पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 16 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 16

मंदिर के अंदर अचानक एक गहरी खामोशी छा गई…दीपक की लौ भी जैसे थम गई हो।

तभी मूर्ति के पास से एक गंभीर, गूंजती हुई आवाज़ आई—
सिद्धिका को समाप्त करना होगा…तभी उसका दूसरा जन्म संभव है…।

कृष्णा एकदम सन्न रह गया।उसके हाथ रुक गए…और आँखें मूर्ति पर टिक गईं।

उसने धीमे से कहा -
नहीं…

सिद्धिका अब भी उसकी बाहों में थी…काँप रही थी…उसकी आँखों में डर और दर्द दोनों थे।

वो बोली - 
कृष्णा… ये आवाज़…

कृष्णा तुरंत बोला—
नहीं…मैं तुम्हें नहीं खो सकता…

उसकी आवाज़ टूट रही थी।

वही दिव्य आवाज़ और भारी हो गई—
यदि इसे नहीं रोका गया…तो यह संसार अंधकार में डूब जाएगा…।

कृष्णा के अंदर तूफान चल रहा था…
👉 एक तरफ उसका प्यार…
👉 दूसरी तरफ देवता का आदेश…

सिद्धिका धीरे-धीरे उसके सीने से अलग हुई…उसकी आँखों में आँसू थे।

वो बोली - 
अगर मैं खतरा हूँ…तो मुझे खत्म कर दो…

कृष्णा ने तुरंत कहा -
चुप! ऐसा मत बोलो…

मंदिर की हवा अचानक ठंडी हो गई…दीवारों पर अजीब सी परछाइयाँ बनने लगीं…जैसे समय खुद रुक गया हो।

आवाज़ आखिरी बार गूंजी—
निर्णय तुम्हारे हाथ में है, कृष्णा…

कृष्णा ने सिद्धिका को देखा…

और उसकी आँखों में सिर्फ एक ही जवाब था—
मैं तुम्हें नहीं मार सकता…

🔥 अब कहानी अपने सबसे कठिन मोड़ पर है—
🩸 देवता का आदेश बनाम प्यार की ताकत…
❤️ और सिद्धिका का अस्तित्व दांव पर है…

मंदिर के अंदर हवा जैसे जम गई थी…दीपक की लौ काँप रही थी…और हर साँस भारी हो चुकी थी। सिद्धिका धीरे-धीरे कृष्णा से अलग हुई…

उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं, लेकिन आवाज़ स्थिर थी—
कृष्णा…तुम्हें मेरी कसम…

कृष्णा तुरंत पीछे हट गया।

वो बोला - 
नहीं…

उसने सिर हिलाया। सिद्धिका ने काँपते हाथों से एक खंजर उसकी तरफ बढ़ा दिया।

वो बोली - 
ये लो…और मुझे खत्म कर दो…

कृष्णा ने खंजर नहीं लिया। उसकी आँखें भर आईं।

वो बोला - 
तुम पागल हो गई हो क्या?!

वो रोते हुए बोली—
अगर मैं जिंदा रही…तो मैं खुद को नहीं रोक पाऊँगी…और फिर मैं तुम्हें ही मार दूँगी…।

कृष्णा की साँसें टूटने लगीं…उसके हाथ काँप रहे थे।

वो बोला - 
तुम्हें खोना…मेरे लिए मौत से भी बदतर है…

मंदिर की दीवारों पर फिर से काली परछाइयाँ बनने लगीं…जैसे अंधकार इस पल का इंतज़ार कर रहा हो।

उसने बहुत धीरे से कहा—
कृष्णा…ये प्यार अगर सच्चा है…तो मुझे आज आज़ाद कर दो…

कृष्णा ने पहली बार उसकी तरफ देखा…और खंजर अपने हाथ में ले लिया। उसकी आँखों में आँसू थे…मंदिर पूरी तरह शांत हो गया…सिर्फ दो दिलों की धड़कन सुनाई दे रही थी…।

🔥 अब सब कुछ एक पल पर टिका है—
🩸 क्या कृष्णा खंजर चलाएगा…
❤️ या कोई चमत्कार इस पल को रोक देगा…?

मंदिर में एक पल के लिए सब कुछ रुक गया…सिर्फ एक भारी सन्नाटा और टूटती हुई सांसें। कृष्णा ने सिद्धिका को अपने सीने से कसकर लगाया…उसकी आँखें आँसुओं से भर चुकी थीं…हाथ काँप रहे थे…और दिल जैसे हजार टुकड़ों में टूट रहा था। धीरे-धीरे…उसने खंजर उसके पेट में उतार दिया। सिद्धिका ने दर्द में भी कोई चीख नहीं दी…बल्कि हल्की सी मुस्कान उसके होंठों पर आ गई।

उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी -
कृष्णा…तुमने सही किया…

वो और कसकर उसके सीने से लग गई…जैसे वो इस पल को हमेशा के लिए रोक लेना चाहती हो।

वो बोली - 
मैं…फिर मिलूँगी…

अगले ही पल…उसका शरीर धीरे-धीरे सुनहरी रोशनी में बदलने लगा…कृष्णा ने उसे और कसकर पकड़ लिया…

वो बोला - 
नहीं… मत जाओ…

कृष्णा रो पड़ा…

उसकी आवाज़ मंदिर में गूंज रही थी—
सिद्धिका!!!

और फिर…सिद्धिका पूरी तरह उस सुनहरी रोशनी में बदलकर हवा में घुल गई…जैसे वह कभी थी ही नहीं…कृष्णा वहीं घुटनों पर गिर पड़ा…उसकी बाहें अब खाली थीं…लेकिन दिल हमेशा के लिए भर चुका था दर्द से।

मंदिर में फिर वही गहरी आवाज़ गूंजी…

लेकिन इस बार उसमें एक रहस्यमय शांति थी—
त्याग पूरा हुआ, अब पुनर्जन्म शुरू होगा…।

🔥 कहानी खत्म नहीं हुई…
🩸 सिद्धिका जा चुकी है…
❤️ लेकिन “वापस आने” का वादा करके…

रात भर कृष्णा मंदिर के उसी टूटे फर्श पर घुटनों के बल बैठा रहा…
आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।कभी वो भगवान को पुकारता…कभी बस खामोश हो जाता…लेकिन जवाब सिर्फ सन्नाटा था।

वो चिल्लाया - 
सिद्दिका!!!!

फिर बोला - 
भगवान मैने तो हमेशा आपकी पूजा की थी ना...बिना कुछ कहे बिना कुछ मांगे...।
तो आपने मुझसे मेरी पूरी जिंदगी क्यों छीन ली...?
क्यों दूर किया मुझसे मेरी सिद्धिका को...?
मैने तो आज तक आपसे कुछ मांगा भी नहीं था ना...। 
फिर क्यों किया ऐसा...?

सुबह होते-होते…उसके चेहरे पर अब कोई भाव नहीं बचा था।
ना दर्द…ना उम्मीद…बस एक अजीब सी शून्यता।वो बिना कुछ बोले स्टेशन पहुँचा…और ट्रेन में बैठ गया।खिड़की वाली सीट ली…
और बाहर देखने लगा। जैसे ही ट्रेन चलने लगी…

उसके दिमाग में यादें दौड़ने लगीं—
👉 गंगा किनारा…
👉 सिद्धिका की मुस्कान…
👉 उसका जिद करना…
👉 लाल साड़ी…
👉 और आखिरी पल की सुनहरी रोशनी…

हर याद उसके दिल में एक नया घाव खोल रही थी…उसकी मुट्ठी अपने आप भींच गई…लेकिन आँखें अब भी सूखी थीं।

वो खुद से ही फुसफुसाया—
मैंने सही किया……या सब खत्म कर दिया?

कोई जवाब नहीं आया। बाहर पेड़ पीछे भाग रहे थे…आसमान बदल रहा था…लेकिन कृष्णा के अंदर सब कुछ ठहर चुका था।

उसके होंठ हल्के से हिले -
सिद्धिका…

बस इतना ही निकला…फिर वो फिर से खिड़की की तरफ देखने लगा…जैसे वो अभी भी कहीं उससे मिलने वाली हो।

🔥 कहानी अब एक नए मोड़ पर है—
🩸 कृष्णा एक टूटा हुआ इंसान बन चुका है…
❤️ लेकिन वादा अभी खत्म नहीं हुआ है…

👉 क्या सिद्धिका सच में वापस आएगी?
या अब राधा के रूप में एक नई शुरुआत होगी…?