(1326-1364 ईसवी)
इन महान महाराणा की जीवन-कथा, मेवाड़ के सिसोदिया वंश के महाराणाओं के जीवन और मेवाड़ पर आधिपत्य हेतु उनके संघर्षों के युग तथा उस काल के विचित्र घटनाक्रम का सबसे ज्वलंत उदाहरण है। मानव इतिहास का यह घटनाक्रम अध्ययन करने योग्य है, क्योंकि इसमें बहुत मूल्यवान उपदेश निहित हैं, जो समकालीन सामाजिक जीवन में काम आ सकते हैं।
कभी तो मेवाड़, विजय के अत्यंत निकट जाकर भी पराजित हुआ, तो कभी मेवाड़ के महाराणा और उनकी सेना, पूर्ण नाश के कगार से भी बचकर निकल आई। हम सोचने को बाध्य हो जाते हैं कि कदाचित् कोई दैवी शक्ति थी, जिसने इस उपमहाद्वीप में हिंदुओं के विरोध को जीवित रखा, अन्यथा सहस्रों वर्षों तक केवल एक ही परिवार द्वारा इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध सतत युद्धरत रहना कैसे संभव था ?
मित्र शत्रु बन गए; संपन्नता विपन्नता बन गई; आनंद के उत्सव, भयानक रुदन में परिवर्तित हो गए; उल्लास के नृत्य, वीभत्स तांडव में बदल गए; मेवाड़ की अनुपम स्थापत्य कला, जिसके निर्माण में सैकड़ों वर्ष लगे थे, उन्हें इस्लामी आक्रांताओं ने क्षणों में ध्वस्त कर दिया; हिंदुओं के त्योहारों और संस्कृति का निर्मम दमन किया गया, पर इस सबके उपरांत भी, यह राजपरिवार, केवल एक धुन पर सवार, धर्म व स्वतंत्रता के लिए लड़ता रहा।
इस्लामी आक्रांताओं के एक संकेत मात्र पर नागदा जैसे सुंदर नगरों को ध्वस्त कर दिया गया, और निरीह हिंदुओं को अत्यंत नृशंसता के साथ मृत्यु के घाट केवल इसलिए उतार दिया गया क्योंकि इन इस्लामी कट्टरपंथियों के अनुसार जो इस्लाम को न माने, उसे मारना ही सबाब (पुण्य) था।
हिंदू संस्कारों और जीवनमूल्यों के अतिरिक्त ऐसा क्या था, जिसके कारण न केवल स्वयं महाराणा, वरन् मेवाड़ की प्रजा अपने निर्भीक राणाओं के साथ इस जिहाद के विरुद्ध एकजुट होकर खड़ी रही! मेवाड़ की महिमाशाली जनता ने युद्ध में न केवल के सहयोग किया, बल्कि हर कल्पनातीत कष्ट को सहा, पर न धर्म का साथ छोड़ा, न अपने महाराणाओं का।
और यह सब एक-दो पीढ़ियों तक नहीं, बल्कि दर्जनों पीढ़ियों तक चला।
ये कौन लोग थे, जो बिना थके, बिना रुके, बिना कोई शिकायत किए; अपने राणाओं के साथ खड़े रहे ? आश्चर्य होता है इन महान राजाओं का धैर्य देखकर, जो इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध लड़ते हुए शत्रु से संख्या में, कुटिलता में और अंधे धार्मिक उन्माद में बेहद कम थे, परंतु तब भी वे स्थिरचित्त रहे ! उन्होंने हिंदू धर्म पर हो रहे घातक प्रहारों का पूरे वेग से प्रत्युत्तर दिया।
अलाउद्दीन खिलजी द्वारा रावल रतन सिंह की निर्मम हत्या के पश्चात् पहली बार ऐसा हुआ था कि चित्तौड़ का दुर्ग किसी विधर्मी के हाथों में पड़ गया। फलस्वरूप चित्तौड़ के दुर्ग में स्थित अधिकांशतः महलों-हवेलियों और मंदिरों को अपवित्र अथवा ध्वस्त कर दिया गया। पंद्रह दिनों तक अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ की दुर्दशा करता रहा, तत्पश्चात् उसने वह दुर्ग अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंप दिया, जिसने इस दुर्ग का नाम ‘खिज्राबाद’ रख दिया।
चित्तौड़ के प्रथम साका में अलाउद्दीन खिलजी से अंतिम युद्ध हेतु जाने से पूर्व रावल रतन सिंह ने अपने पुत्रों और सहोदरों को चित्तौड़ के गुप्त द्वार से निकल जाने का आदेश दिया, ताकि वे समय आने पर पुनः दुर्ग पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर सकें। चित्तौड़ को पुनः अर्जित करने के प्रयासों में रतन सिंह की कुल नौ पीढ़ियाँ युद्ध में काम आईं, किंतु अंततः महाराणा भुवन सिंह ने इस स्वप्न को पूरा किया।
केवल तीन दशकों के अल्पकाल में ही राहप, माहप, करण सिंह इत्यादि राजाओं ने अपने पूर्वजों के इस महान दुर्ग को पुनः प्राप्त करने हेतु संघर्षरत रहकर अपने जीवन का बलिदान दिया। भुवन सिंह के पश्चात, लक्ष्मण सिंह चित्तौड़ की गद्दी पर विराजे। इस बीच उत्तर भारत में सत्ता, खिलजियों से तुगलकों के हाथों में आ गई। तब मुहम्मद बिन तुगलक ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया और इस युद्ध में लक्ष्मण सिंह और उनके पुत्र अरि सिंह वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और एक बार फिर चित्तौड़ का यह महान दुर्ग इस्लामी शत्रुओं के पास चला गया।
लक्ष्मण सिंह के छोटे पुत्र अजय सिंह, घायल अवस्था में केलवाड़ा की ओर निकल गए और वहीं अपनी राजधानी बनाई। यहाँ जैन मुनियों ने उनका उपचार किया और सहायता भी की। जैसा कि लिखा गया है, लक्ष्मण सिंह के दो पुत्र थे, छोटे अजय सिंह और उनसे ज्येष्ठ अरि सिंह। तुगलक के आक्रमण से पूर्व, अरि सिंह केलवाड़ा के वनों में जंगली सूअर का आखेट करने हेतु गए। वहाँ उनकी भेंट एक ग्रामीण लड़की से हुई, जिसने उन्हें आहत जंगली सूअर का पीछा करते हुए खेतों में जाने से रोका था। इस बाला ने अरि सिंह से कहा कि उन्हें उनका शिकार प्राप्त हो जाएगा, किंतु वे खेती का नाश न करें तथा बाहर उसके आने तक प्रतीक्षा करें।
अरि सिंह आश्चर्यचकित रह गए, जब उन्हें वह लड़की मृत जंगली सूअर को घसीटकर बाहर लाती दिखाई दी। तत्पश्चात् उस लड़की ने अरि सिंह को गाँव में विश्राम करने और वहीं उस जंगली सूअर के मांस को बनाकर खाने के लिए कहा। अरि सिंह इस लड़की से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने उसे और ध्यान से देखा कि उसने सिर पर दूध का मटका रखा हुआ था और वह सहजता से दो-दो भैंसों को भी खींच रही थी।
अरि सिंह ने विचार किया, ‘यदि इस लड़की से मेरा पुत्र उत्पन्न हो, तो वह निश्चय ही अतिबलशाली होगा।’ अरि सिंह ने तुरंत ही उस लड़की के परिवार इत्यादि के विषय में पता किया। वह चाँदना राजपूत थे, अतः अरि सिंह ने उस कन्या के पिता के समक्ष कन्या से विवाह की इच्छा प्रकट की। अरि सिंह ने इस लड़की से विवाह तो किया, किंतु चूँकि वह एक राजकन्या नहीं थी, अतः इस विवाह को गुप्त रखा गया। अरि सिंह कभी-कभी अपनी पत्नी से मिलने वहाँ आते रहते थे और उस कन्या से उनके पुत्र हुआ, जिसका नाम ‘हम्मीर सिंह’ रखा गया।
इसी बीच मुहम्मद बिन तुगलक ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया और इस युद्ध में लक्ष्मण सिंह तथा अरि सिंह को मारकर उसने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। लक्ष्मण सिंह के दूसरे पुत्र अजय सिंह, जो तुगलक से हुए इस युद्ध से बचकर केलवाड़ा की ओर निकल गए थे, केलवाड़ा में बस गए और वहाँ उनके दो पुत्र हुए, जिनके नाम थे सज्जन सिंह और क्षेम सिंह; किंतु दोनों ही विलासी और अप्रभावी राजकुमार थे। अजय सिंह को पर्वतों में रहने वाले जनजातियों के सरदार मूँजा बालीचा से कभी-कभी चुनौती मिलती रहती थी, किंतु युद्ध करने हेतु अजय सिंह की आयु अधिक हो चली थी। तब मेवाड़ के कुछ स्वामिभक्त सामंतों ने उन्हें हम्मीर सिंह के विषय में बताया।
हम्मीर को ऊँडवा गाँव से बुलवाया गया। तब हम्मीर की आयु केवल तेरह वर्ष की थी। हम्मीर ने अपने योद्धाओं को तैयार किया। उन्हें पता चला कि मूँजा एक उत्सव हेतु सेमारी गाँव में आनेवाला है। हम्मीर ने मूँजा पर आक्रमण किया और उसका मस्तक काटकर भाले की नोक पर टाँगकर अजय सिंह के चरणों में लाकर रख दिया।
अजय सिंह ने अपने भतीजे हम्मीर के माथे पर चुंबन दिया और उसी समय उन्होंने मुँजा के मस्तक से निकलते रक्त से हम्मीर का राजतिलक कर दिया। इस तरह हम्मीर सिंह 1326 ईसवी के आस-पास अपनी समस्त परिस्थितियों से शौर्यपूर्वक जूझते हुए मेवाड़ के महाराणा बन गए।
रावल से राणा
यहाँ यह उल्लेख आवश्यक है कि मेवाड़ के इन राजाओं की पदवी व नामकरण, रावल से परिवर्तित हो महाराणा कैसे हो गया ? इसके संदर्भ में दो मत प्रचलित हैं।
पहला यह कि महादेव भगवान् शिव को मेवाड़ का राजा मानते हुए, ये राजा स्वयं को राज्य का दीवान मात्र मानते थे, इसलिए ‘राणा’ शब्द मेवाड़ के शासकों के साथ जोड़ा गया। हमने पिछले अध्याय के अंत में राहप की बात की थी, जिनके कारण सिसोदिया वंश का यह नाम हुआ। राहप ने ही चित्तौड़ के खोने को दैवी संकेत समझ यह आदेश दिया कि भविष्य में मेवाड़ के रावल, शिव के प्रतिनिधि मात्र होकर ‘राणा’ कहलाएँगे।
यह मानव चेतना के लिए एक बड़ी छलाँग थी। यह प्रस्ताव, सत्ता के अहंकार के स्थान पर अत्यधिक विनम्रता लाने में सफल हुआ। आने वाली सदियों में ये महाराणा, सामंतों व प्रजा के साथ एक रूप होकर रहे। क्षुद्र निजी स्वार्थ से मुक्त हो, इन महाराणाओं का व्यक्तित्व पूरी तरह से परमार्थ में लीन हो गया। इन महाराणाओं ने स्वयं को कभी राजा समझा ही नहीं, बस शिव के सेवक के रूप में मेवाड़ को सम्हालते रहे। कदाचित् यही कारण था कि मेवाड़ की प्रजा सदैव अपने महाराणाओं के साथ रही।
दूसरी मान्यता है कि महाराणा शब्द, संस्कृत के महा+अर्णव मूल शब्दों से आता है। इसका अर्थ होता है, महायोद्धा।
श्यामल दासजी के अनुसार, राहप ने मंडोवर के राणा मोकल पडिहार को पराजित कर उनसे यह उपाधि ले ली थी।
जो भी हो, यह परिवर्तन हम्मीर के साथ क्रियान्वित हुआ तथा महाराणा हम्मीर सिंह पहले महाराणा हुए।
इसके पश्चात् पारिवारिक संघर्ष से बचने हेतु अजय सिंह ने अपने दोनों ही पुत्रों सज्जन सिंह और क्षेम सिंह को राज्य से बाहर जाने का आदेश दिया। सज्जन सिंह दक्षिण की ओर निकल गए, जहाँ उनका प्रारब्ध उन्हें ले जा रहा था, क्योंकि भविष्य में उनके वंशजों को औरंगजेब द्वारा भारतवर्ष में किए जा रहे अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष करना था। सज्जन सिंह, महान मराठा शासक छत्रपति शिवाजी महाराज के पूर्वज और सतारा के संस्थापक थे। इनकी वंशावली भी मेवाड़ के ग्रंथों में वर्णित है।
हमें ऋणी होना होगा अजय सिंह का, जिन्होंने पुत्रमोह को त्यागकर प्रतिभाशाली भतीजे को मेवाड़ का राज भार दिया। यदि हम्मीर को अजय सिंह राजा नहीं बनाते तो न सिसोदिया वंश बचता, न मेवाड़। हम देखेंगे कि कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में प्रताप का भी राज्याभिषेक हुआ। जैसा कि प्राक्कथन में लिखा गया है कि हम्मीर और प्रताप की जीवन-गाथा बहुत अर्थों में समान रही।
हम्मीर ने केलवाड़ा को अपना ठिकाना बनाया।
महाराणा बनते ही उन्होंने अपनी प्रजा को ‘उजाड़ भूमि नीति’ के आधार पर मैदानी क्षेत्रों को छोड़कर पहाड़ों में बस जाने का आदेश दिया, ताकि मेवाड़ की धरती बंजर और अनुपयोगी हो जाए और शत्रुओं के किसी काम न आए। इससे आक्रमणकारी सेना को भोजन-पानी न मिले और वे भूख-प्यास से परेशान हो जाएँ।
कालांतर में मेवाड़ के लगभग सभी महाराणाओं ने प्रजाजनों को मैदानों से पर्वतीय क्षेत्रों में जाने की इसी युक्ति का उपयोग हर इस्लामिक आक्रमण के समय किया। पूरी प्रजा में यह संदेश एक साथ पहुँचाना और सफलतापूर्वक उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान जाने हेतु समझाना एक अद्भुत कार्य था। प्रजाजन भी अपने राजा पर पूर्ण विश्वास करते थे और किसी भी अच्छी-बुरी परिस्थिति में अपने राणा की बात को मानते थे। अपने राजा के प्रति इतना विश्वास और प्रेम देखकर किसे गर्व नहीं होगा? और कभी-कभी तो यह समझना कठिन हो जाता है कि किसका बलिदान अधिक महान था – महाराणाओं का, जिन्होंने अपने देश की अर्थव्यवस्था को बिगड़ते देखा या उनकी प्रजा का, जिन्होंने अपने महाराणा का साथ दिया, फिर चाहे उन्हें स्वयं कितना ही अभाव और विपन्नता क्यों न भोगनी पड़ी हो ?
यद्यपि हम्मीर के लिए यह यात्रा सरल नहीं थी। अपनी प्रजा को इतनी विपरीत परिस्थितियों में डालकर तथा अपने राज्य की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करके भी, हम्मीर को अधिक सैन्य सफलता नहीं मिली। एक समय ऐसा भी आया, जब हम्मीर का राजकोष ही रिक्त हो गया तथा उनके पास अपनी सेना को वेतन देने हेतु भी धन नहीं बचा।
इसी बीच तुगलक, चित्तौड़ को जालौर के मालदेव सोनगरा को सौंपकर दिल्ली चला गया। मालदेव ने चित्तौड़ की रक्षा बड़ी तत्परता से की और मन-ही-मन उसने चित्तौड़ ही नहीं, पूरे मेवाड को हथियाने का स्वप्न पाल लिया था। मालदेव को हम्मीर की तेजी का पता तो था, किंतु हम्मीर को उसने निर्बल और असहाय मान रखा था। यद्यपि केलवाड़ा का पर्वतीय क्षेत्र मैदानों से आने वाली प्रजा हेतु सुरक्षित स्थान था, किंतु बार-बार चित्तौड़ को प्राप्त करने के असफल प्रयासों से मेवाड के सामंतों व हम्मीर के अन्य मित्रों का विघटन होने लगा था। चित्तौड़ प्राप्ति का पूरा अभियान ही निष्फल हो चुका था।
हम्मीर ने निराशा में सब सामंतो, मित्रों व जनता से पीठ फेर ली। हम्मीर अपना गृहक्षेत्र छोड़कर गुजरात में द्वारका की ओर निकल पडे। पराजित और निरुत्साहित हम्मीर, द्वारका के मार्ग में चारणों के खोड़ नामक एक गाँव में रात्रि विश्राम के लिए रुके। वहाँ बरवड़ी देवी नामक एक महिला थी, जो कि चखड़ा चारण की पुत्री थी। हम्मीर उनसे मिले और अपने दुर्भाग्य की कथा कह सुनाई।
बरवड़ी देवी ने हम्मीर की ओर देखा और कहा, “मेरे वीर भाई हम्मीर! दो वरदान देती हूँ। केलवाड़ा वापस लौट जाओ! आप निश्चय ही चित्तौड़ पर विजय प्राप्त करोगे। दूसरा, जब तुम्हें किसी अप्रत्याशित जगह से विवाह का प्रस्ताव आए तो उसे मना मत करना। इस विवाह प्रस्ताव से ही तुम्हें अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त होगा।”
हम्मीर ने उत्तर में कहा, “बाई (छोटी कन्या अथवा बहन), मुझे चित्तौड़ कैसे प्राप्त होगा ? मेरे पास न तो सेना है, न घोड़े हैं, न मेरे साथ युद्ध करने हेतु सैन्य सामान, और न ही मेरे परिजनों का पालन-पोषण करने हेतु मेरे पास धन है?”
बरवड़ी देवी ने हम्मीर से कहा कि उनका पुत्र बारू, पाँच सौ घोड़े व पर्याप्त धन लेकर केलवाड़ा में उनकी सेवा में उपस्थित होगा, जिसके सहयोग से वे अपनी सेना खड़ी करके चित्तौड़ प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि जब आपके पास धन आ जाए तो मुझे वापस लौटा देना
निराश हम्मीर ने अनायास ही बरवड़ी माता पर विश्वास कर मेवाड़ लौटने का निश्चय किया। हम्मीर वापस केलवाड़ा आए और कुछ ही सप्ताह में बारू उनके पीछे पाँच सौ घोड़ों का समूह लेकर आ गया। हम्मीर ने उन घोड़ों को अपनी सेना में शामिल कर लिया और उसी समय उन्होंने बारू को मेवाड़ का राजकवि नियुक्त कर दिया तथा उन्हें जागीरें भी प्रदान कीं। बारू के वंशज आज भी उन गाँवों में रहते हैं। एक बार पुनः भीलों ने मेवाड़ की सेना बनकर हम्मीर को पुष्ट किया।
उधर एक विचित्र घटनाक्रम के चलते चित्तौड़ दुर्ग के किलेदार मालदेव को उसके विश्वासपात्रों ने परामर्श दिया कि इस प्रकार तो सोनगरा वंश केवल चित्तौड़ में एक सेवक ही बना रह जाएगा।
यदि उन्हें चित्तौड़ का किलेदार रहते हुए पूरे मेवाड़ पर आधिपत्य करना है तो उन्हें अपनी पुत्री का विवाह हम्मीर से करवा देना चाहिए। यद्यपि मालदेव इस विवाह का प्रयोग केवल अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए कर रहा था, परंतु मालदेव को क्या पता था कि भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है ?
उधर, हम्मीर के लिए भी यह प्रस्ताव अमान्य था, क्योंकि मालदेव ने मुसलमान शत्रु से हाथ मिलाकर चित्तौड़ हथियाया था। किंतु हम्मीर को बरवड़ी देवी पर इतनी श्रद्धा थी कि उन्होंने सब संशय त्यागकर मालदेव का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। मालदेव की ओर से पुरोहितों ने हम्मीर तक यह संदेश पहुँचाया और उन्होंने हम्मीर को जालौर तथा मेवाड़ के बीच वर्षों से चली आ रही मित्रता के विषय में बतलाया।
पुरोहितों ने हम्मीर को बताया कि उनके पूर्वज मुसलमानों द्वारा मारे गए थे, ना कि मालदेव अथवा उनके परिवार के द्वारा। अब या तो मालदेव ने हम्मीर को पकड़ने हेतु ऐसा किया अथवा उनका अनादर करने की दृष्टि से, किंतु हम्मीर ने पहले ही सभी प्रकार से सोच-विचारकर इस प्रस्ताव का आकलन कर लिया था। सो उन्होंने बरवड़ी देवी की भविष्यवाणी पर विश्वास रखकर और चित्तौड़ विजय के अपने संकल्प के चलते, मालदेव के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने सेवकों से कहा, “विवाह प्रस्ताव के नारियल को स्वीकार कर लिया जाए।”
“मेरे चरण कम-से-कम उस पवित्र भूमि को तो छुएँगे, जहाँ कभी मेरे पूर्वज चले थे! एक राजपूत को सदैव विपरीत परिस्थितियों के लिए तैयार रहना चाहिए। हो सकता है, कभी उसे घावों से भरा शरीर लिये अपने घर को छोड़ना पड़े, और हो सकता है किसी दिन अपने सिर पर विजयमुकुट पहने, वह उसी भूमि का आधिपत्य भी कर ले!”
इस प्रकार हम्मीर ने अपने जीवन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य को साधने के इस अवसर को बेकार नहीं जाने दिया और वे केवल अपने पौरुष और बरवड़ी देवी की भविष्यवाणी के बल पर शत्रु का आलिंगन करने निकल पड़े। विवाह चित्तौड़ में हुआ और प्रथम रात्रि में ही सोनगरा राजकुमारी ने हम्मीर का हृदय व विश्वास दोनों जीत लिये। सोनगरा राजकुमारी को भी हम्मीर से तुरंत ही प्रेम हो गया और उसने अपने वर के चित्तौड़-विजय के रास्ते खोल दिए। राजकुमारी ने हम्मीर से कहा कि वह उसके पिता से उनके विशेष नौकर मौजीराम को माँग ले। इस बात को भी मालदेव मान गया।
मौजीराम नव-विवाहित युगल के साथ केलवाड़ा आ गया और उसने हम्मीर के पास जाकर कहा कि यही समय है, जब आपको आगे बढ़ना चाहिए और वह करना चाहिए, जिस हेतु आप मुझे मालदेव से माँगकर लाए हैं। मौजीराम ने हम्मीर को सुझाव दिया कि आप आखेट की आड़ में चित्तौड़ चलें।
हम्मीर ने मौजीराम की बात मान ली और अपनी छोटी सी सेना को लेकर अर्धरात्रि में चित्तौड़ पहुँचे। द्वारपाल, मौजीराम को जानते थे, अतः उन्होंने दुर्ग के द्वार खोल दिए हम्मीर और उनकी सेना ने इसका लाभ उठाकर चित्तौड़ पर आक्रमण करके, जो भी लड़ने आया, उसको खत्म करके चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया।
चित्तौड़ एक बार पुनः अपने सच्चे स्वामी के हाथों में आ गया।
सिसोदिया वंश के उखड़े पैर फिर से जमने आरंभ हो गए। सर्वप्रथम हम्मीर ने अंदर रहने वाली प्रजा पर से प्रतिबंध हटा दिए। इससे हम्मीर को प्रजा का विपुल प्रेम व विश्वास मिला तथा उनकी ख्याति फैलने लगी। प्रजाजन उत्साह से पूरे मेवाड़ में हम्मीर की विजय का संदेश ले गए, जिससे निराश जनता में हर्ष की लहर दौड़ गई।
इस्लामिक आक्रांता खिलजी द्वारा चित्तौड़ पर कब्जा कर उसे खिज्राबाद बना देने के सभी स्मृतिचिह्नों को एक सप्ताह के अंदर नष्ट कर दिया गया। सब मस्जिदें ढहा दी गईं। वैसे भी मेवाड़ की जनता ने ‘खिज्राबाद’ नाम को स्वीकार नहीं किया था, जैसा कि उस समय के राजस्व अभिलेखों से पता चलता है। मंदिरों का जीर्णोद्धार आरंभ कर दिया गया। ब्राह्मणों का खोया गौरव व सम्मान पुनर्स्थापित किया गया। सब जातियों को यथोचित सम्मान दिया गया तथा हिंदू राज का पुनरागमन हुआ।
उधर यह सूचना मिलते ही मालदेव के क्रोध का ठिकाना न रहा। उसने अपनी सेना संगठित करके चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। मालदेव के पाँचों पुत्र उसके साथ ही लड़ते थे। हम्मीर ने भी अपनी सेना को एकत्र किया, अपने पूर्व सरदारों, सामंतों को भी बुला लिया और जालौर की सेना से युद्ध की तैयारी करने लगे। मालदेव सीधा हम्मीर से भिड़ने के स्थान पर तुगलक के पास सहायता हेतु गया और तुगलक तथा मालदेव की संयुक्त सेनाओं ने चित्तौड़ पर आक्रमण के लिए कूच किया।
इस बीच जैसे ही मेवाड़ की प्रजा को पता चला कि मेवाड़ के अधिपति अब हम्मीर हैं तो ‘हिंदवा सूरज’ का ध्वज फिर से गौरवान्वित हुआ, जगह-जगह से सरदार, सामंत और आम लोग पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्रों से निकलकर कुंभलगढ़ की घाटियों में आ गए और अपने नए राजा की जयकार करते हुए चित्तौड़ की ओर निकल पड़े।
चित्तौड़ के गौरव की पुनर्स्थापना का अर्थ था कि अब लोग पर्वतों और कंदराओं से निकलकर मैदानों में बसे अपने पुराने ठिकानों और घरों में जा सकते थे। मुसलमानों के क्रूर हमलों से त्रस्त मेवाड़ के हिंदुओं के लिए हम्मीर का पुनरागमन संतोष की साँस के समान था।
सिंगोली का युद्ध
प्रत्येक हिंदू सरदार, जिसने कभी अपनी मातृभूमि से बर्बर इस्लामी शासन के समूल सफाया करने का स्वप्न देखा था, वह मेवाड़ की भूमि से इस्लामी कट्टरपंथियों पर विजय की आशा मात्र से ही उल्लासित हो गया।
इस आशा और उत्साह के बल पर आमजन, सामंतों और सरदारों के सहयोग से हम्मीर ने तुगलक की सेना के सम्मुख एक विशाल सेना खड़ी कर ली और अब तुगलक के आक्रमण की प्रतीक्षा करने के बजाय उसी दिशा में चल पड़े, जहाँ तुगलकी सेना का डेरा लगा हुआ था, ताकि युद्ध का समय व शैली हम्मीर ही निश्चित कर सकें।
मेवाड़ की ओर आने के तीन रास्ते हैं, पश्चिमी रास्ता है मारवाड़ की ओर से, बीच का रास्ता है दिवेर की ओर से और पूर्वी रास्ता है अरावली के पठारों में होकर। तुगलक को उसके सलाहकारों ने मूर्खतापूर्ण परामर्श दिया कि उन्हें पूर्व की ओर से मेवाड़ जाना चाहिए।
तुगलक को यह पता ही नहीं था कि मेवाड़ के संकीर्ण रास्तों और पर्वतीय क्षेत्रों में बने छोटे-छोटे दरों में फँसकर उसका संख्याबल निष्फल और निष्क्रिय हो जाएगा। तुगलक ने चंबल नदी के किनारे 'सिंगोली' नामक स्थान पर अपना डेरा डाला। तुगलक 70,000 घुड़सवार व 20,000 पैदल सैनिकों के साथ रात्रि विश्राम में था। 20,000 घुड़सवारों व 10,000 पैदल सैनिकों के साथ हम्मीर ने तुगलक के डेरे को चुपचाप घेर लिया। हम्मीर ने रात के अँधेरे में आक्रमण किया और तुगलक के अधिकांश सेनानायकों को मार दिया। 1336 ईसवी के उस यशस्वी दिन, महाराणा हम्मीर ने मेवाड़ से दुगनी बड़ी सेना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।
हम्मीर ने मालदेव के पुत्र हरिदास को एकल युद्ध में मार गिराया और तुगलक को बंदी बना लिया। यह निश्चित ही तथाकथित दिल्ली सल्तनत के लिए लज्जा का विषय था, जिनके नामों के आगे न जाने कितने प्रकार की उपाधियाँ लगाई जाती थीं। यद्यपि इस तथाकथित सल्तनत का प्रभाव केवल कुछ सौ वर्ग किलोमीटर तक ही सीमित था। कालांतर में महाराणा हम्मीर की इस बड़ी विजय और उनके शौर्य की गाथा को भारतीय इतिहास के पन्नों से ही हटा दिया गया और फलस्वरूप उनकी स्मृति आम जनमानस से भी शनैः शनैः विस्मृत होती चली गई।
विचित्र बात है कि अधिकांश भारतीय इतिहासकारों ने मध्यकालीन भारत के शोध का आधार मुख्यतः फारसी और अरबी इतिहासकारों द्वारा लिखित संस्मरणों को ही बनाया है। ऐसा ही एक लेखक था – फरिश्ता, जिसका उद्धरण भारतीय इतिहासकार समय-समय पर अपने लेखों में करते हैं। किंतु फरिश्ता अपने धर्म के प्रति समर्पित था और इसी कारण उसने सिंगोली के इस महती युद्ध को अपने संस्मरणों में कहीं लिखा ही नहीं। भारत का इतिहास लिखने वालों से यह पूछा जाना चाहिए कि मेवाड़ के इतिहासकारों, वहाँ के शिलाखंडों व लोकश्रुति को पूरी तरह क्यों उपेक्षित किया गया ? (गौरीशंकर ओझा के अनुसार, कुंभलगढ़ के जैन मंदिर की एक प्रशस्ति में हम्मीर की इस विजय का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। पृ. 214)
सिंगोली की विजय कोई छिटपुट संघर्ष नहीं, बल्कि एक युग प्रवर्तक घटना थी। हम्मीर ने संख्याबल में अपने से दुगनी सेना को पूरी तरह नष्ट किया था। मेवाड़ ने जब अपनी खोई ख्याति और सम्मान पुनः प्राप्त किया तो उसके विषय में केवल कुछ जैन मंदिरों में शिलालेखों इत्यादि से ज्ञात होता है और वही सब कालांतर में मेवाड़ की गौरवगाथा के पन्नों पर भी लिखा गया।
प्रबुद्ध जनों और इतिहासकारों के लिए यह लज्जा का विषय है कि उन्होंने भी भारतीय इतिहास के साथ हुए इस मिथ्याचार में भाग लिया। इस पूरे उपक्रम का उद्देश्य क्या रहा होगा, यह केवल वे भलीभाँति बता सकते हैं। यदि शिक्षक और इतिहासकार इस तरह से सत्य के हनन में सहभागी बनें तो उस समाज का पतन और ह्रास होना निश्चित है।
मेवाड़ के हम्मीर जैसे महान योद्धाओं के इतिहास को समय और कुटिल इतिहासकारों के कुप्रयासों से बचाए रखने का श्रेय जाता है मेवाड़ के इतिहासकारों, लोक गायकों, कथाकारों तथा मंदिरों में उकेरे गए शिलालेखों को, जिन्होंने मेवाड़ के जनमानस में महाराणा हम्मीर के जीवन व शौर्य की गाथा के संस्मरणों को अपनी कथाओं और गीतों के माध्यम से जीवित रखा।
यही प्रकरण महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा व प्रताप के विजय अभियान के साथ भी हुआ, जहाँ वामी इतिहासकारों ने मेवाड़ के इन यशस्वी महाराणाओं की विजयगाथा को पूरा ही पोंछ डाला। किंतु हमारे देश के लेखकों व इतिहासकारों ने मेवाड़ की वंशावलियों, ख्यातियों व लोक इतिहास की पूर्ण उपेक्षा क्यों की? केवल वामपंथी लेखकों के पूर्वग्रहों से भरे लेखन को ही सत्य बनाकर क्यों निरीह हिंदुओं के गले उतारा गया ? इस पर एक निष्पक्ष जाँच कमीशन बैठना चाहिए।
हम्मीर ने तुगलक को बंदी बनाकर छह महीने तक चित्तौड़ के दुर्ग में बंद रखा। तथाकथित दिल्ली सल्तनत का राजा; चित्तौड़ के दुर्ग में हम्मीर द्वारा एक श्वान की भाँति बंदी बनाया हुआ था, पर दिल्ली सल्तनत के किसी भी सेनापति ने अपने शाह को हम्मीर के हाथों से छुड़वाने का प्रयास तक नहीं किया! यह थी ‘दिल्ली सल्तनत’! एक निकृष्ट श्रेणी का झूठ, जो हिंदुओं के सबल संघर्ष को नीचा दिखाकर बर्बर लुटेरों को महिमामंडित करने के लिए गढ़ा गया।
क्या यह समझना कठिन है कि चौदहवीं शताब्दी में भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य मेवाड़ था ? तुगलक को क्षमादान के बदले में हम्मीर को अजमेर रणथंभौर-नागमंड और शिवपुरी इत्यादि समर्पित करने पड़े। इसके अतिरिक्त पचास लाख रुपए नकद और सौ हाथी दंडस्वरूप देने पड़े। साथ ही हम्मीर ने पाँच सहस्त्र घोड़े भी तुगलक से वसूले।
हम्मीर ने मेवाड़ के दरबार में बंदी तुगलक से कहा, “यदि अब तूने कभी चित्तौड़ पर आक्रमण किया तो मैं चित्तौड़ की रक्षा दुर्ग के अंदर से नहीं, बल्कि बाहर आकर करूँगा।” पराजित और अपमानित तुगलक को हम्मीर ने जाने दिया। हम्मीर की यह विजय अत्यधिक महत्त्व का विषय होने के पश्चात् भी भुला दी गई और इतिहास ने उस महान हिंदू राजा को भुला ही दिया, जिसने अकेले ही चौदहवीं शताब्दी में हिंदुओं के धर्मध्वज को ऊँचा किया और अपनी शक्ति की अमिट छाप छोड़ी। तुगलक ने इस करारी पराजय के बाद राजस्थान की पवित्र भूमि की ओर मुड़कर नहीं देखा तथा दक्षिण में उत्पात मचाने चला गया।
तुगलक पूरा जीवन एक इस्लामी राज्य बनाने के प्रयास में इधर-उधर भागता फिरा। हिमाचल में काँगड़ा के राजा पृथ्वी चंद ने उसे बुरी तरह पराजित किया तथा उसके एक लाख से अधिक सैनिक मार डाले। दक्षिण में विजयनगर के संस्थापक दो हिंदू भाइयों, हरिहर व बुक्का ने भी तुगलक को पराजित किया। 1351 ईसवी में सिंध में तुर्क गुलामों के साथ संघर्ष में तुगलक की मृत्यु हुई।
इधर मेवाड़ में मालदेव के कनिष्ठ पुत्र बनबीर ने हम्मीर का आश्रय प्राप्त कर लिया तथा आगे चलकर हम्मीर का विश्वसनीय सरदार बना। ऐसा कहा जाता है कि जब बनबीर को नीमच, रत्नपुर और कैराड़ की जागीरें दी गईं, तब हम्मीर ने उससे कहा, “खाओ, सेवा करो और निष्ठावान रहो। पहले तुम एक तुर्क विधर्मी के सेवक थे, किंतु आज तुम अपने धर्म के निष्ठावान् हिंदू के साथ हो। जो मेरा था, वह मैंने प्राप्त कर लिया है, मेरे पूर्वजों के रक्त से नहाया यह दुर्ग, मेरे प्रिय इष्ट द्वारा मुझे दिया गया उपहार है, और वही मुझे सदैव यहाँ स्थापित रखेंगे, मैं इस ख्याति को, इस गौरव को, किसी अन्य की पूजा में नहीं लगाऊँगा, जैसा कि मेरे पूर्वजों ने किया।”
हम्मीर यहाँ अपने इष्ट के रूप में भगवान् शिव के विषय में कह रहे हैं, जो मेवाड़ राज्य के आराध्य देव हैं और अन्य देवता का जहाँ उल्लेख हुआ है, वहाँ कदाचित् भगवान् विष्णु हो सकते हैं, किंतु यह केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। मालदेव को हम्मीर ने जाने दिया। वृद्धावस्था में जालौर में वे मृत्यु को प्राप्त हुए। सोनगरा राजकुमार बनबीर की सिसोदिया राणा हम्मीर से जो मित्रता हुई, वह कालांतर में भी बनी रही। इस मित्रता ने आगे सिसोदिया वंश के संकटकाल, महाराणा प्रताप के उदय और राजतिलक तथा अकबर के साम्राज्यवादी आक्रमणों के विरुद्ध मेवाड़ के गौरव युद्ध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हम्मीर, उत्तर भारत के एकमात्र शक्तिशाली हिंदू राजा बने, जिनके तीन ओर दिल्ली, मालवा और गुजरात जैसे मुस्लिम राज्य थे, किंतु उन्होंने तीनों को मेवाड़ के अधीन कर लिया।
मारवाड़, आमेर, बूँदी, ग्वालियर, चंदेरी, रायसेन, सिपरी, काल्पी, आबू इत्यादि के हिंदू राजाओं ने चित्तौड़ के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की और हम्मीर के साथ बने रहने की शपथ ली। मेवाड़ ने हम्मीर के राज्यकाल में अप्रत्याशित प्रगति और संपन्नता देखी। व्यापार व व्यवसाय के मार्ग खुले और मेवाड़ का राज्य भारतवर्ष में सर्वाधिक संपन्न राज्यों में गिना जाने लगा। इस समय की स्थापत्य कला, मंदिरों और भवनों का वैभव बताता है कि इस समय में आर्थिक दृष्टि से मेवाड़ कितना संपन्न रहा होगा !
हम्मीर ने खोड़, गुजरात से माता बरवड़ी को आमंत्रित किया और उनका यथोचित सम्मान तथा सत्कार भी किया। उन्होंने बरवड़ी देवी की स्मृति में चित्तौड़ दुर्ग में एक मंदिर का निर्माण भी करवाया, जो आज भी ‘अन्नपूर्णा माता मंदिर’ के नाम से चित्तौड़ दुर्ग में है।
जन्म से मृत्यु तक हम्मीर की कथा, मध्यकालीन भारत की एक ऐसी अद्भुत कथा है, जिसमें एक सिसोदिया राजकुमार ने अपने सुख, सुरक्षा, वैभव, यहाँ तक कि जीवन के मूल्य पर भी हिंदू धर्म के रक्षार्थ, इस्लामी आक्रांताओं से संघर्ष कर, मेवाड को स्वतंत्र किया।
यह कथा है माता बरवड़ी के आशीर्वाद से, मेवाड़ राज्य के विपन्नता से संपन्नता की ओर बढ़ने की, जो आज भी मेवाड़ के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखी है। इससे न केवल चारण जाति के सिसोदिया वंश से संबंधों का पता चलता है, वरन् यह भी ज्ञात होता है कि जब अन्य सभी ने सिसोदिया वंश का साथ छोड़ दिया था, तब कैसे चारण उनके हितैषी और रक्षक बने रहे। अन्यथा क्या कारण था कि गुजरात की उन दैवीय महिला ने मेवाड़ के राज्य को पुनः स्थापित करने हेतु केवल आशीर्वाद ही नहीं दिया, वरन् अपने पुत्र के साथ धन व संसाधन भी उपलब्ध करवाए। इसके साथ ही उन्होंने राजस्थान के अन्य राजपरिवारों और इस्लामी साम्राज्यवादी शक्तियों से भी वैर मोल लिया।
इसका कारण सिसोदिया वंश के प्रति सम्मान, प्रेम व विश्वास नहीं तो और क्या था, क्योंकि यही सिसोदिया राजपूत तो कालांतर में इस उपमहाद्वीप में हिंदुओं के भविष्य के लिए एकमात्र आशा बने! दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध हम्मीर का अभियान और मुहम्मद बिन तुगलक को बंदी बनाया जाना, उन इस्लामी कट्टरपंथियों के हृदय में कटार घोंपने के समान था, जिन्होंने चित्तौड़ को जीतकर, मेवाड़ के सिसोदिया राजपूत वंश को समाप्त कर पूरे देश के धर्मांतरण का स्वप्न देखा था। हम्मीर ने लगभग चालीस वर्षों तक निर्विघ्न राज किया। उन्होंने गया और वाराणसी तक देश भर में मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया और अपनी आयु पूर्ण करके देवलोक गमन कर गए।
हम्मीर अपने व्यक्तित्व व कृतित्व के कारण मेवाड़ और देश भर में अपने नाम की अमिट छाप छोड़ गए। आज हम उन्हें मेवाड़ के एक बुद्धिमान, शूरवीर तथा अजेय शासक के रूप में जानते हैं, जिन्होंने अपने वंशजों के लिए एक स्थिर, संपन्न और विराट हिंदू राज्य की पुनरुथापना की। हम्मीर नहीं होते तो मेवाड़ का यह विलक्षण राजपरिवार इतिहास के गलियारों में सदा के लिए लुप्त हो गया होता! हम्मीर के नाम व यशोगाथा की हिंदू जनमानस में पुनर्स्थापना ही उस महापुरुष को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है।