तुमसे मोहब्बत है - 7 Deepshikha Kedia द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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तुमसे मोहब्बत है - 7


वाणी अपने कमरे में जाती है।

सूरज की हल्की किरणें खिड़की से छनकर अंदर आ रही थीं। कमरे में सादगी थी—कुछ किताबें, एक टेबल, एक छोटा-सा पॉट में पौधा… और एक बहुत ही शांत-सी लड़की।

वाणी अलमारी खोलती है और सोच में पड़ जाती है—

“क्या पहनूँ… कहीं ज़्यादा heavy ना लगे… professionalism दिखे… पर मेरी simplicity भी।”

आख़िरकार वह

हल्के पेस्टल रंग का एक सूती कुर्ता

निकालती है, जिसके दुपट्टे में बहुत ही नाजुक-सी किनारी थी।

बालों को उसने साफ़-सुथरी ढंग से बाँधा,

थोड़ी-सी काजल की लकीर,

हल्की-सी लिप बाम,

और कानों में छोटे-से मोती के झुमके।

दर्पण में खुद को देखते हुए वह धीरे-से मुस्कुराती है—

वाणी:

“चल वाणी… आज कोई गलती नहीं करनी। चाचू का भरोसा रखना है।”

उसकी आवाज़ में नर्मी थी, पर भीतर गहरा आत्मविश्वास।

वाणी बैग लेकर हॉल में आती है।

चाचू अब भी अख़बार लिए बैठे थे, लेकिन जैसे ही वाणी सामने आई, उन्होंने अख़बार थोड़ा नीचे किया।

वाणी झुककर उनके पैर छूती है—

वाणी:

“आशीर्वाद दीजिए चाचू… सच में जाऊँगी आज।”

साहिल अवस्थी तुनकमिजाज़ी छोड़कर हल्के से मुस्कुरा देते हैं।

वह उसके सिर पर हाथ रखते हैं—

साहिल अवस्थी:

“जाओ… बिना घबराए।

तुम्हें कोई रोक नहीं सकता, बस ख़ुद मत रुक जाना।”

वाणी की आँखें चमक उठती हैं।

वह गले लगाने को झुकती है—साहिल जी भले ही सख़्त इंसान हों, पर वाणी के साथ हमेशा पिता जैसा प्यार छलक पड़ता था।

वह धीमे से कहते हैं—

साहिल अवस्थी:

“और हाँ… अगर दमानी ग्रुप वाले impress हो गए तो शाम को gulab jamun लेती आना।”

वाणी हँसते हुए बाहर निकलती है

दमानी ग्रुप का विशाल ऑफिस।

उँची-उँची काँच की दीवारें,

फॉर्मल कपड़ों में स्टाफ,

और हवा में professionalism का दबदबा।

वाणी अंदर प्रवेश करती है—

हल्का सा घबराई हुई, पर चेहरा बिल्कुल composed।

रिसेप्शनिस्ट उसे तीसरी मंज़िल के waiting hall में भेजती है।

वह धीरे-से चलती है, तभी—

एक तेज़ हवा-सी चलती है,

और उसके हाथ में पकड़ी फाइल नीचे गिर जाती है।

पन्ने फर्श पर फैल जाते हैं।

वाणी घुटनों के बल बैठकर उन्हें समेटने लगती है…

तभी एक कड़ा-सा, तेज़, बेहद authoritative स्वर उसके ऊपर गिरता है—

वाणी पलटकर देखती है—

सामने कबीर  खड़ा था। विजय जी का बड़ा बेटा

काले फॉर्मल सूट में, बिल्कुल सीधे खड़े,

चेहरे पर लंबी सी स्माइल थोड़ा arrogance।

सामने कबीर अवस्थी खड़ा था—

साहिल जी का बड़ा बेटा।

तेज़ कद, काले फॉर्मल्स में एकदम प्रोफेशनल लुक…

चेहरे पर लंबी-सी शैतानी मुस्कान,

और उस मुस्कान के पीछे हल्का-सा arrogance, जैसे दुनिया का मालिक वही हो।

वाणी उसे देखते ही चिल्ला पड़ती है—

वाणी:

“तुम!!”

कबीर दोनों हाथ जेब में डालकर, वही लंबी मुस्कान दिखाता है—

कबीर:

“हाँ मैं… और तुम्हें क्या लगा?

वाणी आँखें घुमा लेती है और उससे मुँह फेरकर अपनी फाइल टेबल पर रख देती है।

बाल ठीक करती है, दुपट्टा सँवारती है, खुद को शांत करने की कोशिश करती है…

कबीर पास आकर फिर से अपनी कॉर्नर स्माइल मारता है—

कबीर:

“कर लो… कर लो जितना ignore करना है।

पर याद रखना—

इस ऑफिस में जब भी कदम रखोगी,

सबसे पहले मेरा ही सामना करना पड़ेगा।”

वाणी बिना उसकी तरफ देखे एक तीखा सा look देती है—

वाणी:

“चल निकल… मुझे late हो रहा है।”

कबीर बड़ी ड्रामेबाज़ी से हाथ सीने पर रखकर बोलता है—

कबीर:

“उफ़्फ… दिल तोड़ दिया तुमने मिस वाणी मेहरा।

पर कोई नही… आदत डाल लूँगा।

वैसे भी—

तुम मुझे ignore करो या डाँटो,

मुझे फर्क नहीं पड़ता।

मेरी favourite lawyer toh tum hi ho।”

वाणी उसका चेहरा घूरकर देती है—

वाणी:

“पाँच साल छोटे हो… behave like one.”

कबीर हँस देता है—

कबीर:

“पाँच साल छोटे… पर समझ पाँच साल ज़्यादा है इस फील्ड में।

अब चलो… पैनल तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”

इंटरव्यू रूम का माहौल पूरी तरह प्रोफ़ेशनल था।

टेबल के उस पार चार लोग बैठे—Damani Group के सीनियर पार्टनर, दो जजेस और मुख्य पैनल हेड।

वाणी पहले ही कई सवालों के साफ़, संतुलित और बेहद लॉजिकल जवाब दे चुकी थी।

हर जवाब में उसकी clarity और confidence चमक रहा था।

तभी दरवाज़ा खुला।

कमरे में Vinay Damani—पूरे Damani Group के Founder—अंदर आते हैं।

उनके आते ही पूरा पैनल खड़ा हो जाता है।

वाणी भी तुरंत खड़ी होकर उन्हें greet करती है—

वाणी:

“Good morning, sir.”

विनय दमानी मुस्कुराकर सिर हिलाते हैं,

फिर सीधा वाणी के सामने वाली कुर्सी पर बैठ जाते हैं और कहते हैं—

Vinay:

“Miss Vaani Mehra…

Main tumse ek hi sawal puchunga.

Aur is ek sawal ka jawab hi decide karega

ki tum is firm ke liye kitni perfect ho.”

कमरा एकदम शांत हो जाता है।

वाणी अपनी कमर सीधी कर लेती है,

आँखों में हल्का-सा कॉन्फिडेंस और घबराहट का मिश्रण।

Vinay हल्की झुककर, पर बेहद सख़्त आवाज़ में बोलते हैं—

“सोचो…

तुम्हारे business rivalry का कोई बड़ा क्लाइंट—

एक पब्लिक इवेंट में,

सबके सामने,

बिना किसी वजह…

तुम्हारी बुरी तरह से insult कर दे।

लेकिन…

कुछ सालों बाद,

वही इंसान,

खुद तुम्हारे पास आए

और तुमसे हाथ मिलाना चाहे…

तो तुम क्या करोगी, Miss Mehra?”

यह सवाल सीधा नहीं था।

यह character test था।

Ego, ethics और professionalism—तीनों का मिलाजुला इम्तिहान।

वाणी दो मिनट चुप रहती है।

आँखें झुकी हुई, पर दिमाग तेज़ी से दौड़ रहा था।

फिर वह हल्की मुस्कान के साथ सीधी Vinay Damani की ओर देखती है—

वाणी:

“Sir, sabse pehle main yeh dekhungi

ki us insaan se haath milane se

meri image, meri values ko

koi nuksaan toh nahi hoga.”

पैनल उसकी तरफ देखता है—interest बढ़ चुका था।

वाणी आगे बोलती है—

“Usne us waqt meri insult ki,

par aaj woh mere saamne jhukne ko tayyar hai

kyunki usse meri ज़रूरत है.”

“Yeh meri haar nahi—

balki meri professional victory hogi.”

“Us se haath milane se agar

mujhe bhi profit hoga aur

use bhi fayda milega—

toh yeh haath milana,

uski insult ka jawab  hi nahi,balki

uski insult par diya gaya ek chaanta (tamacha) hoga।”

कमरे में खामोशी छा जाती है।

दो सेकंड बाद…

Vinay Damani अचानक जोर से ताली बजाते हैं।

पूरा पैनल चौंक कर उन्हें देखता है।

Vinay (उत्साहित होकर):

“Shabash, Vaani!

Tumne aaj… mera dil ka bojh halka kar diya।”

उनकी आंखों में चमक थी—

जैसे किसी ने सालों बाद उनके मन की बात समझी हो।

Vinay:

“People take decisions from ego…

but you?

You took it with mind and maturity.”

“Welcome to Damani Group.”

वाणी के चेहरे पर पहली बार

एक असली, relief वाली मुस्कान आती है।