सुबह की हल्की धूप अभी पूरी तरह फैली भी नहीं थी किवाणी नींद से उठकर चुपचाप अपने कमरे से बाहर आ गई।रात देर से आने के बावजूद उसकी आदत वही थी—घर में सबसे पहले जागना और रसोई सँभालना।
रसोई में पहुँचते ही वह धीरे से चूल्हा जलाती,पानी गर्म करने रखती, और सब्ज़ियाँ काटने लगती है।उसके चेहरे पर हल्की-सी थकान थी,पर उसकी आँखों में वही रोज़ वाला सुकून और ज़िम्मेदारी छिपी हुई थी।
कुछ ही देर बाद पीछे से उसकी मासी, रेखा जी, नींद में बिखरे बालों के साथ रसोई में आती हैं।
जैसे ही वाणी को काम करता देखती हैं,वे कमर पर हाथ रखकर गुस्से में बोल पड़ती हैं—
“ये लड़की सच में पागल है!
रात को इतनी देर से आई…और अब थोड़ी देर सो भी नहीं सकती थी?”**
वाणी चाकू रखते हुए मासूम-सी मुस्कान देती है—
“मासी… आदत है मेरी।घर में किसी को तकलीफ़ न हो इसलिए सोचा जल्दी उठ जाऊँ ओर।”रेखा जी नजारे चढ़ा के बोलती है ओर क्या ?
वाणी कहती हैं ओर चाचू को मानना भी तो है इसलिए उनके फेवरेट आलू के पराठे बना रही हूं ।
रेखा जी कड़क नज़रों से उसे देखती हैं,मगर अंदर ही अंदर उस बच्ची की जिम्मेदारियाँ,उसका अकेलापन—सब समझती भी हैं।
“आदत-वादत छोड़ो,”
वह आगे बढ़कर वाणी के हाथ से चाकू लेती हैं।“थोड़ी देर आराम कर लेती तो क्या हो जाता?इतनी बड़ी दुनिया तू अकेले नहीं सँभाल सकती ओर चाचू तो माने ही हुए हैं तू एक नजर मुस्कुराते हुए उन्हें देख लेती उनका दिल वैसे ही पिघल जाता हैं ।”
वाणी हल्का सा सिर झुकाकर, धीमी मुस्कान के साथ बोलती है—“आप लोग हो ना…बाक़ी दुनिया की क्या ज़रूरत है मुझे ... ओर चाचू को एकस्ट्रा बटरिंग की नीड थी आज इसलिए बस "
रेखा जी का चेहरा पल भर को नरम पड़ जाता है।वह वाणी की माथे पर झुलसे हुए बाल पीछे करती हैं।
लेकिन तभी पीछे से रोहन आता है—नींद से सूजी आँखें, पर आवाज़ वही भारी—मां ये सुबह सुबह क्यों इतना हला मचा के रखती है?
वाणी और रेखा जी एक साथ पलटकर चिल्लाती हैं—
“Shut up, Rohan!”
रोहन तुरंत भोला चेहरा बनाकर अपने कमरे में भाग जाता है।
रेखा जी भौंहें चढ़ाकर वाणी की तरफ़ मुड़ती हैं और हाथ कमर पर रखकर पूछती हैं—
“एक्स्ट्रा बटरिंग क्यों करनी है चाचू को?
अब क्या ग़लती कर दी तूने?"
वाणी हल्की-सी दबी मुस्कान देती है, जैसे उसकी चोरी रंगे हाथों पकड़ी गई हो।वह होंठ काटकर धीरे से बोलती है—
“वो… वो… कल चाचू ने जो इंटरव्यू देने को कहा था…
मैं वहाँ नहीं जा पाई…"
रेखा जी आँखें तरेरती हैं—
“क्यों?”
वाणी मासूमियत से दोनों हथेलियाँ जोड़ लेती है—
“अच्छा… एक्चुअली…
कल गाँव से कुछ लोग आए थे न…तो बस… उनसे मिलने चली गई थी…”
रेखा जी अपना माथा पकड़ लेती हैं—“हाय राम!हो गया न कलेश!तू तो एक नंबर की मुसीबत है लड़की!”
फिर थोड़ी देर उसे घूरने के बाद हँसते हुए कहती हैं—
“चल… अब एक काम कर।
एक्स्ट्रा मक्खन नहीं…पूरी मक्खन की टिक्की ही चाचू की थाली में डाल देना आज!नहीं तो तेरी खैर नहीं… समझी?”
वाणी शर्मिंदा होकर गर्दन झुका लेती है और दोनों रसोई में हँसते हुए अपना काम करने लगती हैं।
उधर अगस्त्य अपने ऑफिस में पहुँचता है।अपने काबिन में जाकर वो शर्ट की कफ़ ठीक करता है, घड़ी पहनता है और बाल सेट करता है—बिना किसी एक्सप्रेशन के, हमेशा की तरह सौ टका परफ़ेक्ट और शांत।
वो टेबल पर रखा मोबाइल उठाकर बाहर किसी रेस्टोरेंट से नाश्ता ऑर्डर करने ही वाला होता है, तभी क़दर बिना दस्तक के वंश अंदर घुसता है।
वंश (हल्की झुंझलाहट में):“भाई, नाश्ता इधर ही पड़ा है… कुछ भी बाहर का मत मँगाना। माँ ने मना किया है।”
अगस्त्य उसकी बात सुनकर बस एक ब्लैंक-सा लुक देता है।फिर प्लेट की तरफ़ देखता है और चुपचाप खाना शुरू कर देता है—ठीक वैसे ही जैसे एक आदत हो, एक रूटीन हो, कोई भावना नहीं।
थोड़ी देर बाद अगस्त्य पूछता है—
अगस्त्य:“Damani Group से कोई बात हुई क्या?”
वंश (हँसकर):“भाई, अभी सुबह के नौ बजे हैं। अभी कहाँ दामनी जी ऑफिस पहुँचे होंगे? हर कोई आपकी तरह इतना punctual थोड़ी होता है।”
अगस्त्य एक सेकंड रुकता है—ऑखें हल्का-सा ऊपर उठती हैं—और फिर अपने अंदाज़ में ताना मारता है—
अगस्त्य:“बस-बस… ज़्यादा buttering मत करो।मुझे बटर पराँठों में पसंद है… बातों में नहीं।”
वंश हँसी रोकता है, लेकिन चेहरे पर एक क्यूट, कंट्रोल्ड स्माइल आ ही जाती है।
अगस्त्य वापस ठंडे स्वर में:“मेरी आज Mr. Damani से मीटिंग… फाइनल करवाओ।”
वंश:“ओके, भाई।”
वंश सिर हिलाकर बाहर चला जाता है, और अगस्त्य अपने कॉफ़ी मग को हल्के से उठाते हुए नजरें खिड़की की ओर मोड़ देता है—हमेशा की तरह एकदम शांत… but अंदर कहीं कुछ हल्का-सा बेचैन।
वाणी थाली में पराठे, दही और सब्ज़ी सजाकर डाइनिंग टेबल पर रखती है।टेबल पर पहले से बैठे साहिल अवस्थी अख़बार मोड़कर रखते हैं।
तभी वह ऊँची आवाज़ में कहते हैं—
साहिल अवस्थी:“रेखा जी! आज मुझे दूध–कॉर्नफ्लेक्स देना… सोच रहा हूँ पराठे खाना बंद ही कर दूँ।आजकल कोलेस्ट्रॉल बहुत बढ़ रहा है।”
वाणी और रेखा जी एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराती हैं।दोनों समझ जाती हैं कि ये ताना सीधे वाणी पर है।
वाणी धीरे-से उनके पास जाकर खड़ी हो जाती है।
वाणी (पछतावे वाली आवाज़ में):“सॉरी न चाचू…”
साहिल जी तुरंत मुंह फेर लेते हैं।
साहिल अवस्थी:“मुझे इस लड़की से कोई बात नहीं करनी।रेखा जी, इसे बोल देना।”
वाणी कुर्सी के पास झुककर लगभग विनती के लहजे में—
वाणी:“पर चाचू… क्यूँ नाराज़ हो?कल मैं सच में नहीं जा पाई…आज पक्का जाऊँगी।आप बस दमानी अंकल से एक बार बात कर लो… प्लीज़!”
साहिल अवस्थी झटके से चम्मच टेबल पर रखते हैं—आवाज़ से पूरे घर में हल्का-सा सन्नाटा भर जाता है।
साहिल अवस्थी (गुस्से में):“नहीं! मुझे किसी से कोई बात नहीं करनी!आख़िर मेरी भी कोई इज़्ज़त है!तुम जब देखो मेरी इज़्ज़त का कचरा कर देती हो…और मैं तुम्हारे लिए अपनी दोस्ती का फायदा उठाता फिरूँ?”
वाणी की आँखें नीचे झुक जाती हैं।चेहरा थोड़ा रुआँसा… होंठ सिकुड़ जाते हैं जैसे बच्चों की तरह शिकायत हो।
से कहती है—
वाणी:“तो फिर… मैं आपके साथ ही प्रैक्टिस क्यों नहीं कर सकती?एक साल से तो आपके साथ ही करती आई हूँ…फिर अब अचानक आपके साथ क्यों नहीं कर सकती?”
साहिल जी का चेहरा थोड़ा नरम पड़ता है।वह धीमे स्वर में समझाते हैं—
साहिल अवस्थी:“बेटा, तू समझती ही नहीं…मैं चाहता हूँ तू बहुत बड़ी वकील बने—मुझसे भी अच्छी।और जो अनुभव तुझे दमानी ग्रुप में मिलेगा,वो मेरे पास कहाँ से मिलेगा?उपर से विनय ने खुद तुझे अपनी कंपनी के लिए बुलाया है।वो चाहता है तू उसके अंडर ट्रेनिंग करे।”
वाणी मुंह साड़कर, पूरी ड्रामेबाज़ी के साथ बोलती है—
वाणी:“कल को अगर विनय अंकल अपने बेटे के लिए मुझे माँग लेंगेतो आप मुझे उठा कर दे दोगे क्या!?”
रेखा जी हँसी रोकने की कोशिश करती हैं।
साहिल जी माथे पर हाथ रखकर गहरी साँस लेते हैं, फिर मज़ाकिया-सी लाचारी में कहते हैं—
साहिल अवस्थी:“काश ऐसा होता…पर उनका बेटा तो बाईस साल का है…और तू—तीस की ... ये तो नहीं शादी कर लू एक अलग ही शौख चढ़ा है .. इस एक साल में तुझे कितने लड़के दिखाए एक भी तूने टिकने दिए सबको भगा देती हैं!”
वाणी एकदम चौंककर—“चाचू!! उम्र का हिसाब कौन रखता है आजकल!? ओर वो लड़के कड़के थे मेरे लायक नहीं थे”
चाचू मुस्कुराहट दबाते हैं—
साहिल अवस्थी:“मैं रखता हूँ! और ये बात जानकर ही चैन आता है किकम-से-कम मेरी ये बच्ची अभी उनकी बहू बनने के चक्कर में नहीं पड़ेगी... ओर तेरे लायक लड़का ढूंढते ढूंढते मैं भी बुड्ढा हो जाऊंगा और तेरे दादा की तरह ऊपर चला जाऊंगा।”
वाणी पानी का गिलास उठाती है और धीमे से, प्यार भरे गुस्से में बोलती है—
वाणी:“ आपको अगर ऐसी फालतू बात करनी है तो अभी पकड़ के ले आइए कोई को भी मैं अभी शादी कर लूंगी "
साहिल जी आखिरकार हँस पड़ते हैं—और वही हँसी इस छोटी-सी जिद्दी सुबह को हल्का कर देती है। साहिल जी कहते हैंअभी तुम शादी मत करो बस आज विनय के पास चली जाओ।
वाणी मुंह बना के रूम में चली जाती हैं।