पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 3 Sonam Brijwasi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 3

ऑफिस में आज फिर सन्नाटा था…सिर्फ दो लोग थे 👉 कृष्णा… और सिद्धिका।
सिद्धिका टेबल के पास खड़ी थी…लैपटॉप पर कुछ देख रही थी।
उसके लंबे बाल कंधों पर बिखरे थे…और वही रहस्यमयी खुशबू पूरे कमरे में फैली हुई थी। तभी पीछे से किसी ने उसे धीरे से बाहों में भर लिया। सिद्धिका एक पल के लिए सन्न रह गई…लेकिन अगले ही सेकंड उसे एहसास हो गया… ये कृष्णा था।

अजीब बात ये थी वो चाहती तो एक झटके में उसे दूर धकेल सकती थी…या उसी पल उसका खून पी सकती थी…लेकिन…
उसने कुछ नहीं किया। वो बस चुप खड़ी रही…क्योंकि उस स्पर्श में डर नहीं था…एक अजीब सा सुकून था। कुछ पल खामोशी रही…

फिर सिद्धिका ने धीरे से पूछा -
तुम्हें… मुझसे डर क्यों नहीं लगता…?

उसकी आवाज़ में पहली बार  गुस्सा नहीं… मदहोशी थी।कृष्णा ने उसे और कसकर पकड़ लिया…

उसकी आवाज़ शांत थी वो बोला—
डर लगता है… लेकिन तुमसे नहीं…डर इस बात का है…कि तुम खुद को खो दोगी…।

ये सुनते ही सिद्धिका का दिल तेज़ धड़कने लगा। उसकी आँखें लाल हो रही थीं…उसकी प्यास जाग रही थी…लेकिन साथ ही— उसका दिल भी कमजोर पड़ रहा था।

वो धीरे-धीरे कृष्णा की तरफ मुड़ी…अब दोनों आमने-सामने थे…
बहुत करीब…उसकी नजर फिर से उसी जगह गई  कृष्णा की गर्दन…उसके दाँत बाहर आने लगे…वो झुकने लगी…बस एक पल...लेकिन जैसे ही वो और करीब आई कृष्णा ने अपनी आँखें बंद कर लीं…जैसे उसे पूरा भरोसा हो  वो उसे नुकसान नहीं पहुंचाएगी।सिद्धिका वहीं रुक गई…उसकी सांसें कांप रही थीं…

उसकी प्यास चीख रही थी—
खून पी लो…

लेकिन दिल कह रहा था—
इसे मत छुओ…

अचानक सिद्धिका ने खुद को पीछे खींच लिया।उसकी आँखों से एक आँसू निकल गया…।

उसने धीमे से कहा -
तुम… मुझे कमजोर बना रहे हो…

और अगले ही पल  वो वहाँ से गायब हो गई। उस दिन कुछ टूट गया…और कुछ बन भी गया  एक वैंपायर अपनी प्यास से हार रही थी… और एक इंसान उसके दिल में जगह बना रहा था…।


उस दिन ऑफिस का माहौल पहले से भी ज़्यादा भारी था…सिद्धिका अकेली खड़ी थी…लेकिन उसे महसूस हो रहा था कोई उसे देख रहा है। और अगले ही पल कृष्णा उसके सामने आ गया।

बिना कुछ कहे…कृष्णा ने उसका हाथ पकड़ा…और उसे अपनी ओर खींच लिया। सिद्धिका उसकी आँखों में देखने लगी…लेकिन आज कुछ अलग था। उसकी आँखों में शांति के साथ…एक अजीब सी possesiveness भी थी।

कृष्णा धीमे लेकिन गहरी आवाज़ में बोला—
एक बात ध्यान रखना…तुम सिर्फ मेरी हो…किसी और के करीब जाने की सोचना भी मत…।

सिद्धिका एक पल के लिए हैरान रह गई…ये वही कृष्णा था जो हमेशा शांत, समझदार और भगवान का भक्त था…लेकिन आज— उसमें एक अलग ही हक जताने वाला रूप था। उसकी आँखों में देखते हुए सिद्धिका हल्का मुस्कुराई…लेकिन वो मुस्कान खतरनाक थी। वो उसके और करीब आई…इतनी करीब कि उसकी सांसें कृष्णा के चेहरे से टकराने लगीं…

और उसने धीमे से कहा—
और… अगर एक दिन मैंने तुम्हारा खून पी लिया तो…?

कुछ पल के लिए सब शांत हो गया…लेकिन कृष्णा पीछे नहीं हटा।
वो और करीब आया…

उसने सिद्धिका की आँखों में सीधे देखते हुए कहा—
तो भी… मैं तुम्हारा ही रहूंगा।

ये सुनकर सिद्धिका के अंदर जैसे तूफान आ गया।उसकी प्यास जाग उठी…उसकी आँखें लाल हो गईं…लेकिन साथ ही उसका दिल भी जोर से धड़कने लगा।

उसने मन ही मन सोचा -
ये इंसान पागल है…या फिर… मुझे सच में समझता है…।

कृष्णा ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया…

वो बोला - 
तुम चाहे जो हो…मेरे लिए तुम वही हो… जिससे मैं दूर नहीं जा सकता…।

सिद्धिका अब खुद को संभाल नहीं पा रही थी…उसके दाँत बाहर आ चुके थे…वो झुकी…कृष्णा की गर्दन के बेहद करीब…बस एक पल…।

सिद्धिका झुक चुकी थी…उसके नुकीले दाँत कृष्णा की गर्दन से बस एक सांस दूर थे…उसकी आँखें पूरी तरह लाल…साँसें बेकाबू…प्यास अपने चरम पर थी।

उसने धीरे से फुसफुसाया -
अब रोक नहीं पाऊँगी…

और अगले ही पल उसने कृष्णा की गर्दन पर अपने दाँत गड़ा दिए।
लेकिन…जैसे ही उसके दाँत उसकी त्वचा को छुए कुछ अजीब हुआ…कोई दर्द नहीं… कोई डर नहीं…बल्कि एक अजीब सी गर्माहट…एक शांति…कृष्णा ने आँखें बंद कर लीं…ना उसने खुद को छुड़ाया…ना ही कोई विरोध किया…जैसे उसे पहले से पता था ये पल आएगा। उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान थी। लेकिन…
अगले ही सेकंड सिद्धिका का शरीर कांप गया। उसके दाँत हट गए…वो अचानक पीछे हट गई…

वो चीख पड़ी -
नहीं…!

उसकी आँखों से आँसू निकल आए…

वो बोली - 
मैं… नहीं कर पाई…मैं तुम्हारा खून नहीं पी पाई…।

उसने अपने हाथों को देखा…जो कभी खून के लिए बेकाबू रहते थे…आज वही हाथ काँप रहे थे।  वो हार चुकी थी। लेकिन ये हार उसकी प्यास की थी…या उसके अंधकार की…कृष्णा धीरे से उसके पास आया…और बिना डरे उसके चेहरे को अपने हाथों में थाम लिया।

उसने शांत आवाज़ में कहा -
ये हार नहीं है…ये तुम्हारी जीत है…

सिद्धिका उसकी आँखों में देखने लगी…पहली बार—उसे अपने अंदर अंधेरा कम महसूस हुआ…और एक नई रोशनी जन्म लेती दिखी।

उस दिन—
🩸 एक वैंपायर अपनी सबसे बड़ी प्यास से हार गई…
❤️ और एक इंसान का प्यार जीत गया…

उस रात के बाद…सब कुछ बदल गया था। सिद्धिका अब पहले जैसी नहीं रही…उसकी आँखों की लाल चमक कम होने लगी थी…
उसकी प्यास… जो कभी बेकाबू थी… अब जैसे बंधती जा रही थी।
लेकिन ये शांति ज्यादा देर टिकने वाली नहीं थी। क्योंकि अंधकार इतनी आसानी से किसी को छोड़ता नहीं…।

उसी खंडहर महल में…जहाँ से सिद्धिका आई थी… अचानक काली हवाएं चलने लगीं।

एक गहरी, डरावनी आवाज़ गूंजी—
सिद्धिका… तुम कमजोर पड़ रही हो…

वो आवाज़ किसी इंसान की नहीं थी… वो उसी अंधकार की थी… जिसने उसे बनाया था।

वो बोला - 
तुम्हारा काम क्या था… भूल गई हो?
तुम्हें इंसानों का खून पीकर और ताकतवर बनना था…
न कि एक इंसान के लिए खुद को बदलना…

सिद्धिका की आँखें फिर से लाल होने लगीं…उसका शरीर कांपने लगा…

उसने धीरे से कहा -
नहीं…मैं उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती…।

आवाज़ और तेज़ हो गई—
तो फिर हम तुम्हें मजबूर करेंगे…

अचानक सिद्धिका के शरीर में तेज़ दर्द उठा…जैसे कोई उसकी आत्मा को जकड़ रहा हो।

उसी समय…कृष्णा अपने कमरे में था।वो बेचैन महसूस कर रहा था…जैसे कुछ गलत होने वाला हो। उसने अपनी कलाई के लाल धागे को कसकर पकड़ा…

और धीरे से कहा—
भगवान… सिद्धिका को बचा लीजिए…।

अंधेरे ने आखिरी चेतावनी दी—
अगर तुमने उस इंसान को नहीं छोड़ा…
तो अगली बार…तुम्हारे हाथों से ही उसका अंत होगा…

सिद्धिका घुटनों पर गिर गई…उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे…

वो बोली - 
मैं… उसे नहीं मार सकती…

वो रो पड़ी। लेकिन उसका शरीर धीरे-धीरे फिर से अंधकार के कब्जे में जा रहा था…अब कहानी का सबसे खतरनाक मोड़ शुरू हो चुका है—
🩸 अंधकार सिद्धिका को मजबूर करेगा…
❤️ और कृष्णा उसकी रक्षा करेगा…

👉 क्या सिद्धिका खुद को बचा पाएगी?
या सच में… एक दिन उसके ही हाथों कृष्णा का अंत होगा…?