मछलीवाली Alok Mishra द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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मछलीवाली

मछलीवाली          "मच्छी लेलो मच्छी......... । "  उमा जोर से हांका  लगाती हुई मछली बाज़ार से निकल कर बस्ती की ओर बढ़ने लगी। उमा के सर पर मछली की टोकरी है;जिसे एक हाथ से पकड़ा है।दूसरा हाथ हिला - हिला कर पूरी अदा के साथ कमर हिलाती हुई, गलियों में वो जोर से आवाज़ लगाती है "मच्छी....... ताजी ताजी मच्छी। "  उमा किसी नायिका की तरह ही खूबसूरत और जवान है। वो जब गलियों में मछली लेकर निकलती तो कई ऐसे लोग भी मछली का भाव पूछ लेते जो मछली को हाथ भी नहीं लगाते। उमा सब समझती है और कई लोगों से इतरा कर बात करती हुई प्रयास करती कि उसकी मछलियाँ आज जल्दी बिक जाऐं।       उल्लास लंगड़ा भी रोज ही उमा के आने का इंतजार करता। उसे सब लोग केवल लंगड़ा कहते है। वैसे वो लंगड़ा नहीं है लेकिन इस इलाके का गुण्डा है। गुण्डों के उपनाम होते है वैसे ही उसका उपनाम लंगड़ा है और इस इलाके में केवल लंगड़ा का आदमी होना याने ड़र का प्रतीक होना है। वही लंगड़ा आज भी मछली वाली याने उमा का इंतजार कर रहा था। उमा की दूर से आवाज़ आई  "मच्छी ले लो..... मच्छी.... ताजी ताजी मच्छी.....। " लंगड़ा अपने अड्डे के बाहर दालान में लुंगी और  लाल रंग की बनियाइन में आ कर आराम कुर्सी पर बैठ गया। उसके चमचे आस पास ही थे। वो चिल्लाया " चलो भागो यहां से..।"  उमा अब उसे दिखाई दे गई। वो जोर से बोला " ओ मच्छी वाली.....। "  उमा जानती है ये तो जरूर खरीदेगा। मच्छी की टोकरी लंगड़ा के सामने रखते हुए अदा के साथ बोली " दादा एकदम फ्रेस है और ये देखो ये तो आज खास आपके लिए ही लाई हुं। " उसने एक रोहु मछली उठाई और उसे दिखाने लगी। लंगड़ा मछली के पीछे से उसका साड़ी के बीच से झांकता हुआ उसके पेट के चिकनेपन को देख रहा था। लंगड़ा बोला " ये तो ठीकच है और कुछ है क्या? " उमा ने दूसरी मछली उठा ली और बोली ये देखो दादा। " हां.... येइच ठीक है । जितनी है पूरी देदो। " उमा नीचे पालथी मार कर बैठ गई और मछली तौलने लगी। देखने में ऐसा लग रहा था कि उमा मछली तौल रही है और लंगड़ा उसे तौलते हुए देख रहा है लेकिन लंगड़ा का ध्यान ब्लाउज के ऊपर से दिख रहे उमा के उभारों पर था। उमा यह जानती थी इसलिए उसने भी जितना तौलना था तौला और जितना बताना था बताया। लंगड़ा  लुंगी के मोड़ से पैसे निकलता हुआ बोला " तू तो रानी बन सकती, फिर मछली कायकू  बेचती है?  " दादा  तु रोज़च यही कहता है लेकिन तू भी ना अपुन को एक रात की रानी ही बनाएगा। " उमा ने जवाब दिया। आज तो लंगड़ा ने उसके कंधे पर हाथ ही रख दिया और बोला "तू आ जा रानी बना कर रखुंगा । एक रात की बात होती तो अब तक तो तेरेकू मेरे छोकरे उठा कर कब का मेरे बिस्तर पर फेक गए होते ‌। " उमा बोली " तू सही मे प्यार करता है और मुझे बाईको बनाऐगा यही बोल रहा है ना। " लंगड़ा को जैसे मुह मांगी मुराद ही मिल गई। उसने हां में मुंड़ी हिला दी। उमा बोली " मै तो रोज़च आती हुं। जमानत करवा लू फिर बताती हुं ना दादा। " लंगड़ा बोला " जमानत काय कू ? जमानत के बाद तू मेरे कूं नहीं पूछेगी? " उमा भी हाथ नचा कर बोली     "  मैइ जो बोली सो बोली पहिले जमानत फिर.....। " उमा आगे बढ़ गई " मच्छी ले लो..... मच्छी। ताजी ताजी मच्छी....। " टोकरी खाली हो गई। उमा भी अपने झोपड़े पर वापस आ गई।      पैसे गिने । कल मच्छी खरीदने के पैसे, घर की जरूरत और जमानत के पैसे अलग-अलग रखे। उमा चावल पसा ने को रख दिया। दरवाजे के पास मुंडेर पर बैठ कर सोचने लगी। ये सब वो क्या कर रही है। एक समय एक लड़के ने बात करने की कोशिश की थी तो वह रोती हुई घर आई थी फिर उसके भाईयों उस लड़के की बहुत पिटाई की थी। उमा सीधी सादी लड़की थी। न जाने क्या हुआ साधारण से घर की उमा का दिल उसी की उमर के बिरजू पर आ गया। उमा माँ बाबू को तो बता नहीं पाई। बस एक दिन भाग आई बिरजू के साथ। बिरजू उसको बहुत चाहता। खुद मछली बेचता मगर उसे बाज़ार में कदम भी नहीं रखने देता। उमा झोपड़े में रहती लेकिन वो अपनी जवानी और रूप को कहां छुपाती। उसके बाहर निकलते ही मनचले सक्रिय हो जाते। एक दिन डेनियल ने जादा ही हिम्मत कर ली। उसने सीधे उमा का हाथ पकड़ लिया। बिरजू को मालूम चला तो वो मछली काटने के चाकू याने सूरी लेकर घर से निकल पड़ा। उमा उसके पीछे दौड़ी लेकिन उसने डेनियल के पेट मे सूली उतार ही दी। अब डेनियल अस्पताल में है शायद बच जाएगा और बिरजू जेल में। उमा झोपड़े में है। उसे कोई काम भी तो नहीं आता। दो चार दिन में सामान खत्म हो गया। एक दिन भूखी भी रही फिर उसने फैसला किया वो भी मछली बेचेगी।      जब वो बाहर निकली तो उसके साथ उसकी जवानी और मादक सौंदर्य भी था। यही तो उसके सबसे बड़े दुश्मन थे। उसने लोगों से उसी अंदाज़ में बात करना प्रारंभ कर दिया जैसा वो चाहते थे। वो हल्की भाषा में बात करती और अपना काम निकल लेती। उसे इसमें कोई बुराई नहीं लगती। वो सारे लटकों झटकों के साथ बाज़ार रहती।  देखा जाय तो पुरूषों को उन्हीं के मनोविज्ञान से जीतने का प्रयास कर रही थी। उमा खुद की जरूरतों के साथ साथ बिरजू को बाहर लाने के लिए के लिए भी पैसे बचा रही थी। उमा पूरी बदल चुकी थी। अब वो सीधी सादी उमा चंट चालाक उमा हो बन चुकी थी।  बस उसे इंतजार था तो अपने बिरजू का। लंगड़ा जैसे तो बहुत से थे जो उसे अपना बनाने को बेकरार थे और कुछ उसको मदद करना चाहते थे अपनी शर्तों पर।        अब उसके पास पर्याप्त पैसे हो गए तो वो वकील से मिली। वकील के प्रयास से आखिर बिरजू के जमानत मिल ही गई। बिरजू जब आया तो उसने उमा का बदला हुआ रूप देखा। उसने उमा से कहा कि अब मै काम करूंगा तुम घर ग्रहस्थी देखों। उमा ने जवाब दिया " मै भी अब काम करूंगी क्योंकि कोर्ट मे अभी केस तो चलेगा ही। यदि तुम्हें सजा ही हो गई तो मेरा क्या होगा? " बिरजू भी बदलने लगा उसे अब उमा का यह बदलाव पसंद नहीं आ रहा था। वो बात बात पर उमा से लड़ने लगा। उमा इस बदलाव को महसूस कर रही थी। उधर डेनियल अस्पताल में मर गया इधर बिरजू फिर जेल चला गया लंबे समय के लिए । उमा अब इस दुनियां में अकेली रह गई।          बाज़ार मे उमा की आवाज फिर से गूंजने लगी " मच्छी ले लो.... ताजी ताजी मच्छी....। " उसे लंगड़ा सहित कई मनचलों की निगाहें अब पहले की तरह नहीं चुभती। हां वो इस भीड़ मे अपने पहले वाले बिरजू को खोजती रहती है। बिरजू तो जेल में है; लंबे समय के लिए ; शायद उसे कोई बिरजू जैसा मिल ही जाए यदि ऐसा हुआ तो, शायद पुरानी उमा फिर जीवित हो जाए। वो लंगड़ा जैसे कई लोगों को मानसिक संतुष्टी देती और अपनी पवित्रता को बिरजू के लिए सहेज कर रखती। बाज़ार में लंगड़ा सहित सभी उसे अपना माल समझते थे। वो इसी का लाभ लेकर अपना काम करती। लोग उसे न जाने क्या क्या कहेंगे और समझेंगे लेकिन अभी तो वो उन मनचलों के बीच बाज़ार में मछली बेचने को मजबूर है। बाज़ार में आवाज़ तैर रही है " मच्छी ले लो ...... मच्छी..... ताजी ताजी.... मच्छी....। "     

         आलोक मिश्रा " मनमौजी"