतिश्री नहीं की। 1457-58 ईसवी में राणा ने इन दोनों ही शासकों पर अपने मनचाहे स्थान एवं समय पर आक्रमण किया तथा उनके द्वारा हस्तगत की गई मेवाड़ की पग-पग भूमि को पुनः अपने अधिकार में ले लिया। मुहम्मद खिलजी ने 1469 ईसवी में अपनी मृत्यु से पूर्व मेवाड़ पर छह बार और आक्रमण किए।
नागौर का अधिग्रहण
इसके पश्चात् कुंभा द्वारा तीसरा और बड़ा सैन्य अभियान चलाया गया, जो था नागौर अभियान।
इस समय तक जोधपुर राज्य की स्थापना नहीं हुई थी। नागौर मुजाहिद खाँ के अधिकार में था। मुजाहिद का भाई शम्स खाँ, नागौर पर अधिकार करना चाहता था। उसने इस अभियान में कुंभा से सहायता माँगी। लंबे समय से कुंभा मेवाड़ की सीमाओं का मारवाड़ में विस्तार करना चाहते थे, अतः कुंभा एक बड़ी सेना लेकर नागौर पहुँचे, जहाँ उन्होंने मुजाहिद खाँ को पराजित कर नागौर का शासन शम्स खाँ को सौंप दिया। कुंभा ने उसे राजा बनाकर उससे दो वचन लिये–
1. शम्स नागौर की किलेबंदी को स्वयं हटाएगा।
2. नागौर की हिंदू जनता को मुसलमान कभी दुःखी नहीं करेंगे।
शम्स ने दोनों ही वचनों का पालन नहीं किया। उसने नागौर के दुर्ग में किलेबंदी को बढ़ाया एवं हिंदुओं का अपमान करने हेतु गौहत्या की सार्वजनिक अनुमति भी दे दी।
तब कुंभा ने 50,000 की सेना के साथ पुनः लौटकर शम्स खाँ को पराजित किया। शम्स भागकर गुजरात के कुतुब के पास पहुँचा एवं कुतुब ने घोर शराबी सेनापति, इमाद-उल-मुल्क के नेतृत्व में एक बड़ी सेना कुंभा से युद्ध करने हेतु नागौर भेजी। कुंभा ने शांतिपूर्वक वहीं उनके आने की प्रतीक्षा की और जैसे ही गुजरात की सेना नागौर पहुँची, कुंभा एवं उनकी सेना ने उन्हें बुरी तरह पराजित किया।
कीर्ति स्तंभ की प्रशस्ति में कुंभा की विजय के विषय में लिखा है– “कुंभकर्ण ने गुजरात के सुलतान को पराजित करते हुए नागौर विजय किया, फिरोज द्वारा निर्मित मस्जिद को तोड़ा, दुर्ग को ध्वस्त किया, सभी हाथी छीन लिये, मुस्लिम महिलाओं को बंदी बनाया, यवनों को दंड दिया, गौ-रक्षा की, नगर की सभी मस्जिदों को जला दिया और नागौर को एक गौचर भूमि बनाकर शम्स खाँ की पूरी संपत्ति लूट ली।”
इसके पश्चात् शम्स और कुतुब पुनः कभी नागौर नहीं आए। कुंभा द्वारा नागौर के साथ ही सांभर पर भी अधिकार कर लिया गया एवं नागौर में एक हिंदू जागीरदार को नियुक्त कर दिया गया।
कुंभा ने नागौर दुर्ग की किलेबंदी को स्वयं अपनी देखरेख में नष्ट करवाया। दुर्ग के विशालकाय द्वार के साथ ही हनुमानजी की मूर्ति भी कुंभा अपने साथ इस विजय की स्मृति के रूप में कुंभलगढ़ ले गए। वहाँ इन द्वारों को लगवाकर उनके पास ही एक मंदिर में हनुमानजी की स्थापना की गई। आज भी कुंभलगढ़ के दुर्ग में इस स्थान को ‘हनुमान पोल’ के नाम से जाना जाता है।
मंडोर विजय व जोधपुर की स्थापना
कुंभा का अंतिम सैन्य अभियान था मंडोर की विजय, जो पूर्व में मारवाड़ की राजधानी थी।
परिवार के अंतर्कलह की एक कथा, जिसे हम महाराणा लाखा के अध्याय में पढ़ चुके हैं, उसी के आधार पर कुंभा ने अपने भाई एवं मामा जोधा का मंडोर तक पीछा किया। कुंभा द्वारा मारवाड़ में चलाए गए इस सैन्य अभियान के मुख्य नायक थे कुंभा के काका रावत चूँडा। चूँडा ने मंडोर पर अधिकार कर अपने पुत्रों को वहाँ का अधिकारी बना दिया।
इधर कुंभा की दादी ने उन्हें समझाया कि उन्हें मारवाड़ के राठौड़ों के प्रति इतना कठोर नहीं होना चाहिए, क्योंकि एक तो उनका रक्तसंबंध है और दूसरे उन दोनों का एक ही शत्रु है—इस्लामी आक्रांता।
कुंभा ने यहाँ अपने पाँव पीछे कर लिये। उन्होंने जोधा को चूँडा के पुत्रों से मंडोर ले लेने दिया।
इसके पश्चात् राव जोधा ने जोधपुर नाम से नगर बसाया। जोधपुर कालांतर में मारवाड़ में सत्ता का केंद्र बना तथा अजीत सिंह एवं दुर्गादास राठौड़ के नेतृत्व में औरंगजेब के विरुद्ध सफल संघर्ष में मुगलों को पराजित करने में निर्णायक बना। कुंभा की जोधा के प्रति उदारता से शताब्दियों तक चलने वाले एक ऐसे संबंध की शुरुआत हुई, जिसके कारण कुंभा के पौत्र सांगा को मेवाड़ का एक सशक्त साम्राज्य स्थापित करने में सहायता मिली एवं दोनों राज्यों ने बाबर के आक्रमणों का प्रत्युत्तर भी साथ मिलकर दिया।
इसके पश्चात् सिसोदिया एवं राठौड़ वंश की संयुक्त सेनाओं ने राज सिंह के शासनकाल में भी औरंगजेब को पराजित किया।
अतः ऐसा कह सकते हैं कि कुंभा की दूरदृष्टि एवं उदारता के कारण राजपूतों में एकता की नींव रखी गई, जिससे भारतवर्ष से मुगलों को समूल नष्ट करने में महती सहायता मिली।
स्थापत्य कला व लेखन
अब कुंभा द्वारा स्थापत्य के क्षेत्र में किए गए विकास कार्यों की बात करते हैं। मेवाड़ के क्षेत्र में फैले कुल 80 दुर्गों में से अकेले कुंभा ने ही 32 दुर्गों का निर्माण करवाया था। हम कल्पना कर सकते हैं कि इसमें कितने धन का व्यय हुआ होगा। कितने लोग लगे होंगे, कितना उद्योग विकसित हुआ होगा। और यह सब कुंभा की दूरदृष्टि तथा रचनात्मकता ही थी कि यह सब कुंभा ने अपने चालीस वर्षों के शासनकाल में संपन्न करवाया।
इन दुर्गों में सबसे उत्तम दुर्ग है कुंभलगढ़ दुर्ग, जो कि कालांतर में मेवाड़ की राजधानी भी बना। एक प्राचीन कथा के अनुसार, यह पहले एक जैन राजा, संप्रति का दुर्ग था, जो कि राजा चंद्रगुप्त के वंशज थे। कुंभा ने कुंभलगढ़ दुर्ग को ऐसे बनाया था कि न केवल यह स्थापत्य कला का एक अद्भुत उदाहरण है, वरन् किसी आक्रमणकारी सेना के लिए भी दुर्जेय है। समुद्र तल से 1,100 मीटर (3,600 फीट) की ऊँचाई पर अरावली की पर्वतमाला में निर्मित यह दुर्ग 36 किलोमीटर की परिधि में फैला है तथा चीन की दीवार के बाद विश्व में दूसरी सबसे लंबी दीवार होने का गौरव रखता है।
कुंभलगढ़ सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण एक ऐसा दुर्ग है, जो मेवाड़ और मारवाड़ के बीच निर्मित है, अतः इस दुर्ग से दोनों ही क्षेत्रों पर दृष्टि रखी जा सकती है। इस महत्त्वपूर्ण दुर्ग की केवल स्थापत्यिक एवं सामरिक महत्ता ही नहीं है, वरन् भविष्य में जब चित्तौड़ पर इस्लामी आक्रमण हुए तो राजपरिवार को शरण लेने के लिए इसी दुर्ग को सर्वाधिक सुरक्षित माना गया।
दुर्ग में लगभग 360 मंदिर हैं, जिनमें 300 मंदिर जैन तीर्थंकरों को समर्पित हैं तथा शेष हिंदू देवी-देवताओं को।
राणा कुंभा के शासनकाल में कुंभलगढ़ पर कुतुब तथा महमूद खिलजी ने बार-बार आक्रमण किए, किंतु वे कभी इस दुर्ग पर विजय प्राप्त नहीं कर सके।
दुर्ग की आराध्य देवी, बाण माता का मंदिर दुर्ग से कुछ ही दूरी पर स्थित है, जिसे पराजय के क्षोभ में मालवा के महमूद खिलजी ने क्षति पहुँचाई थी। ईसवी 1442 में खिलजी ने इस मंदिर पर आक्रमण किया। मंदिर की सुरक्षा हेतु दीप सिंह राजपूत अपने कुछ सौ योद्धाओं के साथ कुंभा द्वारा रखे गए थे। मालवा की पूरी सेना को इस वीर राजपूत ने एक सप्ताह तक मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया। कुंभा उस समय मेवाड़ से बाहर थे, इसलिए दीप सिंह की सहायता नहीं कर पाए। महमूद के बहुत से सैनिकों को मौत के घाट उतारने के बाद मेवाड़ के मुट्ठी भर योद्धा अपनी आराध्य देवी की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। महमूद ने अपने मजहब सम्मत आचरण करते हुए मूर्तियों को भंग कर उन्हें तोलने के बाट बनवाए। उसने मंदिर की मुख्य मूर्ति को तोड़कर उसका चूरा पान में भर-भरकर स्थानीय लोगों को बलपूर्वक खिलाया। कुंभा के लौटने से पूर्व ही महमूद यह कुकर्म कर, मालवा भाग गया।
यदि कुंभा ने सारंगपुर के युद्ध के बाद महमूद का वध किया होता तो ना तो हमारे मंदिरों की दुर्गति होती, न ही मेवाड़ दीप सिंह जैसे मूल्यवान् योद्धा गँवाता।
कुंभलगढ़ 1576 ईसवी में अकबर के शासनकाल में केवल आठ वर्षों के लिए अकबर के एक सेनापति शाहबाज खाँ के अधिकार में चला गया था, जिसे प्रताप ने अपने रण कौशल और श्रम के बल पर दिवेर के अभियान में पुनः प्राप्त कर लिया। कुंभलगढ़ के अतिरिक्त कुंभा ने अचलगढ़ एवं वसंतगढ़ की स्थापना आबू के क्षेत्र में की। ये दुर्ग पहले परमार राजाओं के अधिकार क्षेत्र में आते थे। उन्होंने आबू एवं पश्चिमी उपत्यकाओं के बीच के पथ को भी किलेबंदी कर सुरक्षित किया था
उन्होंने स्थानीय डाकुओं से सुरक्षा हेतु सिरोही में वासंती एवं राजसमंद में देवगढ़ की सुरक्षा हेतु मचींद दुर्ग का निर्माण करवाया। साथ ही उन्होंने आहोर एवं अन्य छोटे दुर्गों का निर्माण कर जालौर एवं पनोरा के भील दलों से सुरक्षा का मार्ग बनाया। इन्हीं दुर्गों के माध्यम से मेवाड़ तथा मारवाड़ का सीमा निर्धारण भी हुआ। उन्होंने चित्तौड़ दुर्ग का पुनर्निर्माण करवाया। कदाचित् उन्हें पूर्वाभास हो गया था कि भविष्य में मुसलमानों की तोपों के सामने दुर्ग की दीवारें स्थिर और प्रबल रखने में यह निर्माण सहायक होगा।
उन्होंने चित्तौड़गढ़ में ही मालवा के महमूद खिलजी पर सारंगपुर की विजय के उपलक्ष्य में नौ मंजिल ऊँचे ‘विजय स्तंभ’ का निर्माण करवाया। ‘विजय स्तंभ’ स्थापत्य कला का एक ऐसा अनुपम उदाहरण है, जिसे देखकर आज के समकालीन शिल्पी भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। भगवान् विष्णु के सम्मान में बनाए 122 फीट ऊँचे इस स्तम्भ का कार्य 1448 ईसवी में पूर्ण हुआ। यह अद्भुत निर्माण, सूत्रधार जैता तथा उनके तीन पुत्रों नापा, पूजा व पेमा ने स्वयं कुंभा के निर्देश में संपन्न किया।
मेवाड़ के कोने-कोने में कुंभा ने हिंदू एवं जैन मंदिरों का निर्माण करवाया, जिनमें चित्तौड़ का लक्ष्मीनाथ मंदिर, एकलिंगजी मंदिर तथा गोड़वाड़ में रणकपुर जैन मंदिर का निर्माण भी शामिल है। उन्हीं की प्रेरणा से उनके मुख्य वास्तुविद् मांदना ने छवि चित्रण, गृह निर्माण एवं गृह सज्जा पर अनेक ग्रंथ लिखे।
जब आस-पास के सभी मुस्लिम शासक कुंभा पर विजय प्राप्त करने की घातक एवं रक्तरंजित योजनाएँ बना रहे थे, तब कुंभा स्वयं हिंदू संस्कारों और परंपराओं पर आधारित संगीत-कला इत्यादि से भरपूर एक उत्कृष्ट जीवन जी रहे थे। यह लगभग अकल्पनीय है कि एक राजा, जो निरंतर युद्धों के कारण सुदूर यात्राएँ कर रहा था और शत्रुओं से जूझ रहा था, उसके शासनकाल में भी ऐसी अनुपम कलाओं का उत्थान कैसे हुआ होगा !
कुंभा स्वयं एक अच्छे गायक, वीणावादक तथा एक प्रबुद्ध लेखक थे। भारतीय रागों और रागिनियों पर आधारित उनके साहित्यिक कार्य को ‘संगीत राग’ के नाम से जाना जाता है। यह ग्रंथ विश्व भर में संगीत पर लिखे गए सबसे बड़े ग्रंथों में से एक है। अद्भुत बात यह है कि यह ग्रंथ दक्षिण भारत की शास्त्रीय शैली पर लिखा गया है। उन्होंने ‘सूड प्रबंध’ तथा ‘संगीत मीमांसा’ नामक ग्रंथ भी लिखे, इसके अतिरिक्त मातृशक्ति के विषय में उन्होंने ‘चंडी शतक’ लिखा; प्रेम तथा भोग विषय पर आधारित ‘कामराज रतिसार’ एवं ‘गीत गोविंद’ पर टीका भी लिखी।
ऐसा कहा जाता है कि अपने समय में कुंभा ने 1800 विभिन्न हिंदू पुस्तकों का अनुवाद करवाया। सहस्रों पुस्तकों पर टीका एवं उन पर प्रस्तुतियाँ भी लिखीं। उन्होंने इस संबंध में कार्य करने हेतु देश भर से वेदपाठी ब्राह्मणों को भी आमंत्रित किया। उनके ही काल में कुंभस्वामी मंदिर एवं आदिवाराह मंदिर का भी निर्माण हुआ।
एकलिंगजी मंदिर के एक क्षतिग्रस्त हिस्से का भी उन्होंने पुनर्निर्माण करवाया था, जिसे ‘कुंभ मंडप’ कहा जाता है। रणकपुर, सिरोही के सुंदर जैन मंदिर तथा चित्तौड़ में निर्मित श्रृंगार चॅवरी भी कुंभा के शासनकाल में ही निर्मित हुए।
आज जहाँ एक ओर वामपंथी लेखक, राजपूतों को केवल योद्धाओं के रूप में प्रस्तुत करते हैं, वहीं सत्य यह है कि मेवाड़ के राजपूत महाराणाओं ने कला और स्थापत्य में अनुपम एवं अनुकरणीय योगदान दिया है। कुंभा को ऐसे ही नहीं भारवर्ष के महान राजाओं, जैसे हर्ष तथा विक्रमादित्य के समान माना जाता है। उनका चहुँमुखी व्यक्तित्व तथा हिंदू धर्म के प्रति परम निष्ठा ही उन्हें अपने काल का ‘हिंदुओं का सूर्य’ बनाती हैं। यह अत्यंत दुःख का विषय है कि ऐसे महान, प्रबुद्ध एवं शौर्यवान राजा को इतिहास की पुस्तकों में उचित स्थान नहीं मिला है।
चारणों के साथ बिगाड़ व सुधार तथा महाप्रयाण
अब उन परिस्थितियों पर बात करते हैं, जिनमें इस महान राजा का देवलोकगमन हुआ। उस समय कुंभा की आयु पचास वर्ष की थी, और वे सक्रियता से मेवाड़ का शासन सुचारु रूप से चला रहे थे।
कुछ वर्षों पहले एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि कुंभा की मृत्यु किसी चारण द्वारा किए गए घात से होगी। कुंभा ने सभी चारणों को मेवाड़ से निष्कासित करने का आदेश दे दिया। चारण सरदारों को जो जागीरें प्रदान की गई थीं, वे भी उनसे वापस ले ली गईं। चारणों के लिए यह बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण समय था, क्योंकि वे राणा हम्मीर के समय से राज्य के संरक्षण में सुखद जीवनयापन कर रहे थे। हम्मीर को उनके ध्येय की सफलता हेतु माता बरवड़ी देवी नाम की एक चारण महिला द्वारा आशीर्वाद एवं आर्थिक सहायता प्राप्त हुई थी।
1468 ईसवी के आस-पास कुंभा एकलिंगजी के मंदिर गए। उन्होंने वहाँ एक गाय को जोर-जोर से रँभाते हुए सुना। इसी दिन से कुंभा उन्माद में आकर केवल एक ही वाक्य को बार-बार दोहराते थे, ‘कामधेनु तांडव करिय’ अर्थात् ‘कामधेनु गाय क्रोध में नाच रही है।’
राणा के इस व्यवहार से राजपरिवार एवं सामंतगण इत्यादि सभी दुःखी थे तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र रायमल (सांगा के पिता) ने उनसे पूछा भी कि इसका अर्थ क्या है? इस बात से कुद्ध होकर कुंभा ने रायमल को देश निकाला दे दिया। रायमल ने अपनी ससुराल ईडर में शरण ली। तब एक चारण ने जाकर मेवाड़ के सामंतों से कहा कि वे इस छंद की अगली पंक्ति पूरी कर सकते हैं, जो राणाजी बार-बार दोहरा रहे हैं एवं उसके पश्चात् राणाजी का यह उन्माद शांत हो सकता है।
चारण ने छंद इस प्रकार बनाया कि कुंभा का नाम उसमें भलीभाँति आ रहा था, अतः छंद सार्थक भी बन पड़ा था। कुंभा इस छंद से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने चारण से कहा, “यद्यपि तुम कह रहे हो कि तुम राजपूत हो, किंतु ऐसा कवित्त केवल एक चारण ही कह सकता है।” इस पर चारण ने कुंभा को प्रणाम करते हुए अपनी पहचान बताई।
कुंभा ने उसे क्षमा कर दिया एवं चारणों को दंड देने हेतु जितने आदेश दिए थे, सभी वापस ले लिये। किंतु कुंभा का व्यवहार दिनोदिन और विचित्र होता गया तथा उन्हें उन्माद के रोग ने पूरी तरह जकड़ लिया। एक दिन सुबह जब वे कुंभलगढ़ में मामदेव कुंड में स्नान कर रहे थे, तब उनके अपने ही पुत्र उदय सिंह, जिसे ‘ऊदा’ के नाम से जाना जाता था, ने उन पर आक्रमण कर उनकी हत्या कर दी।
इस प्रकार मेवाड़ के सबसे प्रबुद्ध, शौर्यवान एवं दूरदृष्टा महाराणा के जीवन का अंत अपने ही पितृहंता पुत्र के द्वारा हुआ। कुंभा की हत्या का प्रसंग मेवाड़ के उज्ज्वल इतिहास में एक कालिमा के रूप में सदा के लिए छा गया।
ऊदा ने अपने पिता की हत्या के पश्चात् चार वर्ष तक ही शासन किया।
फिर मेवाड़ के सामंतों ने उसके विरुद्ध विद्रोह कर दिया। मेवाड़ के सामंत, रावत कांधल ने ऊदा को पदच्युत करने की योजना बनाई। वे कुंभा के ज्येष्ठ पुत्र रायमल के पास गए, जो ईडर से लौट चुके थे और जब एक दिन ऊदा आखेट के लिए बाहर निकला तो दुर्ग का द्वार खोल, रायमल को दुर्ग में घुसा दिया गया एवं ऊदा के लिए दुर्ग के दरवाजे बंद कर दिए गए। इससे क्षुब्ध होकर ऊदा, मालवा के सुल्तान से जा मिला। एक दिन ऊदा पर आकाशीय बिजली गिरी और वह उसी क्षण समाप्त हो गया। ईश्वर ने उस द्रोही को पितृहत्या का उचित दंड दिया था। इस तरह से यह विवाद बिना किसी संघर्ष के राणा रायमल के पक्ष में समाप्त हो गया।
इसमें संशय नहीं है कि कुंभा के सामरिक अभियान, उनके द्वारा किए गए विकास कार्य एवं एकत्र की गई धनराशि, आगे चलकर उनके पौत्र सांगा एवं प्रताप के समय में इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष में निर्णायक रही।
यह भी सत्य है कि कुंभा ने अपने जीवनकाल में जो योजनाएँ, सैन्य अभियान इत्यादि चलाए अथवा जो धन संग्रह किया, उसके बिना, भविष्य में मुगलों के विरुद्ध संघर्ष की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। हम हिंदुओं को सदा के लिए कुंभा का ऋणी रहना चाहिए। इन महाराणा ने हमें ही नहीं, वरन् पूरे उपमहाद्वीप में इस्लामी दासता का विस्तार होने से रोका एवं भविष्य के लिए भी हिंदू प्रतिकार को सुदृढ़ किया।
एक सशक्त राजा, एक वास्तुविद् एवं निर्माणकर्ता, एक गायक एवं संगीतकार, दूरदर्शी सेनापति, एक प्रबुद्ध लेखक, एक स्थापित नर्तक और श्रीकृष्ण तथा दुर्गा के परम भक्त, महाराणा कुंभा के जीवन-चरित्र से हमारी आज की पीढ़ी को अवश्य प्रेरणा लेनी चाहिए। इतिहासविद् श्री आर.सी. मजूमदार ने कुंभा के विषय में लिखा है कि यदि कुंभा के समय में लिखे साठ अलग-अलग ग्रंथों एवं यत्र-तत्र फैले शिलालेखों की जानकारी को एकत्र किया जाए तो हमें ज्ञात होगा कि मध्यकाल के भारत में कुंभा से महान तथा अद्भुत राजा कोई और नहीं था।
कुंभा एक ऐसे प्रबुद्ध व्यक्तित्व थे, जिन्होंने राजस्थान को अपनी दूरदर्शिता एवं कलात्मकता के चलते अनुपम साहित्य, स्थापत्य एवं सामरिक महत्त्व की वस्तुएँ प्रदान कीं।
★ एक साहसी सेनानायक, जो कभी कोई युद्ध नहीं हारा।
★ एक सज्जन व्यक्तित्व, जिन्होंने सभी को उचित सम्मान एवं प्रेम दिया।
★ एक महान राजा, जिनकी स्मृति शताब्दियों तक रहेगी।
★ एक राजा, जिन्हें हिंदू इतिहास के पटल पर सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए और अब समय है कि हम भारतवर्ष के इस महान सपूत को उस स्थान पर प्रतिष्ठित एवं पूजित करें।