तुमसे मोहब्बत है - 2 Deepshikha Kedia द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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तुमसे मोहब्बत है - 2


रात का वक्त…सड़क पर पसरा हुआ गहरा सन्नाटा…और उसी सन्नाटे को चीरती हुई5–6 ब्लैक लग्ज़री कारें,पूरी रफ़्तार में दौड़ रही थीं।

ऐसा लगता था मानो हवा को नहीं,बल्कि हवा उन्हें रास्ता दे रही हो।

काफ़िले के बीच वाली कार के अंदर—

ड्राइवर ने धीरे से कहा,“बॉस… थोड़ा AC कम कर दूँ?”

पर पीछे बैठे आदमी नेकोई जवाब नहीं दिया।

क्योंकि उसकी आँखें ही काफी थीं।गहरी… ठंडी… और इतनी भयानक किसिर्फ़ एक नज़र देखड्राइवर का गला सूख गया।

तभी ड्राइवर के बगल में बैठे आदमी नेथोड़ा गुस्से के साथ कहा—

“घर से जैकेट पहनकर आने का बोला था ना…?”

ड्राइवर शर्मिंदा होकर बोला,“सर… जल्दी में एयरपोर्ट के लिए निकला तो भूल गया…”

पीछे से फिर भीकोई जवाब नहीं आया।ड्राइवर की बेचैनी और बढ़ गई।वो समझ चुका था किपीछे वाली सीट पर जो बैठा है…वो इंसान कम, तूफ़ान ज़्यादा है।

कुछ सेकंड की खामोशी के बाद—पीछे बैठे उस आदमी नेकार के साइड में लगा एक बटन दबाया।

और तुरंतड्राइवर सीट और पीछे की सीट के बीचएक ब्लैक टिंटेड करटन नीचे की ओर स्लाइड होकर आ गया।

अब ड्राइवर और आगे की सीट वाला आदमीदोनों बिल्कुल चुप।ड्राइवर ने आगे का AC थोड़ा कम कर दिया।आज उसे पीछे बैठा इंसान किसी भगवान से कम नहीं लग रहा था।

कारों का काफ़िला तेज़ी से बढ़ रहा था।

काफ़िला उसी रफ्तार से अंधेरे, सुनसान रास्ते पर दौड़ रहा था।चारों तरफ़ घना सन्नाटा… न कोई आवाज़, न कोई इंसान।

तभी अचानक—

हेडलाइट की सफ़ेद रोशनी मेंएक लड़की सड़क के किनारे हाथ उठाकर लिफ्ट मांगती हुई नज़र आई।

असिस्टेंट ने आगे बैठते हुए जल्दी से कहा,“Sir… कोई महिला है। लगता है लिफ्ट मांग रही है।”

उसी पल असिस्टेंट के फ़ोन में एक मैसेज चमका—“Car रोको.”

वो एक सेकंड भी न सोचकरड्राइवर को बोला,“Stop the car.”

काफ़िला धीमा हुआ…बीच वाली कार सड़क के किनारे आकर रुक गई।

असिस्टेंट ने विंडो नीचे कीऔर नरमी से पूछा—

“Madam, क्या हुआ? इतनी रात को यहाँ… अकेली?”

लड़की ने धीरे सेअपने चेहरे पर रखा हलक़ा-सा दुपट्टा हटाया।

उसके चेहरे पर थकान थी… डर नहीं।और उसकी आँखें हल्की सी लाल,जैसे बहुत देर से हवा और धूल में खड़ी हो।

वह धीरे-धीरे बोली—

“Sir… actually…मेरी स्कूटी खराब हो गई है।मैं दो घंटे से यहाँ फँसी हुई हूँ।

यहाँ न कोई ऑटो मिल रहा है,न कोई मेरी बात सुनने वाला…और कोई लिफ्ट देने को तैयार भी नहीं है…”

उसकी आवाज़ टूट रही थी,पर उसमें एक सच्चाई साफ़ थी।

“क्या आप मेरी help कर सकते हैं…प्लीज़?”

रात की खामोशी मेंउसकी “please” बहुत भारी लगी।

असिस्टेंट कुछ कह पाता, उससे पहले—पीछे से हल्की-सी क्लिक की आवाज़ आई—

टिंटेड करटन धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा।

ड्राइवर और असिस्टेंट दोनों सीधा होकर बैठ गए।लड़की ने भी अनजाने में अपनी साँस रोक ली।

पीछे बैठे इंसान की निगाहें जैसे अचानक थम-सी जाती हैं।गाड़ी की हल्की रोशनी उस लड़की के चेहरे तक नहीं पहुँच रही, बस उसका ढका हुआ चेहरा, घबराई हुई आँखें और गुलाबी होंठ दिखाई देते हैं।

उस इंसान की आँखें कुछ पलों के लिए उसके होंठों पर टिक जाती हैं…ना कोई भाव…ना कोई चौंक…ना कोई मुलायमियत…

बस एक गहरा, बिल्कुल ठंडा सा ठहराव।

उसके चेहरे पर ऐसा रिएक्शन आता है जिसे कोई भी पढ़ नहीं सकता—क्या पहचाना?क्या शक हुआ?या फिर कुछ याद आया?

पता नहीं।

लेकिन एक बात साफ है—उसके मन में आया पहला रिएक्शन वो खुद तक ही सीमित रखता है।ना वो आँखें झुकाता है,ना कुछ पूछता है,ना ही किसी तरह का इमोशन दिखाता है।

उसी ठंडी, गहरी निगाह से वो बस लड़की को देखता रहता है—जैसे उसके होंठों और आँखों के पीछे छिपे हर राज़ को पढ़ लेना चाहता हो।

और फिर…वो सख्श बिना किसी हड़बड़ी के, मगर अपनी ठंडी और कड़क आवाज़ में बस इतना कहता है—“चलो… हमें लेट हो रहा है।”

Assistant तुरंत खिड़की बंद करते हुए बोलता है,“Sorry, ma’am…”और ड्राइवर कार को आगे बढ़ा देता है।

रफ्तार के साथ-साथ assistant के मन में बेचैनी बढ़ती जाती है।वह धीरे से सोचता है—

“अब ये इंसान किसी पर भी रहम नहीं करेगा…एक बार ड्राइवर पर कर चुका है… किसी और को मौका नहीं देगा…”

कुछ पल हिचकने के बाद वह हिम्मत जुटाता है और बहुत धीरे मगर डरते हुए कहता है—

“Boss… बुरा न माने तो एक बात कहूँ?वो लड़की अकेली है… परेशान है…और ये रास्ते भी ठीक नहीं हैं…कल को अगर उसके साथ कुछ गलत हो गया तो…?”

गाड़ी के अंदर सन्नाटा गहरा हो जाता है।पीछे से एक भी आवाज़ नहीं आती।Assistant का दिल थोड़ा और सिकुड़ जाता है।वह चुपचाप अपना चेहरा नीचे कर लेता है।

तभी उसके फोन पर अचानक कॉल आता है।वह तुरंत उठाता है—

“Sir, हम car no. 4 में हैं…वो madam की मदद के लिए रुक गए हैं।उन्हें घर छोड़कर हम आपको सीधे ऑफिस में मिलते हैं।”

उसके चेहरे पर पहली बार राहत की हल्की मुस्कान उतरती है।वह धीरे से कहता है—“Thank you, sir.”

लेकिन उसी पल…

पीछे से शूँ… की हल्की आवाज़ के साथcurtain फिर से खिसककर लग जाता है,जैसे उस इंसान ने दुनिया से अपनी दीवारऔर ऊँची कर दी हो।

वो लड़की उस कार को बिना रुके जाते देख गुस्से से बुदबुदाने लगती है।

“कैसा आदमी है! पागल… सनकी!आजकल के लोग सब मतलबी हो गए हैं।इतनी बड़ी कार है… कार है तो पैसा भी होगा!एक help कर देता तो क्या बिगड़ जाता?पागल इंसान… इंसान नहीं, शैतान!भगवान भी न जाने ऐसे लोगों को ही पैसा क्यों दे देते हैं!”

वो लगातार अपनी भड़ास निकालती हुई पीछे मुड़ती है —

और अचानक उसके सामने 6 फुट लंबा, चौड़ा, पत्थर जैसे चेहरे वाला आदमी खड़ा होता है।उसके चेहरे पर रत्ती भर भी भाव नहीं।आँखें सीधी उस पर टिकी हुई।

लड़की घबरा जाती है।एक कदम पीछे हटते हुए कहती है—

“अ… अब तुमको क्या चाहिए?देखो, मैं black belt हूँ…मुझसे पंगा मत लेना!”

वो आदमी कोई जवाब नहीं देता।बस चुपचाप उसके पास खड़ी स्कूटी की तरफ जाता हैऔर झुककर कुछ खोलने, कुछ कसने लगता है।

लड़की चीखते हुए दौड़ती है—

“अरे- अरे! मेरी स्कूटी को क्या कर रहे हो?छोड़ो इसे! अभी छोड़ो!देखो, मैं तुम पर केस करूँगी…मानहानि का दावा करूँगी!आखिर तुम हो कौन?”

तभी पीछे से कार का दरवाज़ा खुलता है।एक 60 साल का बुजुर्ग, शांत और नम्र चेहरे वाला, बाहर आता है।

वो हाथ जोड़कर कहता है—

**“बेटी, घबराओ मत।वो… हमारे बॉस ने तुम्हारी मदद करने के लिए हमें यहाँ रुकने को कहा था।उन्हें जल्दी थी, इसलिए वो आगे बढ़ गए।हम तुम्हें safely घर छोड़ देंगे।

ये—”**वो उस 6 फुट के आदमी की ओर इशारा करता है,“ये हमारे बॉस का बॉडीगार्ड ‘गफ्फूर’ है।”

गफ्फूर बिना ऊपर देखे बस स्कूटी ठीक करता रहता है—जैसे उसकी दुनिया में सिर्फ मशीनें हों, लोग नहीं।

और लड़की पहली बार थोड़ा चुप हो जाती है…थोड़ा हैरान,थोड़ा शर्मिंदा,और थोड़ा-सा समझ नहीं पाती किअभी जिसको उसने शैतान बोला था… वो असल में कौन था।

गफ्फूर स्कूटी को ठीक करके सीधे खड़ा होता है और भारी, भारी आवाज़ में कहता है—

“Aap chaliye, madam…Hum car se aapke peeche-peeche chal rahe hain.”

लड़की नीचे झुककर स्कूटी का स्टैंड मारती है, किक मारकर देखती है—पहली ही कोशिश में इंजन ज़ोर से गरज उठता है।

वो खुश होकर बोलती है—

“आरे वाह गफ्फूर भाई!तुम तो कमाल के निकले…स्कूटी बिल्कुल ठीक कर दी!Thank you bhai!”

गफ्फूर का चेहरा फिर भी वैसा ही—ना मुस्कान, ना कोई भाव।बस सूखी आँखें और पत्थर जैसे नैन-नक्श।

लड़की भौंहें सिकोड़कर बगल में खड़े बूढ़े ड्राइवर की ओर देखती है।

“चाचा… इसे मुस्कुराना नहीं आता क्या?”

बूढ़ा ड्राइवर हँस पड़ता है।“Arey betiya… yeh aisa hi hai.”

गफ्फूर बिना कुछ कहे वापस कार में जाकर बैठ जाता है।

लड़की चाचा की तरफ मुड़कर पूछती है—

“वैसे चाचा, आपका नाम क्या है?”

बूढ़ा मुस्कुराते हुए बोला—“Betiya, mera naam Hari Lal hai.Aur jo gaadi mein driver seat par baitha tha na…Woh mera beta hai.”

लड़की अपनापन महसूस करती हुई सिर हिलाती है।

“Thank you, Hari lal chacha…Meri help करने के लिए।”

वह अपनी स्कूटी आगे बढ़ाती है।पीछे-पीछे हरिलाल की कार चलती है—जब तक वह लड़की अपने घर के गेट के अंदर नहीं पहुँच जाती।

घर पहुँचते ही गेट बंद होता है।हरिलाल एक छोटी सी सिर हिलाकर इजाज़त लेता हैऔर गाड़ी मोड़ने लगता है।

उसी बीचगफ्फूर चुपचाप मोबाइल उठाकरउस लड़की की दो-तीन तस्वीरें क्लिक करता है—बिना किसी भाव के।

कुछ सेकंड बादवो अपने बॉस को व्हाट्सऐप पर भेजता है—

“Sir, madam ko safe ghar chhod diya.Everything clear.”

दूसरी तरफ…

वो आदमी—जिसकी आँखें अँधेरे में भी चुभने जैसी थीं—फोटो देखते हीफोन को साइड में रख देता है।

कुछ पल तक वह स्थिर बैठा रहता है…

फिर अपनी कलाई पर बँधीमहँगी, काली, ठंडी घड़ी को देखता है—

जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहा हो।

याजैसे किसी पल का हिसाब रख रहा हो।