महाराणा सांगा : मेवाड शिखर पर व खानवा की महान विजय
(1508-1528 ईसवी)
महाराणा कुंभा की हत्या के पश्चात् उनके पुत्र रायमल, मेवाड़ सिंहासन पर विराजे तथा अपने यशस्वी पिता की भाँति राज्य का विस्तार किया। रायमल के समय में मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन ने चित्तौड़ पर हमला किया, जिसे रायमल ने पूरी तरह विफल कर दिया। गियासुद्दीन विशाल सेना लेकर फिर चित्तौड़ पर चढ़ आया। इस बार रायमल के ज्येष्ठ पुत्र, वीर पृथ्वीराज ने शत्रु को पराजित कर उसे बंदी बना लिया। गियासुद्दीन को एक माह तक कारागार में रखने और बहुत सा हर्जाना लेने के बाद, अपमानित करके छोड़ा गया। 1509 ईसवी में रायमल, सांगा को भरा-पूरा मेवाड़ सौंपकर स्वर्ग सिधारे।
अब तक के ज्ञात मानव इतिहास में अनगिनत शूरवीर एवं पराक्रमी राजा हुए हैं। इन सब राजाओं में महाराणा संग्राम सिंह की मेवाड़ के सिंहासन तक की संघर्ष यात्रा और इस्लामी अतिक्रमणवादियों पर संपूर्ण विजय की गाथा, इतिहास के सर्वाधिक रोचक एवं अद्भुत वृत्तांतों में से एक है। महाराणा कुंभा के पुत्र महाराणा रायमल के तेरह पुत्रों में पृथ्वीराज ज्येष्ठ, जयमल द्वितीय एवं सांगा तृतीय थे।
एक बार तीनों राजपुत्र एक भविष्यवक्ता के पास गए, जिसने भविष्यवाणी की कि सांगा ही मेवाड़ के अगले राजा होंगे। यह सुनकर पृथ्वीराज आपा खो बैठे और उन्होंने सांगा की दाईं आँख में अपनी खड्ग की मूठ से वार किया, जिससे सांगा की एक आँख की ज्योति ही चली गई। दोनों ज्येष्ठ भ्राताओं ने सांगा को मारने हेतु उन पर आक्रमण किया, किंतु रायमल के कनिष्ठ भ्राता सूरजमल ने उन्हें बचा लिया।
कुछ माह के बाद यह प्रश्न पुनः दोनों ज्येष्ठ भ्राताओं को सताने लगा तो वे सांगा और अपने काका सूरजमल को लेकर एक शक्तिस्वरूपा चारण लड़की ‘बीरी बाई’ के पास गए, जो देवी का अवतार मानी जाती थीं। बीरी बाई ने उनके बैठने की व्यवस्था की तो पृथ्वीराज और जयमल, सिंहासन पर जा बैठे। सांगा अपने काका सूरजमल के साथ धरती पर बिछे आसन पर बैठ गए। यह आसन सिंह की चर्म का बना था।
जब ज्येष्ठ भ्राताओं ने बीरी बाई से पूछा कि मेवाड़ के राजसिंहासन पर कौन बैठेगा तो उन्होंने उत्तर दिया, “निर्णय तो पहले ही हो चुका। यह धरती पर बिछा आसन मेवाड़ के महाराणा के लिए था। इस पर सांगा विराजमान हैं, अतः रायमल के पश्चात् वही मेवाड़ के अधिष्ठाता होंगे। अन्य दोनों भ्राता मेवाड़ के शत्रुओं के साथ संघर्ष में मृत्यु को प्राप्त होंगे।”
अब तो पूर्ण अनियंत्रित होकर दोनों बड़े भ्राताओं ने सांगा पर वहीं आक्रमण कर दिया। काका सूरजमल ने एक बार पुनः बीच में आकर उन दोनों से रक्षा कर सांगा को वहाँ से भाग निकलने का अवसर दे दिया।
जयमल ने सांगा का सेवंत्री ग्राम तक पीछा किया। वहाँ मेवाड़ के विश्वासपात्र राव बीदा ने सेवंत्री के सामंत होने से, रूप नारायण मंदिर में सांगा को आश्रय दिया। बीदा ने सांगा की सेवा-सँभाल की, किंतु जयमल वहाँ भी अपने सैनिकों समेत आ पहुँचे। बीदा ने जयमल से संघर्ष करते हुए सांगा की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। तब तक सांगा को मारवाड़ की ओर भाग निकलने का पर्याप्त समय मिल गया।
राणा रायमल को जैसे ही अपने पुत्रों के बीच इस विवाद की सूचना प्राप्त हुई तो उन्होंने कुपित हो अपने दोनों ज्येष्ठ पुत्रों जयमल व पृथ्वीराज को राज्य से निष्कासित कर दिया। उधर सांगा ने मेवाड़ से दूर, अपने घोड़े और राजचिह्नों को त्याग दिया और अजमेर के निकट श्रीनगर में एक साधारण चरवाहे की भाँति छिपकर रहने लगे।
यह स्थान ठाकुर करमचंद पँवार के अधीन था, जो राजपूत थे और छोटी-मोटी रियासतों को लूटकर जीवनयापन करते थे।
उधर मेवाड में, कुछ वर्ष पश्चात् कुँवर जयमल की हत्या, उन्हीं के मित्र रतन सिह द्वारा कर दी गई। कुँवर पृथ्वीराज अत्यंत ही साहसी राजपुत्र थे। उन्होंने विभिन्न युद्धों में अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर विजय प्राप्त की थी। किंतु उन्हें उन्हीं के साले द्वारा विष देकर मरवा दिया गया तथा पृथ्वीराज की अंत्येष्टि कुंभलगढ़ में कर दी गई।
रायमल अपने पुत्रों की एक-एक कर मृत्यु होते देख अत्यंत दुःखी थे और तभी उन्हें ज्ञात हुआ कि सांगा अब भी जीवित हैं। सांगा को रायमल के सामंतों ने खोज निकाला और उनके आश्रयदाता ठाकुर करमचंद को रायमल ने जागीरें इत्यादि दे कर सम्मानित किया। 24 मई, 1509 में रायमल के अवसान के पश्चात् सांगा मेवाड़ के महाराणा बने।
सांगा के संघर्षपूर्ण यौवनकाल और मेवाड़ के सिंहासन तक उनकी यात्रा से दो बातें पता चलती हैं, जो उल्लेखनीय हैं। पहली, भविष्यवक्ता और बीरी बाई: दोनों के द्वारा सांगा के जीवन के विषय में भविष्यवाणी से हिंदू मानस पर ज्योतिष एवं दैवी अवतारों के प्रति आस्था का पता चलता है। हिंदू समाज युगों से ऐसे गूढ़ और पराभौतिक विचारों से प्रभावित रहा है।
लेखक की रुचि यहाँ किसी भी प्रकार से इन विचारों और कार्यों का समर्थन अथवा विरोध की नहीं है। यह उल्लेख केवल युगों-युगों से चले आ रहे एक सामाजिक पक्ष के राजसी परिवारों पर प्रभाव को दर्शाने हेतु किया गया है। इस प्रसंग से यह भी ज्ञात होता है कि उस समय में मेवाड़ का आमजन किस प्रकार इन पराभौतिक कार्यकलापों से प्रभावित रहा होगा, यदि राजपरिवार का भी इनमें इतना विश्वास था।
द्वितीय, मेवाड़ के इतिहास पर बहुविवाह की प्रथा का कितना नकारात्मक प्रभाव रहा है, यह भी उल्लेखनीय है। यह आदिकालीन आवश्यकता का एक स्वरूप ही नहीं था, बल्कि इससे उपजी शाखाओं के कारण राजपरिवारों में अंतर्कलह इस सीमा तक बढ़ गई कि उन्हें सँभालना ही मुश्किल हो गया था।
जब भारत की धरती पर इस्लामी हमलावरों का आगमन हो चुका था, महाराणा की प्रत्येक रानी अपने पुत्र को मेवाड़ का महाराणा बनते देखने के लिए षड्यंत्रों में लिप्त रहती थी।
सांगा का संघर्षपूर्ण बाल्यकाल और हिंसा से प्रभावित जीवन तथा मेवाड़ के राजसिंहासन पर आरोहण, हमें बताता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी एक योद्धा का व्यक्तित्व किस प्रकार अपना वास्तविक स्वरूप लेता है। हमें इसी प्रकार के उदाहरण महाराणा प्रताप और महाराणा अमर सिंह के व्यक्तित्व में भी देखने को मिलते हैं। प्रथम दृष्ट्या ऐसा प्रतीत होता है कि सांगा के ज्येष्ठ भ्राता पृथ्वीराज में मेवाड़ का अगला महाराणा बनने की योग्यता तो थी, किंतु उनका अनियंत्रित क्रोध तथा सत्ता-प्राप्ति हेतु उनकी संकीर्ण मानसिकता ही उनकी महत्त्वाकांक्षा में बाधा बन गई। उनके क्रोधी स्वभाव के चलते उन्हीं के बहनोई द्वारा विष देने से उनकी असमय मृत्यु हुई।
दूसरी ओर, सांगा अपनी युवावस्था में संकोची और एकांतप्रेमी व्यक्ति थे। अपने द्वेषी भ्राताओं पर उनका विश्वास भी उनकी सरलता दरशाता है, क्योंकि एक बार अपने साथ दुर्व्यव्यहार होने और एक आँख खोने के पश्चात् भी वह पुनः उसी प्रश्न के उत्तर हेतु बीरी बाई के पास चले गए। यदि उनके काका सूरजमल नहीं होते तो कदाचित् उस मंदिर में ही उनकी हत्या हो जाती। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि यदि ऐसा हो जाता तो भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदुओं की क्या दुर्गति होती !
अजमेर, श्रीनगर के ठाकुर करमचंद के घर सांगा का अज्ञातवास में रहना उनके वीतरागी व्यक्तित्व को दरशाता है, जिसके चलते उन्होंने सहजता से अज्ञातवास का जीवन चुना। किंतु उन्हीं साधारण और उदासीन सांगा को उनकी कायापलट के पश्चात् हम उस समय के सबसे अधिक साहसी और आक्रामक राजा में परिवर्तित होते भी देखते हैं।
एक विलक्षण नायक, जिन्होंने न केवल मेवाड़, अपितु उस समय के भारतवर्ष के बहुत विशाल भूभाग पर निष्कंटक राज किया। महाराणा कुंभा के पश्चात् सांगा ही इतने प्रतापी हुए, जिनका राज्य उन सीमाओं तक था, जहाँ तक कुंभा ने पहुँचाया था।
सांगा मेवाड़ के एक ऐसे आध्यात्मिक और राष्ट्रभक्त सेवक के रूप में सामने आए, जो सत्ता के भूखे नहीं थे, किंतु जब मातृभूमि को उनकी आवश्यकता पड़ी तो उन्होंने सहर्ष इस दायित्व को स्वीकार किया। जैसे-जैसे हम इन अद्भुत महाराणा के जीवन में आगे बढ़ते हैं, जिन्होंने दिल्ली के लोधियों को धराशायी किया, हमें ज्ञात होता है कि सांगा में जो दृढ़ निश्चय, सैन्य-कुशलता और उच्चकोटि की नेतृत्व क्षमता थी, वह अन्य किसी राजा के जीवन में नहीं मिलती।
विचारणीय बात यह है कि इतने साहसी व निर्भीक सांगा अपने भाइयों से क्यों नहीं लड़े ? दोनों बार जान बचाने के लिए उन्होंने पलायन करना उचित समझा, पर भाइयों पर शस्त्र नहीं उठाया।
क्या आज के समाज में हम सांगा से सीख सकते हैं कि भले ही पूरा राज्य भी दाँव पर लगा हो, अपने परिवार को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए। स्वयं आँख गँवाकर भी सांगा ने भाई से वैर नहीं पाला। आगे हम देखेंगे कि इन्हीं सांगा ने दुर्वांत मुसलमानों से कैसे स्वाभिमान के लिए शत्रुता की।
महाराणा सांगा की जीवनगाथा एक ऐसे शांत राजपुत्र की कहानी है, जिन्होंने न केवल शारीरिक, अपितु मानसिक कमियों को पराजित करके, दयनीय और अपमानित जीवन से ऊपर उठकर सर्वोच्च पद को प्राप्त किया। सांगा के जीवन से एक मूल्यवान बात हमें सीखने को मिलती है कि कोई भी पराजय अंतिम नहीं होती। कोई भी अक्षमता हमें रोक नहीं सकती, कोई परिस्थिति अजेय नहीं होती, यदि हम अपने अंतर्मन के संकल्प से, बाहरी दबाव में न आकर, कभी भी न झुकने की ठान लें।
पुरुष का दृढ़ आत्मनिश्चय व कर्तत्व ही निर्णायक होते हैं तथा परिस्थिति प्रारब्ध, ऐसे पुरुष के दास बन जाते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति में जीवन की हर असफलता से आगे निकल आने की असीम क्षमता व संभावना होती है। सांगा का जीवन इस नियम का प्रबलतम प्रमाण है।
राजसिंहासन पर बैठते ही सांगा ने तुरंत मेवाड में व्यापक प्रशासनिक सुधार तथा मेवाड़ की सीमाओं का विस्तार आरंभ कर दिया। चौहान वंश के पश्चात् दिल्ली के सिंहासन पर खिलजी, तुगलक, गुलाम, सैयद और लोधी वंश का बारी-बारी अधिकार रहा, किंतु ये सब केवल पुरानी कथा मात्र होकर रह गए थे। राणा सांगा अस्सी हजार घुड़सवारों, उच्च श्रेणी के सात राजाओं , नौ राव , रावल और रावत की श्रेणी के कुल एक सौ चार सेनानायकों के अलावा पाँच सौ सैन्य हाथी इत्यादि दल-बल के साथ उत्तरी, मध्य और पश्चिमी भारत को विजय करने निकल गए आमेर और मारवाड़ के राजपुत्रों ने उन्हें भेंट प्रस्तुत की, अजमेर, ग्वालियर, सीपी रायसेन, काल्पी, चंदेरी, बूँदी, गागरौन, रामपुरा और आबू के रावों ने उनके ध्वज तले लड़ना स्वीकार किया और उन्हें अपना नायक माना। सांगा ने ठाकुर करमचंद पंवार जिन्होंने उन्हें आश्रय दिया था, उन्हें अजमेर की जागीर प्रदान की और उनके पुत्र जगमाल को ‘राव’ का पद दिया।
यह असाधारण ही है कि जिस राजपुत्र ने एक समय मेवाड़ के अपने राजस अधिकारों का सरलता से समर्पण कर दिया था और अज्ञातवास तक भोगा था, वह कालांतर में मेवाड़ के सर्वश्रेष्ठ राजपुरुषों में से एक बनकर उभरा। जीवन का प्रवाह अत्यंत विचित्र है। एक सरल व्यक्ति, जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो जाने वाला था, वह मेवाड़ का महाप्रतापी राजा बना और उसने ही मेवाड़ के गौरव को सर्वोच्च स्थान दिलाया।
मालवा की विजय
सांगा की महत्त्वाकांक्षाओं को दिल्ली, मालवा और गुजरात के मुस्लिम राजाओं से चुनौती मिली, जिनका वर्णन अब किया जाता है। मेवाड़ की सेनाओं की मालवा और दिल्ली की सेनाओं से 18 बार मुठभेड़ हुई। इनमें से दो तो सांगा और इब्राहिम लोधी की सेनाओं के बीच बकरोल और खतौली में आमने-सामने हुई थीं। खतौली में लोधी की सेना को बुरी तरह मारा-काटा गया और उसके पुत्र को बंदी बना लिया गया। इसी युद्ध में सांगा ने अपना एक हाथ तथा दूसरी ओर का पैर गँवा दिया। सांगा लोधी के पुत्र को चित्तौड़ ले गए, जहाँ से भारी रकम मिलने पर ही उन्होंने उसे स्वतंत्र किया।
लोक कथा है कि एक राज्य को पराजित करने के बाद जब सांगा को सिंहासन पर बैठने के लिए आमंत्रण दिया गया, तो सांगा धरती पर ही विराज गए। वे बोले, जिस प्रकार से मंदिर में खंडित मूर्ति का कोई स्थान नहीं होता, वैसे ही मेरा क्षत-विक्षत शरीर अब सिंहासन के योग्य नहीं रह गया है। आप लोग किसी और को राणा चुन लें। सामंतों ने उत्तर दिया कि युद्ध में हुए अंग भंग को लज्जा नहीं, गौरव का विषय माना जाता है। आप हर प्रकार से इस सिंहासन के योग्य हैं। तब सांगा ऊपर विराजे। इतने विनम्र थे महाराणा सांगा।
मालवा, मेवाड़ के पूर्व में एक धनी राज्य था। मालवा का राजा मुसलमान था, जबकि प्रजा हिंदू थी। महमूद खिलजी द्वितीय वहाँ एक राजपूत मंत्री मेदिनी राय के सहयोग से राज्य करता था। मेदिनी बहुत न्यायप्रिय व प्रतिभाशाली मंत्री थे तथा खुलकर हिंदू प्रजा का पक्ष लेते थे। कालांतर में मेदिनी का सेना पर नियंत्रण हो गया। मेदिनी राय ने महमूद के शासन को चुनौती दे दी। महमूद, गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर से सहायता माँग लाया तथा मालवा पर चढ़ाई कर दी। मेदिनी ने सांगा से सहायता माँगी। सांगा व मेदिनी की संयुक्त सेना ने गागरौन के युद्ध में महमूद व गुजरात की सेना को रौंद डाला। मुस्लिम इतिहासकारों के ही अनुसार, 30 बड़े सेनानायक व सहस्रों सैनिकों का नरसंहार हिंदुओं ने किया।
सांगा ने महमूद खिलजी द्वितीय को जीवित ही पकड़ लिया। वे उसे चित्तौड़ ले गए, यद्यपि उसका पूरा ध्यान रखा और कुछ समय पश्चात् ससम्मान छोड़ देने के लिए तीन शर्तें रखीं–
1. युद्ध का सारा व्यय महमूद को चुकाना होगा।
2. स्वर्ण की मूल्यवान टोपी व एक कमरबंद, जो कि मालवा की संपत्ति था।
3. महमूद का एक पुत्र मेवाड़ के दरबार में जमानत के रूप में रहेगा।
सांगा के इस क्षमादान पर क्या कहा जा सकता है, खिलजी ने जीवन भर मेवाड़ के शत्रुओं के साथ मित्रता रखी और सांगा द्वारा जीवनदान के उपकार के बदले केवल मेवाड़ को हानि पहुँचाता रहा।
यद्यपि महमूद को जीवित छोड़ने में सांगा का कोई विशेष प्रयोजन नहीं था, किंतु संभव है, यह कृत्य केवल अपनी उदारता दिखाने हेतु किया गया हो, जो उस समय के हिंदू राजाओं में बहुप्रचलित था। इसके विपरीत, महमूद खिलजी मुस्लिम ‘उम्माह’ या मुस्लिम भाईचारे को समर्पित रहा और सांगा को उसने जीवनपर्यंत, एक हिंदू शत्रु की तरह ही देखा।
परोपकार के इस हिंदू रोग का अंत केवल महाराणा प्रताप के समय में ही हुआ, जब उन्होंने निर्ममता से अपने शत्रुओं का समूल नाश किया और अपनी स्वयं की मान्यताओं से अधिक मूल्यवान अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता को माना।
महमूद खिलजी की पराजय के मुख्य नायक एक चारण सेनापति हरिदास महियारिया थे जो कि सांगा के परम मित्र भी थे। हरिदास ने ही महमूद को बंदी बना कर सांगा के सम्मुख ला पटका था। सांगा इतने प्रसन्न हुए की उन्होंने हरिदास को चित्तौड़ का दुर्ग ही जागीर में दे दिया। हरिदास ने तब ससम्मान दुर्ग सांगा को लौटाया और बारह गाँवों की जागीर स्वीकार की।
इतना सरल था सांगा का व्यक्तित्व और ऐसी निष्ठा थी उनके मित्रों की।
गुजरात की विजय
गुजरात का नवाब मुजफ्फर खाँ, सांगा का तीसरा प्रमुख शत्रु था, जिसे सांगा ने अपने दक्षिण अभियान में अहमदनगर की विजय के समय पराजित किया था।
मुजफ्फर ने मुबारिज-उल-मुल्क नाम के राज्यपाल को ईडर में नियुक्त किया था। मुबारिज ने सांगा के अपमान हेतु एक कुत्ता पाला, जिसे वह ‘सांगा’ कहकर बुलाता था। सांगा ने 40,000 की सेना लेकर ईडर का नाश किया, पर मुबारिज भाग निकला। मुबारिज की सेना ने अहमदनगर के किले में स्वयं को बंद कर लिया। मुजफ्फर ने मुबारिज की कोई सहायता नहीं की, क्योंकि वह मुबारिज के कृत्य से बहुत अप्रसन्न था।
इस अभियान में एक घटना उल्लेखनीय है। सांगा के एक सेनानायक डूंगर सिंह चौहान, अपने पुत्रों और भ्राताओं समेत इस युद्ध में मेवाड़ की ओर से लड़े और उन्होंने अतुलनीय शौर्य का प्रदर्शन किया। डूंगर सिंह के पुत्रों में से एक, कान्हा ने तो शौर्य की हर सीमा ही लाँघ दी।
मुजफ्फर की सेना ने स्वयं को अहमदनगर किले में भीतर बंद कर लिया था। इस किले के मुख्य दरवाजों पर भालेनुमा कीलें निकले हुए थे। इस कारण उन दरवाजों को हाथी की सहायता से भी तोड़ना संभव नहीं था।
ऐसे में कान्हा सिंह, उन भालों के सामने खड़े हो गए और महावत को स्वयं पर हाथी चढ़ा देने को कहा, कान्हा का शरीर तो उन कीलों से विदीर्ण हो दरवाजों पर टिक गया और उनकी मृत्यु हो गई, किंतु मेवाड़ की सेना ने दुर्ग को जीत लिया। डूंगर सिंह के पारिवारिक वंशज आज भी डूंगरपुर में रहते हैं।
सांगा ने अहमदनगर का खूब बिगाड किया तथा पूरी मुस्लिम सेना को काट डाला। मुबारिज दुर्ग के पीछे से निकल भागने में सफल हुआ
मुजफ्फर ने अब एक लाख सेना व 100 हाथियों की सेना लेकर मलिक अयाज व इमाद-उल-मुल्क नाम के सेनापतियों को मेवाड के विरुद्ध भेजा। मालवा का महमूद भी गुजरात सेना से आ मिला। इस विशाल सेना ने मंदसौर के किले पर घेरा डाल दिया। सांगा ने अशोक मल राजपूत को मंदसौर की सुरक्षा के लिए रखा था। सांगा भी एक लाख से अधिक सेना लेकर मंदसौर के निकट नंदसा गाँव आ पहुँचे। इस युद्ध में सांगा की ओर से सलहदी तँवर मुख्य नायक रहे।
अयाज पराजित होकर गुजरात भाग गया। महमूद ने सांगा से क्षमा माँग अपने पुत्र को छुड़वाया।
सांगा ने अभेद्य रणथंभौर के दुर्ग को भी विजय कर उसका खोया वैभव पुनः लौटाया। इस युद्ध में किलेदार अली की मृत्यु हुई और यवन सेना हार गई।
अतः सांगा के समय में मेवाड़ का राज्य, उत्तर में बयाना के निकट पीलाखल से लेकर दक्षिण में मालवा और गुजरात, सिंधु नदी तक पश्चिम में और पूर्व में अरावली के विस्तार तक फैला हुआ था। सांगा ने अपनी विजय-यात्राओं में दो बार अफगानिस्तान में स्थित गजनी पर भी विजय पाई थी। उन्होंने नागौर के फिरोजशाह पठान को मारकर नागौर को भी विजय किया था।
बहादुर शाह का छल
अपनी पराजय के पश्चात, मुजफ्फर गुजरात में ही रहा और फिर उसने सांगा पर कोई सैन्य कार्यवाही नहीं की। किंतु गुजरात, सांगा के जीवन में कुछ और ही भयावह कथानक रचने वाला था।
मुजफ्फर का दूसरा पुत्र, बहादुर शाह, गुजरात छोड़कर सांगा की शरण में आ गया। किंतु वास्तव में, वह अहमदनगर में सांगा द्वारा उसकी मुसलमान सेना के संहार को लेकर सांगा के विरुद्ध मन में विष पाले बैठा था।
सांगा की माता ने बहादुर शाह को अपने पुत्र की तरह माना और उसे आश्रय दिया। कालांतर में यही बहादुर शाह, गुजरात का राजा बना।
1528 ईसवी में सांगा की हत्या के पश्चात, बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर 1535 ईसवी में आक्रमण कर उसका नाश किया। चित्तौड़ का दूसरा साका जौहर, बहादुर शाह द्वारा किए गए आक्रमण के कारण ही हुआ था।
सांगा की सरलता और विशाल हृदयता ने बहादुर शाह नामक इस्लामी सांप को मेवाड़ में शरण दी और यही भूल मेवाड़ की दुर्दशा का कारण बनी।
एक ओर इस प्रसंग से सांगा और उनकी माता की सरलता का, दूसरी ओर जिहाद की परंपरा में पले-बढ़े बहादुर शाह के संस्कारों का पता चलता है।
अहमदनगर के युद्ध में उसकी सेना के संहार हेतु सांगा से उसका विद्वेष तो किसी सीमा तक उचित भी हो सकता है, किंतु पहले तो अपने ही शत्रु की शरण में जाना, विश्वास प्राप्त करना और फिर उसी परिवार के सर्वनाश का कारण बनना, ये एक बात तो स्पष्ट कर देता है कि जेहादी व्यवस्था में निष्ठा एवं मित्रता के लिए कोई स्थान नहीं है।
केवल इस्लाम की विजय और विस्तार ही सर्वोपरि है।
बहादुर शाह की कथा इन मनोरोगी, दुष्ट जिहादियों के व्यवहार को समझ कर उसे उचित प्रत्युत्तर देने हेतु बतानी आवश्यक है।
बहादुर शाह का एक इस्लामी शिक्षक था, शेख जियु।
बहादुर शाह ने शेख जियु को चित्तौड़ के विनाश की अपनी इच्छा बताई। शेख ने उत्तर दिया, “चित्तौड़ के विनाश के साथ तुम्हारा भी विनाश होगा।”
बहादुर ने प्रत्युत्तर दिया; ‘मुझे कोई चिंता नहीं।’
बहादुर का यह उत्तर, उपयुक्त उदाहरण है जिहादी मानसिकता का। प्रतिशोध व मतिहीन हिंसा के प्रति इतना आकर्षण है कि स्वयं का विनाश भी हो जाए तो भी स्वीकार है। बहादुर, सांगा के पास एक शरणार्थी के रूप में आया और उसे सांगा तथा उनकी माता, झाली रानी ने स्वीकार भी किया।
एक बार सांगा के भतीजे ने बहादुर को रात्रिभोज पर आमंत्रित किया। बहादुर एक नर्तकी पर मोहित हो गया। इस बात को भाँपकर सांगा के भतीजे ने मजाक में कहा “ये नर्तकी अहमदनगर की लूट में प्राप्त हुई थी।”
बहादुर को इतना क्रोध आया कि उसने सांगा के भतीजे को वहीं पर दो टुकड़ों में काट दिया। राजपूत, बदले के लिए बहादुर पर झपटे, किंतु तभी रानी माँ ने कटार निकाल ली और कहा कि ‘यदि मेरे इस पुत्र को कुछ हुआ तो मैं आत्महत्या कर लूँगी।’
हिंदुओं में अति भावुकता का यह रोग शताब्दियों से है। उसके वास्तविक रूप को देखने के पश्चात भी हिंदू राजा और उनका परिवार, बहादुर के सत्य से विमुख होते रहे और फिर जो हुआ, वो सब जानते हैं।
समय आने पर बहादुर शाह ने अपना प्रतिकार लिया और चित्तौड़ के विनाश का कारण बना।
तथाकथित दिल्ली सल्तनत का विध्वंस
अब सांगा की दृष्टि, उत्तर में दिल्ली के लुटेरे सुल्तान पर थी तथा सांगा ने पूरे भारतवर्ष में हिंदू राज्य स्थापित करने का मानस बना लिया था।
मेवाड़ और दिल्ली के मध्य बकरौल और खतौली के युद्ध सांगा और इब्राहिम लोधी के मध्य आमने-सामने हुए थे।
1517 ईसवी में खतौली नामक स्थान पर हुए युद्ध में लोधी की सेना का नरसंहार हुआ एवं उसके पुत्र को बंदी बना लिया गया। खतौली के युद्ध में ही सांगा ने अपना एक हाथ खोया था और उनका एक पैर भी तीर लगने से सदा के लिए विकृत हो गया था।
सांगा, इब्राहिम लोधी के पुत्र को चित्तौड़ ले गए और भारी हर्जाना मिलने के पश्चात् ही उसे छोड़ा।
1518 ईसवी में लोधी ने धौलपुर के निकट बकरौल में सांगा पर पुनः आक्रमण किया। इस बार लोधी और भी बड़ी सेना लेकर आया था, किंतु फिर भी राणा ने उसे पराजित कर दिया। मियाँ माखन के नेतृत्व में लोधी की सेना में 30,000 पैदल सैनिक और 300 हाथी थे, किंतु राजपूतों ने पूरी सेना को समाप्त कर दिया। इस युद्ध में राजपूतों को कई हाथी-घोड़े एवं अन्य संपदा भी प्राप्त हुई।
सांगा अब आगरा के काफी निकट थे और उनके मन में भारतवर्ष के हृदय को म्लेच्छों के हाथों से मुक्त करवाने की तीव्र इच्छा जन्म ले चुकी थी।
इब्राहिम लोधी पर विजय, सांगा के जीवन का शिखर थी। राणा सांगा अब दिल्ली के सिंहासन के अधिकारी के रूप में माने जाने लगे थे और मेवाड़ की राजसी आकांक्षाएँ अब रुकने वाली नहीं थीं। सांगा ने अपनी इस राजलिप्सा को कूटनीतिक और सैन्य बल, दोनों से पूर्ण किया था।
कुछ इतिहासकारों द्वारा एक तथ्यहीन असत्य प्रचारित किया गया है कि बाबर को सांगा ने पत्र लिखकर इब्राहिम लोधी को पराजित करने हेतु आमंत्रित किया। यह बात न केवल अतार्किक, बल्कि हास्यास्पद है। दो बार इब्राहिम लोधी को धूल चटाने वाले सांगा, एक विदेशी विधर्मी को क्यों आमंत्रित करते? हिंदू-मुस्लिम एकता की झूठी पींगें बजाने वाले इतिहासकारों ने इस झूठ का निर्माण मात्र सांगा को एक अंधा विस्तारवादी दिखाने के लिए किया। इस झूठ का प्रचार सांगा की हिंदू साम्राज्य की स्थापना के सपने को मिटाने के लिए भी किया गया। श्री आर.सी. मजूमदार लिखते हैं कि वास्तव में यह पत्र, गुजरात के मुजफ्फर शाह ने सांगा को पराजित करने हेतु बाबर को लिखा था।
डूंगरपुर के महाराजा द्वारा यह पत्रवाहक पकड़कर सांगा के सम्मुख लाया गया। सांगा ने मुजफ्फर शाह को दंडित करने के लिए उससे कुछ धन व कुछ सैनिक ले लिये।
इसके पश्चात् मुजफ्फर की उपेक्षा कर सांगा बयाना की ओर कूच कर गए।
वंश भास्कर में सूरज मल्ल जी लिखते हैं की यह पत्र मुल्तान के दौलत द्वारा लिखा गया था। जो भी हो, यह तो निश्चित है कि सांगा ने बाबर को कोई पत्र नहीं लिखा था।
बाबर से संघर्ष : खानवा का युद्ध
यही वह समय था, जब चुगताई तुर्क बाबर ने भारत की उत्तरी सीमाओं पर उत्पात मचाना आरंभ किया। बाबर ने 1526 ईसवी में निर्बल और पराजित इब्राहिम लोधी को पानीपत के प्रथम युद्ध में पराजित किया था, जहाँ इब्राहिम लोधी की हत्या के बाद उसकी सेना का और बुरा हाल हुआ।
बाबर कट्टर इस्लामी था और अपनी विजय के लिए सदैव अपने खुदा को ही श्रेय देकर अपनी सेना में धार्मिक उन्माद का संचार करता था।
ऐसा कहा जाता है कि 1526 ईसवी में पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोधी को पराजित करने के पश्चात् उसने अपनी सेना से कहा था, “ये मेरी और तुम्हारी नहीं, अल्लाह की विजय है।”
21 फरवरी, 1527 ईसवी को सांगा और बाबर की सेनाओं का सामना राजस्थान के उत्तर-पूर्वी छोर पर स्थित बयाना के दुर्ग में हुआ था। सांगा की लगभग दो लाख योद्धाओं से सुसज्जित सेना ने तुर्क सेना को खदेड़ दिया और बाबर को प्राण बचाकर भागना पड़ा।
बाबर ने अपनी पराजय पर गंभीरता से विचार किया और सांगा को संधि का प्रस्ताव भिजवाया। किंतु सांगा ने प्रथम बातचीत में ही संधि से मना कर दिया। कई इतिहासकार बयाना की विजय के बाद सांगा का बाबर का पीछा कर उसे समाप्त न करना एक बड़ी सामरिक भूल मानते हैं।
इसमें तथ्य भी लगता है।
सांगा के राजपूतों की रक्त पिपासा व शौर्य देखकर मुगल सेना पूरी तरह से निरुत्साहित हो चुकी थी।
बयाना से भागे एक मुगल सेनापति मंसूर बरलास ने बाबर से कहा, “राजपूतों का साहस अतुलनीय है। वे मृत्यु के देवता अजरैल के अवतार हैं। हमारी तरह वे युद्ध से भागते नहीं।”
मुगल सेना के अफगान सैनिक घर लौटने लगे। तुर्क योद्धा बोले कि उस धरती की रक्षा क्यों करें, जिससे हम घृणा करते हैं? उन्होंने बाबर से प्रार्थना की कि काबुल लौट चलने में ही भलाई है।
बाबर स्वयं अपने संस्मरणों में लिखता है, ”मुझे अपने योद्धाओं से एक भी पौरुष का शब्द अथवा वीरता का परामर्श नहीं सुनाई दिया।”
बयाना से खानवा के बीच लगभग एक माह के समय में यदि सांगा, बाबर पर आक्रमण कर देते तो निश्चय ही बाबर के पैर सदैव के लिए भारत भूमि से उखड़ जाते। किंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। सांगा अति आत्मविश्वास से भरे, बाबर के संधि प्रस्ताव को तौलने में लगे रहे।
किसी उर्दू शायर ने इस परिस्थिति पर उचित संज्ञा दी है– ‘लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई है।’
कुछ दिनों के उस विलंब का मूल्य, हिंदू समाज आज तक चुका रहा है। जब सांगा ने बाबर को ‘वार्षिक कर’ देने की शर्त रखी, तब बाबर ने अपनी सेना को इस्लाम धर्म की दुहाई देकर लड़ने हेतु प्रेरित किया। उसने अपनी सेना को इस्लाम की कसमें खिलाकर हिंदू काफिरों की हत्या करने के लिए उकसाया।
जब एक अफगान भविष्यवक्ता, मुहम्मद शरीफ ने पराजय की भविष्यवाणी की, तो भी बाबर ने अपने पैर पीछे नहीं किए।
बाबर ने सभी के सामने शपथ ली कि वह कभी भी मदिरा और परस्त्री को नहीं छुएगा। कभी अपनी दाढ़ी नहीं कटवाएगा और किसी मुसलमान पर कभी कर नहीं लगाएगा। इस तरह उसने अपनी सेना में सम्मिलित इस्लामी तुर्क, उज्बेक, तातार, अफगान और मंगोल योद्धाओं को जिहाद के लिए तैयार कर लिया, जिससे कि वे एक बार फिर हिंदू सेनाओं का सामना कर सकें।
इसी बीच इस्लाम में परिवर्तित एक राजपूत, हसन खाँ मेवाती अपनी दस हजार की सेना के साथ राणा की सहायता को आ मिला। इसके अलावा इब्राहिम लोधी के ही कुछ सहायक भी राणा की सेवा में समर्पित हो गए, इनमें से प्रमुख था मुहम्मद खाँ लोधी।
बाबर के उस प्रेरणास्पद भाषण का उल्लेख उसकी जीवनी ‘बाबरनामा’ में है–
“नायकों, सैनिकों और जो भी इस दुनिया में पैदा हुए हैं, सभी मृत्यु को प्राप्त होंगे। केवल अल्लाह ही अनंतकाल तक रहेंगे। जो भी जीवन रूपी इस भोज में आया है, उसे मृत्यु के घड़े से पानी पीना ही होगा।
लज्जा और पराजय के साथ जीने से अच्छा है, सम्मान के साथ मृत्यु ! यदि मैं भी सम्मान के साथ मरूँगा तो मुझे भी संतोष होगा। इसलिए मेरा नाम रहने दो, क्योंकि मेरा शरीर तो मृत्यु का ही है।
यदि हम विजयी हुए तो हम 'गाजी' कहलाएँगे और यदि मृत्यु को प्राप्त हुए तो शहीदः और दोनों ही तरीके से संपत्ति हमारा इंतजार कर रही है। तो आइए, एक साथ अल्लाह के पवित्र नाम की शपथ लें कि हम में से कोई भी युद्ध में पीठ नहीं दिखाएगा, युद्धभूमि छोड़कर नहीं जाएगा और तब तक विधर्मियों को काटेगा, जब तक कि उसकी आत्मा उसका शरीर नहीं छोड़ देती। ”
बहुत से स्वघोषित उदारवादी व 'चतुर' इतिहासकार, भारत में हुए हिंदू-मुस्लिम संघर्ष को दो विचारधाराओं का टकराव ना मान कर दो राजाओं के बीच का संघर्ष बताते हैं। इन 'विचारकों' के अनुसार, यह केवल दो साम्राज्यवादी राजाओं के बीच का संघर्ष था, जिसका मजहब इत्यादि से कोई लेना-देना नहीं था।
यदि इन उदारवादियों ने बाबर का यह भाषण पढ़ा होता तो कदाचित वे अपनी प्रस्तावना पर लज्जित होते। हिंदू समाज स्वयं को कितनी भी आत्मप्रवंचना में डालें, मुसलमान केवल अपने मजहब के लिए लड़ता है। इस्लामी हत्यारे, केवल इस्लाम के प्रसार व हिंदुओं का धन लूटने भारत आए थे। जितनी शीघ्रता से हिंदू समाज यह बात समझेगा, उतना ही सुरक्षित रहेगा।
अपनी सेना में इस तरह का धार्मिक उन्माद भरकर बाबर ने हिंदू राजाओं में से किसी को रिश्वत देकर अपनी ओर मिलाने की कुत्सित चाल चली। वह इस चाल में सफल भी हुआ, जब रायसेन के सलहदी तँवर ने बाबर से हाथ मिला लिया। सलहदी के मन में सांगा के विरुद्ध द्वेष था, क्योंकि सांगा ने कुछ वर्षों पहले ही उसे पराजित किया था तथा बाबर के साथ कूटनीति में भी सांगा ने सलहदी के परामर्शों की उपेक्षा की थी।
बाबर ने उसे बहलाकर उसके क्रोध का प्रयोग सांगा के विरुद्ध किया। सांगा को तुर्क बाबर की इस कुत्सित प्रकृति के विषय में पता ही था कि वह अब भारत की आत्मा पर चोट करने के लिए अपने धार्मिक उन्माद की सहायता ले रहा है। सांगा ने बाबर के सामने अपूरणीय शर्तें रखकर उसे उलझाए रखा और बाबर की आंतरिक शक्तियों को तौलना जारी रखा।
सांगा बाबर से युद्ध करने का मानस बना चुके थे। बाबर को भी समझ आ गया था कि दो सप्ताह की बातचीत के पश्चात् सांगा उस पर आक्रमण करेंगे।
सांगा ने बाबर को बंदी बना कर दिल्ली का सिंहासन हस्तगत करके, देश को एक ही बार में हिंदू राष्ट्र बनाने का निश्चय कर लिया था।
राणा सांगा द्वारा अपनी सेना को दिए गए भाषण की कुछ पंक्तियाँ निम्नलिखित हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि सांगा, मुसलमानों के आक्रमणों से कितने त्रस्त थे और उन्होंने तुर्कों को सदा के लिए निर्मूल कर देने का प्रण ले लिया था–
“प्रत्येक व्यक्ति को सैन्य नियमों के आधार पर युद्ध करना होगा और याद रखना होगा अपने पूर्वजों की ख्याति, और उनका शौर्य। यह अंतिम अवसर है, जब हमें उन आक्रमणकारियों को खदेड़ देना है, जिन्होंने हमारी पुण्यभूमि को शताब्दियों से केवल लूटा है। हमें बस एक बार इस अवसर को पूर्णरूप से प्रयोग में लेना होगा, इसके बाद वे कदापि हमारी ओर अथवा हमारी भूमि की ओर मुँह भी नहीं करेंगे और हिंदू पद पादशाही का ध्वज पूरे राष्ट्र पर फहराएगा।”
16 मार्च, 1527 ईसवी को आगरा के निकट, खानवा के रणक्षेत्र में प्रात: आठ बजे के आस-पास मेवाड़ की दो लाख और बाबर की लगभग एक लाख की सेना में तुमुल युद्ध आरंभ हुआ।
खानवा का यह युद्ध भारतवर्ष की नियति के सर्वाधिक निर्णायक युद्धों में से एक माना जाता है। यहाँ सांगा और उनकी सेना का मुगलों की प्राणघातक तोपों और आग्नेयास्त्रों से पहली बार सामना हुआ।
राजपूतों को बारूद के इस घातक परिणाम का कोई पूर्वानुमान नहीं था और उनकी अग्रिम पंक्तियों में भगदड़ मच गई।
सांगा के हजारों सैनिक मारे गए और उनके घोड़े तथा हाथी अपनी ही सेना को रौंदते हुए पीछे की ओर दौड़ पड़े।
कुछ क्षणों के लिए हिंदू योद्धा किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए।
तब राजपूतों ने इन तोपों का उत्तर देने के लिए एक अद्भुत युक्ति निकाली।
आत्मबलिदान का सर्वोच्च प्रदर्शन करते हुए राजपूत सैनिकों ने आगे बढ़-बढ़कर इन तोपों में अपने सिर फँसा दिए और उनके रक्त-मांस से वे तोपें व्यर्थ होती चली गई। सांगा की सेना द्वारा यह साहसिक कृत्य होते देख मुगल भौंचक्के रह गए और अब मेवाड़ की सेना मुगलों पर हावी हो गई।
मुस्लिम आक्रांताओं ने एक और षड्यंत्र के अंतर्गत, कुछ दर्जन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारियों को छिपाकर शत्रु राजा को खोजने और उस पर तीरों की वर्षा करने में लगा दिया।
ये इस्लामी तीरंदाज कभी भी हिंदू योद्धाओं के सामने नहीं आते थे, वे हमेशा अपने नायकों और सेनाओं की भीड़ के पीछे छुपे रहकर सतत हिंदू नेतृत्व पर प्रहार करते रहते थे। दूसरी ओर हिंदू राजा, हरावल दस्ते में रहकर युद्ध में आगे जाते थे और अपने साहस और शौर्य का परिचय देते थे।
हाथी पर बैठकर सेना के अग्र भाग में हिंदू राजा बहुत सरलता से चिह्नित भी हो जाते थे। इसके विपरीत मुसलमान राजा सदैव सेना के पीछे छुप कर रहते थे तथा युद्ध का संचालन करते थे।
हिंदू राजाओं की इस अदूरदर्शी प्रवृत्ति के कारण भारत के इतिहास में बहुत से जीते हुए युद्धों में हिंदुओं को अनावश्यक पराजय मिली। बाबर ने भी सांगा को पहचान कर उन पर तीरों की वर्षा करने के लिए अपने कुशलतम धनुर्धारियों को भेजा, जिन्होंने केवल सांगा को ही लक्ष्य बनाकर उन पर अनवरत तीरों की वर्षा कर दी।
इस भीषण बाण वर्षा में एक तीर सांगा के मस्तक में लगा और वे मूच्छित हो गए। कुछ संस्मरणों में सांगा का बंदूक की गोली से घायल होना भी लिखा गया है। यह घटना युद्ध के मध्य काल में ही घट गई थी। लगभग एक घंटे के लिए युद्ध थम गया। बाबर लिखता है, “श्रापित काफिर एक घंटे तक भ्रम में पड़े रहे।” सांगा के सहयोगी सेनानायक उन्हें रणक्षेत्र से दूर ले गए। ठिकाना बड़ी सादड़ी के झाला अज्जा, जो कद-काठी में सांगा के समान ही थे, राजसी वस्त्रादि, राजचिह्न पहनकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए आगे आ गए। इस कृत्य से मेवाड़ की सेना का मनोबल बना रहा और उन्होंने तुर्कों को मारना आरंभ कर दिया। एक बार पुनः हताश राजपूत सेना में प्राण आ गए।
ऐसी विकट स्थिति में टॉड व श्यामल दासजी, राजेंद्र शंकर भट्ट आदि अधिकतर इतिहासकारों का मानना है कि रायसेन का सलहदी तँवर अपने पैंतीस हजार अश्वारोहियों के साथ बाबर की सेना से जा मिला।
सांगा के सरदारों ने फिर भी एकत्र होकर इस विश्वासघात का प्रत्युत्तर देने हेतु पुनः आक्रमण किया, किंतु एक-एक करके वे सब भी वीरगति को प्राप्त हुए। संध्याकाल होने तक मेवाड़ की सेना का प्रत्येक श्रेणी का नायक, धर्म रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर कर चुका था। माणकचंद चौहान, रावल उदय सिंह, रावत रतन सिंह चूँडावत, झाला अज्जा, रामदास सोनगरा, गोकुलदास परमार, रायमल राठौड़, खेत सिंह, हसन खाँ मेवाती व मोहम्मद खाँ लोधी आदि सेनानायक वीरगति को प्राप्त हुए। दोनों ओर की सेना का भयंकर नाश हुआ, यद्यपि मुगलों द्वारा तोपों व बंदूकों के उपयोग के कारण हिंदू सैनिक अधिक संख्या में हताहत हुए थे।
खानवा का भीषण युद्ध होते हुए बारह घंटे हो चले थे तथा अँधेरा छा गया था। अधिकांश हिंदू सैनिक या तो वीरगति को प्राप्त हो चुके थे अथवा सेनानायक की अनुपस्थिति में किंकर्तव्यविमूढ़ होकर इधर-उधर बिखर गए थे।
दिल्ली, आगरा, बयाना और अलवर की ओर जाने वाले रास्तों पर दोनों ही ओर के सैनिकों के कटे अंगों के अवशेष और निर्जीव शरीर यत्र-तत्र बिखरे पड़े थे। यदि हिंदू सेना की भयंकर क्षति हुई थी तो मुसलमानों की सेना को भी उतनी ही हानि उठानी पड़ी थी। बची हुई हिंदू सेना में सांगा को जीवित पाकर हर्ष की लहर दौड़ गई तथा सांगा की जय-जयकार हुई। बची-खुची मुगल सेना, राजपूतों के प्रतिघात के भय से युद्ध के मैदान में ही पड़ी रही।
कुछ ही दूरी पर हिंदू सेना का डेरा होने के उपरांत भी मुगलों की बची-खुची सेना का साहस नहीं हुआ कि सांगा के डेरों पर अंतिम हमला कर सके। जोधपुर के राव गाँगा, चंदेरी के मेदिनी राय तथा आमेर के महाराज पृथ्वीराज कच्छावा ने सांगा की रक्षा की।
खानवा के युद्ध को बाबर ने अपने संस्मरणों में इस्लाम की जीत पर यूँ लिखा है “इस्लाम के प्रसार के लिए, मैं भटकता फिरा, काफिरों और हिंदुओं से मैंने युद्ध किया, मैं शहीद होने निकला था, अल्लाह का शुक्र, उसने मुझे गाजी बना दिया।”
अब विवेचनीय बात यह है कि अब तक के समस्त प्रचलित इतिहास में खानवा को सांगा की पराजय व बाबर की विजय बताया गया है।
सब तथ्यों के निष्पक्ष आकलन के बाद लेखक का मत है कि खानवा में सांगा हारे नहीं थे। हम खानवा के भीषण युद्ध के तथ्यों का पुनरावलोकन करते हैं।
1. यदि खानवा हिंदुओं की पराजय पर समाप्त हुआ तो बाबर ने सांगा की हत्या क्यों नहीं की ? बाबर का नियम था, अपने शत्रुओं की पराजय के बाद निमर्म हत्या व शत्रु सेना के कटे मुंडों की मीनारें बनाना। हमें पानीपत के प्रथम युद्ध के बाद यही व्यवहार देखने को मिलता है, तो खानवा के बाद क्यों नहीं?
2. सांगा की मूर्च्छा के समय वे वहीं आसपास ही ले जाए गए थे। यदि हिंदू सेना खानवा में हारी थी, तो मुसलमान सेना ने कुछ दूरी तक भी सांगा का पीछा करके उन्हें समाप्त क्यों नहीं किया? ऐसा कैसे संभव हुआ कि बाबर और उसकी हत्यारी सेना बयाना से दक्षिण की ओर कभी नहीं आती है और मेवाड़ का एक इंच भी बाबर नहीं जीतता है
बाबर स्वयं लिखता है, “काफिरों के डेरे की तरफ दो मील जाने के बाद मैं पलट गया। रात होने चली थी, तथा नमाज का समय हो चुका था।”
3. कम-से-कम तीन लिखित स्रोतों में खानवा को सांगा की विजय बताया गया है।
रणछोड़ भट्ट तैलंग द्वारा लिखित ‘अमरकाव्यम्’ व चित्तौड़ के इतिहासकारों द्वारा लिखा ‘चित्तौड़ पाटनामा’ में बाबर व सांगा के बीच खानवा, के बाद संधि के लिए मिलना भी वर्णित है। इसी प्रकार सूरज मल्ल मीसण द्वारा रचित, ‘वंश भास्कर’ में भी सांगा की जीत का उल्लेख मिलता है। (खंड 4, पृष्ठ 2934) और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि खानवा के बाद सांगा लगभग एक वर्ष तक जीवित रहते हैं तथा उसी भूभाग में अपनी सेना के साथ रहते हैं, पर बाबर उनकी हत्या नहीं कर पाता।
4. यदि इस बात को दूसरी तरफ से देखें कि खानवा को बाबर की विजय किस आधार पर बताया जाता है? लगभग सभी इतिहासकार बाबर के ही लिखे ‘बाबरनामा’ को अपना मूल स्रोत बताते हैं। ‘बाबरनामा’ में भी खानवा को प्रत्यक्ष मुगल विजय नहीं बताया गया है, बल्कि उसमें बाबर के एक सेनापति शेख जाइन द्वारा लिखे अतिशयोक्तियों से भरे एक पत्र 'फतेहनामा' में खानवा को विजय बताया है।
इतिहास लेखन का मौलिक सिद्धांत है कि किसी पक्ष की विजय का दावा उसके कहने से नहीं स्वीकार किया जाता। निष्पक्ष या विरोधी पक्ष के अनुमोदन के बाद ही कोई निर्णय सिद्ध माना जाता है। खानवा के विषय में इस सरल से नियम की अनदेखी क्यों की गई ?
जिस प्रकार 'बाबरनामा' में सांगा के पत्र की बात सर्वथा असत्य प्रचार थी, क्या बाबर का स्वयं को खानवा का गाजी बताना असत्य नहीं हो सकता ? झूठ बोलना व प्रचारित करना इन लुटेरों का स्वभाव था। किस आधार पर खानवा जितने महत्त्वपूर्ण विषय पर एक मतांध हत्यारे के लिखे विवरणों को ब्रह्म वाक्यों के सत्य के समान स्वीकार किया गया? क्यों इस युद्ध की कोई तथ्यात्मक विवेचना नहीं की गई ?
आशा ही कर सकते हैं कि खानवा के आस-पास खुदाई और अन्वेषण करके खानवा के सत्य को स्थापित किया जाएगा।
5. कुछ इतिहासकारों ने बाबर की सेना का पड़ाव वर्तमान के फतेहपुर सीकरी के जलस्रोत के पास बताया है। उनके अनुसार, सांगा तथा उनकी सेना को जानेवाले जल में विष मिलाया गया।
इन सब तथ्यों का गहन अन्वेषण होकर खानवा का सत्य जगजाहिर करना ही चाहिए।
इस युद्ध के विवरण में कपट की स्पष्ट दुर्गंध आ रही है।
बाबर की बयाना की पराजय एक झटका थी, तो सांगा की पराजय, निर्णायक क्यों कही गई ?
6. खानवा के तुरंत बाद बाबर अपने पुत्र हुमायूँ को काबुल भेज देता है। यदि बाबर खानवा जीत गया था, तो हुमायूँ को उत्तर भारत में किसी स्थान का सूबेदार बनाता, काबुल क्यों भेजता यदि उसे हूमायूँ के वध का भय नहीं था?
7. बाबर सांगा की मृत्यु पर एक शब्द भी अपनी जीवनी में नहीं लिखता। एक वर्ष तक सांगा खानवा के आस-पास ही रहे और बाबर ने हमायूँ को भारत से दूर भेज दिया तथा सांगा की मृत्यु पर वह चुप्पी रखता है, यह बात समझ से परे है।
8. खानवा जयपुर से 200 किलोमीटर की दूरी पर है। लेखक ने स्वयं वहाँ जाकर युद्ध स्थल को देखा है। खानवा में गत राजस्थान सरकार द्वारा एक बहुत ही सुंदर व भव्य युद्ध स्मारक बनाया गया है। प्रत्येक हिंदू को एक तीर्थ स्थल की भाँति इसका दर्शन करना चाहिए। पर मुख्य बात यह है कि खानवा के युद्ध क्षेत्र में कम-से-कम एक दर्जन हिंदू स्थापत्य शैली की छतरियाँ आज भी खड़ी हैं। साथ ही एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर भी युद्ध स्थल के बीच खड़ा है। मध्य काल में राजस्थान के बलिदानी वीरों की स्मृति में छतरियाँ बनाई जाती थीं। यदि सांगा खानवा हारे थे तो ये हिंदू छतरियाँ किसने बनाईं ? इतनी विशाल छतरियों को बनाने में कम-से-कम छह माह का समय तो लगा होगा। इन छतरियों का वहाँ होना स्पष्ट प्रमाण है कि यह क्षेत्र सांगा के अधीन ही था। परम विस्मय की बात है कि क्या किसी वामी-प्रगतिशील इतिहासकार ने खानवा के युद्ध क्षेत्र का कभी निरीक्षण नहीं किया है?
कैसे ये लोग इतने प्रगत सत्य को भी निगल जाते हैं !!
युद्ध से निकाले गए सांगा को जैसे ही होश आया, उन्होंने अपने नायकों पर स्वयं को रणक्षेत्र से हटाने के लिए बहुत क्रोध किया। उन्हें ज्ञात हुआ कि मेवाड की सेना का बहुत बड़ा भाग वीरगति प्राप्त कर चुका है। यह जानकर भी सांगा रुके नहीं। उन्होंने अपने सरदारों से कहा कि वे विधर्मी बाबर को पराजित किए बिना चित्तौड नहीं जाएँगे।
अचेत सांगा को युद्धभूमि से उठाकर लाने वालों में आमेर के राजा पृथ्वीराज कच्छावा के अतिरिक्त मारवाड़ और सिरोही के राजा शामिल थे। सांगा ने रणथंभौर में अपना शिविर लगाया और वहीं से सेनाओं को पुनः एकत्र करके बाबर पर अंतिम व निर्णायक आक्रमण करने की योजना बनाने लगे। दुर्भाग्य से सांगा के परम मित्र व जयपुर के अति दूरदर्शी राजा, पृथ्वीराज कच्छावा का निधन खानवा युद्ध के कुछ माह बाद ही हो गया।
अब यह बात प्रचारित की गई कि सांगा की बाबर से पुनः युद्ध करने की बात सुनकर मेवाड़ के ही कुछ दुष्ट सामंतों ने ही सांगा को विष दे दिया। तर्कनिष्ठा से यह बात कदापि संभव नहीं लगती। जो सामंत गत बीस वर्षों से सांगा के साथ सौ से अधिक युद्धों में लड़ते आए थे, वे अचानक ही सांगा को विष क्यों दे देंगे ?
शत्रुओं को विष देना मुसलमान आक्रांताओं का पुराना हथियार था तथा इस बात की अधिक संभावना है कि सांगा की बाबर के साथ 1527-28 के बीच संधि की बैठकें हुईं, उनमें से किसी में सांगा को प्रत्यक्ष रूप में या किसी सामंत को कोई लोभ देकर बाबर द्वारा ही सांगा को विष दिया गया। इस पूरे प्रकरण पर अधिक शोध व अन्वेषण की आवश्यकता है, क्योंकि खानवा का युद्ध भारत के इतिहास के सर्वाधिक निर्णायक युद्धों में से एक है।
बहुत अधिक संभावना यही है कि या तो खानवा में सांगा विजयी रहे थे या खानवा अनिर्णीत समाप्त हुआ। यदि बयाना की हिंदू विजय अंतिम नहीं थी तो खानवा की लड़ाई अंतिम क्यों मानी जाए? सांगा व बाबर के बीच पूरे एक वर्ष संघर्ष चला, जो कि 30 जनवरी, 1528 के दिन, पैंतालीस वर्ष की अल्पायु में महाराणा सांगा को विष देकर उनकी हत्या पर समाप्त हुआ।
सांगा की मृत्यु के स्थान पर भी इतिहासकार एकमत नहीं हैं, कुछ उनकी मृत्यु उत्तर भारत में कालपी में बताते हैं, कुछ चित्तौड़ में। बसवा में बनी उनकी समाधि से लगता है कि कालपी ही उस महापुरुष का मृत्युस्थल रहा होगा।
इस प्रकार से भारतभूमि के एक अत्यंत साहसी व दूरदर्शी हिंदू राजा के जीवन का अंत शत्रु द्वारा धोखे से हुआ। एक राजा, जिसने विरक्त होकर वीरता के साथ सभी परिस्थितियों का सामना किया, वह महापुरुष केवल विश्वासघात से ही मारा जा सकता था, क्योंकि मृत्यु भी प्रत्यक्ष उनके सामने आने में घबराती थी।
सांगा की हत्या के साथ ही राजपतों का समुचे भारतवर्ष पर राज करने का स्वप्न धूमिल हो गया। इससे भी भयानक परिणाम यह हुआ कि बाबर को भारत में पैर जमाने का अवसर मिल गया। बाबर के ही एक सेनापति मीर बाकी ने हिंदुओं की श्रद्धा के सबसे पवित्र केंद्र अयोध्या के राम मंदिर को नष्ट कर उस पर बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया, जो पाँच सौ वर्षों के अनवरत हिंसक संघर्ष व लाखों हिंदुओं व सिखों की वीरगति के पश्चात् मुक्त करवाया जा सका।
इन 500 वर्षों में अधिकांश समय ऐसा था जब दूर-दूर तक कोई आशा भी न थी कि रामजन्मभूमि को हिंदू पुनः प्राप्त भी कर सकेंगे। रामजन्मभूमि पर इतना एकतरफा और बर्बर कब्जा था कि किसी भी प्रकार की आशा लगाना हास्यास्पद और कल्पना के विपरीत था।
न सिर्फ विदेशी आक्रांता, बल्कि तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात भारत का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व व भारत के शीर्ष इतिहासविद् भी इस हिंदू मान्यता के विपरीत थे कि भगवान् राम का जन्म इसी पवित्र भूमि पर हुआ था।
किंतु यह कैसा आग्रह था ? ये कैसी हठधर्मिता थी हिंदुओं व सिखों की ? यह कैसा अनोखा संकल्प था कि चारों ओर से विकराल आँधियों में घिरे होने के उपरांत भी हिंदू हृदय में इस राम मंदिर के नन्हे से दीए की लौ टिमटिमाती रही ?
वर्षों पहले मैं अपने बड़े भ्राता श्री आर.पी. सिंह के साथ कैंटोनमेंट एरिया में गया था। एक अधेड़ सैनिक ने मेरे बड़े भ्राता, जो कि उस समय मेजर थे, को देखकर छाती निकालकर 'राम राम' कहा।
मैं आश्चर्य और आनंद से स्तब्ध खड़ा रह गया और मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर भी मिल गया।
सेना के सब अफसर, इनकी स्त्रियाँ, इनके बच्चे यद्यपि आपस में अंग्रेजी में ही बात करते हैं, किंतु साधारण सैनिकों ने राम का नाम आग्रहपूर्वक जीवित रखा हुआ है और यहीं से स्पष्ट हो जाता है कि जब विधर्मी दरिंदों ने हमारे आराध्य, भगवान् राम का मंदिर नष्ट कर दिया, श्री राम की जन्मभूमि हम से हथिया ली, तो हिंदुओं ने राम को दैनंदिन जीवन में उतार लिया।
जो रामजन्मभूमि और मंदिर रूप में हमसे छिन गए, उसे तत्त्व बनाकर हमने अपनी आत्मा में प्रवाहित कर लिया।
जन्म के समय के मंगल गीत से लेकर, विवाह संस्कार व चिता की अग्नि में शरीर के समर्पण तक राम-नाम का सत्य ही हिंदुओं का उद्घोष बन गया। संसार का कोई आक्रमण हृदय में बैठे राम को नहीं मिटा सकता था और इस तथ्य का उपयोग हमारे पुरखों ने धर्म की रक्षा हेतु किया।
इस्लामी आक्रांताओं ने भारतीय उपमहाद्वीप में हजारों मंदिरों को धूल-धूसरित कर उन पर मस्जिदें खड़ी कीं। पर हमारे ऋषियों, मठाधीशों व गुरुओं ने तीन पवित्रतम स्थानों पर काल की धूल नहीं जमने दी। वे हैं शिव की काशी, मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि व रामजन्मभूमि।
हिंदुओं के लिए ये तीन स्थान कभी महज भूखंड नहीं, बल्कि सनातन हिंदू धर्म के मर्मस्थल रहे हैं। हिंदू मानस सब आक्रमण सहकर भी इन भूखंडों पर समझौते को कभी राजी नहीं हुआ।
रामजन्मभूमि, राम का जन्म स्थान होने के अतिरिक्त सामूहिक हिंदू स्मृति व चेतना में एक पवित्रतम स्थान है, जो कभी मरा नहीं और आज जिसने दर्शा दिया कि वह कभी मिटाया नहीं जा सकता।
हमें मूर्तिपूजक कहकर हमारा उपहास करने वाले मतांधों को भी हिंदुओं ने दिखा दिया कि हम उस रिक्त स्थान के लिए भी कट-मर सकते हैं।
वह रिक्त स्थान, हर हिंदू हृदय में एक विशेष कोना बन गया।
रामजन्मभूमि का मुकदमा कदाचित् इतिहास में सबसे दीर्घकालीन मामलों में से एक होगा। लाखों हिंदुओं व निहंग सिखों के बलिदान पर रामजन्मभूमि की मुक्ति आंदोलन चलता रहा। गोस्वामी तुलसीदासजी तथा अन्य संतों ने राम नाम की अकंप ज्योति समाज में प्रज्वलित रखी।
किसी जाति, संप्रदाय, पंथ का संज्ञान लिये बिना, हर हिंदू ने श्रीरामजन्मभूमि को विस्मृत नहीं होने दिया। वे सब जानते थे कि राम नाम से ही हिंदू धर्म जीवित है। राम गए कि धर्म गया।
6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई। सन् 2020 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदुओं के पक्ष में निर्णय भी सुना दिया।
जिस दिन अयोध्या में भगवान् श्रीराम के भव्य मंदिर का द्वार खुलेगा, उस दिन यह विश्व केवल ईंट-पत्थर के किसी निर्माण का साक्षी नहीं होगा, बल्कि यह विश्व साक्षी होगा हिंदुओं के उस अखंड संकल्प का, जिसे संसार की सबसे क्रूर और हिंसक विचारधारा नहीं झुका सकी।
सब देखेंगे कि खोए हुए इतिहास को पुनः अर्जित किया जा सकता है।
सांगा व उनके राजपूतों तथा हिंदू सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया।
रामजन्मभूमि पर मंदिर, खानवा के घावों का सबसे शीतल लेप है।
सांगा की पवित्र स्मृति को इससे अधिक मूल्यवान और क्या श्रद्धांजलि हो सकती थी?
खानवा भले ही अनिर्णीत समाप्त हुआ था, किंतु हिंदुओं की हठ व संकल्प से बाबर निर्णायक रूप से पराजित हुआ।
युद्ध की ओर पुनः चलते हैं।
हिंदू सेना से संख्या में आधी मुस्लिम सेना के समक्ष खानवा का युद्ध अनिर्णीत समाप्त होने के कारणों का यदि विश्लेषण किया जाए, तो इससे हमें हिंदुओं की सैन्य तैयारी के अभाव के अतिरिक्त, इस्लामी आक्रांताओं का युद्ध-कौशल व धार्मिक मान्यताओं के मुसलमानों द्वारा उपयोग के विषय में बहुत कुछ पता चलता है–
1. हिंदू सेना, विभिन्न राजाओं और सरदारों की एक मिली-जुली सेना थी, जो एक बाहरी आक्रमण के विरुद्ध सांगा के नेतृत्व में एकत्र हुई थी। उन लोगों ने साथ में कभी युद्ध नहीं किया था, इसलिए उनमें नेतृत्व की स्थिति भी स्पष्ट नहीं थी और खानवा के युद्ध में हिंदू सेना में उपजा विभ्रम कुछ सीमा तक इसी का परिणाम था।
2. मुगल तोपें हिंदुओं के लिए साक्षात् काल बनकर आईं और उनकी मारक क्षमता से हिंदू अनभिज्ञ थे और सैन्य साधनों की इस कमी के कारण हिंदुओं को बड़ा मूल्य चुकाना पड़ा।
3. तुर्क बड़ी ही प्रभावी युद्ध नीतियाँ लेकर आए थे, जिनके नाम ‘तुलगुमा’ व ‘अराबा’ थे।
ये युद्ध नीतियाँ बाबर ने ही सर्वप्रथम अपनाई थीं। ‘तुलगुमा’ का अर्थ है– पूरी सेना को छोटी-छोटी टुकड़ियों में बाँटना, अर्थात् दाईं बाईं और मध्य की इकाई। दाईं और बाईं इकाई के क्रमशः अग्र और पृष्ठ भाग भी होते थे। इस छोटी सी सेना के माध्यम से शत्रु सेना को तुरंत ही चारों ओर से घेरा जा सकता था, क्योंकि ये टुकड़ियाँ सरलता से आगे-पीछे हो सकती थीं।
मध्य-अग्र भाग की सेना के पास अराबा, यानी बैलगाड़ियाँ होती थीं, जिन्हें शत्रु की ओर मुँह करके खड़ा किया जाता था और आपस में रस्सियों से बाँधकर रखा जाता था। इन बैलगाड़ियों के पीछे तोपें रखी जाती थीं और इन्हें छुपाने के लिए परदों से ढका जाता था। इन दो युक्तियों से बाबर का तोपखाना और भी घातक हो गया था। बंदूकें और तोपें बिना डर के चलाई जा सकती थीं, क्योंकि उन्हें आड़ मिली थी उन बैलगाड़ियों की, जिन्हें एक साथ बाँधकर स्थिर रखा गया था।
क्योंकि हिंदू बैलों को पवित्र मानते हैं, अतः मुस्लिम योद्धा उनके पीछे सुरक्षित थे। इसके अतिरिक्त इन भारी तोपों की नलियाँ एक साथ पलटी जा सकती थीं। आग्नेयास्त्रों और तोपों के इतने सुनियोजित उपयोग का अर्थ था– हिंदुओं की असंगठित सेना के लिए भारी नुकसान।
4. सलहदी तँवर के विश्वासघात को कुछ लोग नहीं मानते हैं और इसका खंडन करते हैं। यद्यपि कुछ विश्वसनीय ऐतिहासिक सूत्रों से सलहदी के इस कृत्य का पता चलता है। सलहदी के इस विश्वासघात का लिखित प्रमाण हो, इस हेतु इस कृत्य को पुस्तक में स्थान दिया गया है।
इससे किसी का अपमान करने का कोई मंतव्य नहीं है। खानवा का युद्ध उपमहाद्वीप में हिंदू-मुस्लिम संघर्ष का एक बहुत महत्त्वपूर्ण बिंदु था, और यदि हम यहाँ सत्य नहीं लिखेंगे तो हमारी ही हानि होगी। यद्यपि तँवर कुल का यह लाँछन एक पीढ़ी बाद ही पोंछ दिया गया, जब ग्वालियर के रामशाह तँवर अपने परिवार के साथ सांगा के पुत्र उदय सिंह से जा मिले और प्रताप के काल में मेवाड़ की सेना के सेनापति बने। हल्दी घाटी के युद्ध में तैवरों के इस कुल के शौर्य की रोमांचक गाथा हम जानेंगे।
5. हिंदू सेना द्वारा उस शत्रु के प्रति भी मानवीय व्यवहार रखा गया, जो कि सत्ता व लूट के आगे मानवीय मूल्यों में बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते थे। जो केवल अपने मजहब के लिए ही अंधे होकर लड़ रहे थे। सांगा बयाना के युद्ध के समय ही बाबर का पीछा करके उसे समाप्त कर सकते थे, किंतु शायद हिंदुओं की उदारता और मर्यादा-बोध के कारण अथवा सुनियोजित सोच के चलते बाबर को उन्होंने जाने दिया।
उस भूल का मूल्य हिंदुओं को खानवा के युद्ध में चुकाना पड़ा।
आत्मबल व संख्याबल के आधार पर खानवा हिंदुओं को जीतना चाहिए था, पर नियति को कुछ और स्वीकार था। काली का खप्पर अभी और हिंदुओं का रक्तपान करने को प्यासा था। अनिर्णीत खानवा के बाद बाबर की अधिकांश तोपें और आग्नेयास्त्र नष्ट हो चुके थे। उसकी सेना का बहुत बड़ा भाग समाप्त हो गया था। बाबर, हिंदू सेनाओं को अपने स्वामी और मातृभूमि हेतु साहस और शौर्य का प्रदर्शन करते देख चुका था, अतः उसके बाद बाबर ने सांगा का पीछा नहीं किया। बाबर में इतना साहस ही नहीं हुआ कि मेवाड़ की ओर मुँह भी करे। अपनी थकी हुई सेना लेकर बाबर पूर्व की ओर बढ़ा और उसने अवध तथा बंगाल की बहुत दुर्दशा की।
सांगा ने छापामार युद्ध कर बाबर को लगभग एक वर्ष तक आतंकित करके रखा। ‘बाबरनामा’ में बाबर स्वयं लिखता है कि दिल्ली से आगरा के बीच राजपूत कब उस पर हमला कर दें, उसे पता नहीं होता था। सांगा की हत्या के बाद ही बाबर ने चैन की साँस ली। सौभाग्य से खानवा के तीन वर्ष बाद ही, 27 दिसंबर, 1530 ईसवी में बाबर भी मर गया तथा हिंदुओं का बहुत बड़ा द्रोही, सांगा की हत्या का कोई लाभ नहीं उठा सका। ऐसी किंवदंती है कि बाबर को इब्राहिम लोधी की माँ ने विष देकर मरवाया था।
सांगा की हत्या मेवाड़ ही नहीं, वरन् पूरी राजपूत राज्याभिलाषा का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। सांगा की हत्या के परिणाम कई अर्थों में तराई के दूसरे युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान की हत्या से भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण रहे–
1. सांगा की हत्या के साथ राजपूत संगठन छिन्न-भिन्न हो गया तथा फिर कभी राजपूत इस तरह संगठित नहीं हो पाए। न तो सांगा जैसा कोई सशक्त नायक हुआ और न ही मेवाड़ राजपूत एकता की धुरी बन सका।
2. बाबर ने सांगा की हत्या कर इस्लामी राज्य की स्थापना कर दी तथा पहली बार इस्लामी आक्रांताओं ने भारतवर्ष की छाती में पैर गड़ा दिए। अगले 150 वर्षों तक हिंदू समाज इन मुगल हत्यारों के दंश झेलता रहा।
3. सांगा के बाद इस्लामी आक्रमण के विरुद्ध सर्वाधिक बलशाली प्रतिरोध का केंद्र मेवाड़ अप्रत्याशित रूप से निर्बल व दिशाहीन हो गया तथा मेवाड़ के राजपरिवार में ही गृहयुद्ध छिड़ गया।
4. खानवा के युद्ध के कुछ माह बाद ही जयपुर के पृथ्वीराज कच्छावा के देहांत के बाद नेतृत्वहीन राजपूतों पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। गुजरात के बहादुर शाह के आक्रमण के चलते 1535 ईसवी में दूसरा ‘जौहर’ हुआ, जिसमें सांगा की पत्नी रानी कर्णावती के साथ 13,000 स्त्रियों ने जौहर किया तथा मेवाड़ के 32,000 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए।
5. सांगा के बाद इस्लामी आक्रांताओं ने बाबर की चाल का उपयोग कर हिंदू राजाओं की निष्ठाओं को आपस में लड़ाकर भारतवर्ष में अपना प्रभुत्व फैलाने में सफलता पाई। इससे पूर्व अधिकतर संघर्षों में हिंदुओं ने मुसलमानों को सीधी टक्कर दी थी।
महाराणा सांगा की केवल एक आँख थी। उनका केवल एक हाथ और एक पैर ही काम करता था। उनके शरीर पर कुल चौरासी घाव थे, किंतु उनके प्राणों के संकल्प व जिजीविषा पर कभी उनकी शारीरिक विकलांगता हावी नहीं हुई।
उन्होंने कभी अपनी अक्षमताओं का प्रभाव मन पर नहीं पड़ने दिया।
यह सच में असाधारण ही है कि एक राजा, जिसका शरीर इस खंडित दशा में हो, फिर भी वह अपनी सेना में ऐसा आत्मविश्वास भर दे कि वह उसके पीछे चलते हुए रणक्षेत्र में विजय अथवा वीरगति का पथ चुने ! हम कल्पना भी नहीं कर सकते, कि एक ऐसा राजा, जो एक पैर से लँगड़ाकर चलता हो और उसे घोड़े पर चढ़ने के लिए भी किसी की सहायता लेनी पड़े, अपनी एक आँख से देखते हुए अपनी सेना का मार्गदर्शन करते हुए उसके साथ अफगानिस्तान, बंगाल, महाराष्ट्र और दिल्ली की विजय यात्राएँ करे।
स्वयं पर संशय किए बिना, अपनी शारीरिक अवस्था और अक्षमता पर दीनता अनुभव किए बिना, उन्होंने अपने सरदारों और सेना में इतना आत्मविश्वास जगाया कि अकेले ही मध्ययुगीन भारत का सबसे बड़ा हिंदू राज्य स्थापित कर लिया। मृत्यु तो शाश्वत है, किंतु अपने सांसारिक शरीर को छोड़ने से पूर्व सांगा ने अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए बुद्धिमत्ता, शौर्य और सर्वोच्च बलिदान की भावना का अप्रतिम उदाहरण खड़ा किया।
एक ऐसी पीढ़ी, जिसने महाराणा प्रताप जैसे वीर राजा को तुर्क आक्रांताओं से तब भी अकेले लड़ते देखा, जब सब आशा ही समाप्त हो चुकी थी। सांगा ने मेवाड़ के योद्धाओं को सिखाया कि इस्लाम के साथ उनका यह संघर्ष अस्तित्व का है, जिससे पीछे हटना असंभव है, क्योंकि बाप्पा रावल के समय से ही इस्लामी आक्रांताओं द्वारा हिंदुस्तान पर सतत आक्रमण हो रहे थे और ये लोग एक या दो युद्ध से मानने वाले नहीं थे।
यह एक अंतहीन संघर्ष होने वाला था, जब तक कि दोनों में से एक पूर्णतया नष्ट नहीं हो जाता। सांगा इसलिए बाबर का बीजनाश करने मेवाड़ से निकले थे। सांगा ने केवल मेवाड़ के महाराणाओं की परंपरा को ही नहीं निभाया, वरन् साहस और दृढ़ निश्चय के नए मापदंड भी स्थापित किए। उन्हीं मापदंडों से प्रेरणा लेकर मेवाड़ का राजपरिवार कभी भी तुर्कों के अधीन नहीं रहा और सदैव ‘हिंदुआ सूरज’ का ध्वज धारण करके शताब्दियों तक हिंदू धर्म का सर्वोच्च संरक्षक और प्रतिपालक बना रहा।