दोस्ती Alok Mishra द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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दोस्ती

     सुभम एक कंपनी में काम करता है। हंसमुख, सरल और कर्तव्यनिष्ठा के कारण जाना जाने वाला सुभम अपने आफिस सब का चहीता  था। वह विवाहित तो था लेकिन जहां भी जाता महिलाओं आकर्षण का केंद्र बन जाता। वह भी अक्सर उसका फायदा उठाता । उसके साथी भी उसकी किस्मत पर जलते थे। आफिस में ही उमा उसके साथ काम करती थी। उमा बहुत कुछ सुभम की तरह थी। वो सब से मिल कर रहती।  इसी कारण अक्सर दोनों में  बातों का सिलसिला कुछ लंबा खिंचा जाता।         उमा आफिस के पास ही एक फ्लेट में रहती। विवाहित वह भी थी। हमेशा ही लंच के दौरान घर जाती। उमेश लंच लाता ही नहीं था वो आफिस के पास ही कैंटीन में रोज लंच करता ।  उमा ने एक दिन लंच पर जाते हुए सुभम से पूछ लिया " लंच क्यों नहीं लाते? " सुभम ने मज़ाक में जवाब दिया " शायद कोई लंच के लिए पूछ ले इसलिए। " उमा बोली " ओह.... अरे तो आप स्वयम् को भी तो मेरे घर आमंत्रित कर सकते थे। चलो आज मेरे साथ लंच पर " सुभम बोला " अरे मै तो मज़ाक कर रहा था नहीं तुम जाओ। " उमा ने सुभम का हाथ पकड़ लिया "अब तो चलना ही पड़ेगा नहीं मै भी नहीं जाती। " सुभम मना करता रहा। उमा उसे साथ ले ही गई। घर में वे दोनों ही थे। उसका पति इस समय घर पर नहीं होता है। खानें के बाद उमा बोली " तुम तो बहुत कम खाते हो...... एक एक काफी हो जाऐ। " दोनों ने काफी पी बहुत सारी बातें की ओर आफिस साथ ही लौट आए।       उमा ने अब  सुभम को कह "  दिया कि रोज हम साथ ही लंच करेंगे वो भी मेरे घर " सुभम मान तो गया लेकिन पहले पहल के संकोच के बाद अब उसे उमा का घर अपना सा लगने लगा। सामान्यतः समाज में यह माना जाता है कि स्त्री पुरूष यदि ऐसे घूम फिर रहें है तो यह सामन्य घटना नहीं। आफिस में भी दोनों के विषय मे घुसुर- फुसुर शुरू हो गई। सुभम के साथी तो उसे मज़ाक में बोल ही देते " यार तुम्हारे तो मजे ही मजे है लंच का लंच और........। " सुभम मुस्कुरा कर कहता " ऐसा कुछ नहीं है । " ऐसा ही उमा साथ भी हो रहा था ।         सुभम के आसपास होने वाली बातें जो हंसी मज़ाक में कहकहों के साथ कही जा रही थी। सुभम के दिमाग मे कहकहों की तरह ही गूंजने लगी। वैसे भी वो पहले कई बार ऐसा कर चुका था। वो सोचने लगा शायद उमा भी वही चाहती है बस बोल नहीं पा रही है। याने उसे ही पहल करनी पड़ेगी। उमेश को लगा क्या उसे ऐसा कुछ सोचना भी चाहिए? इसके पहले तो कभी सोचा ही नहीं था। उमा तो उससे सामान्य व्यवहार करती ही लग रही थी। दिमाग में ऊथल- पुथल चलती रही। ये शब्दों का प्रभाव ही है जो किसी भी व्यक्ति की मानसिकता को बदल देता है। ऐसा ही अब सुभम महसूस कर रहा था। सुगम को अब उमा एक स्त्री दिखने लगी वो भी ऐसी स्री जो उसे अपना स्त्रीत्व सौप सकती है।अब वो कभी कभी ख़यालों में उमा के पूरे शरीर को देखता तो कभी उपभोग भी कर रहा होता।       अब सुभम और उमा लंच के लिए जब उमा के घर जाते तो सुभम कुछ अधिक ही शांत रहता। सुभम वास्तव में यह सोच रहा होता की किस तरह उमा को कहे कि वह भी तैयार है। उमा सुभम के व्यवहार में परिवर्तन को भांप गई थी। एक दिन बोली " कोई परेशानी है क्या; आजकल कुछ गुमसुम रहते हो? " सुभम हड़बड़ा गया " नहीं..... नहीं ऐसा तो कुछ नहीं है। " उमा हंस दी तुम तो हड़बड़ा गए कहीं कोई चक्कर तो नहीं? " सुभम बोला " तुम भी यार फालतू बात करती हो। " और जोर से हस दिया।  सुभम को लगा यही समय है जब उसे बोल देना चाहिए। काफी पीते हुए उमेश ने संभल कर बोलना प्रारंभ किया " मै सोच रहा था कि तुम भी विवाहित और मै भी " वो थोड़ा रूका और उमा के चेहरे पर प्रतिक्रिया देखने लगा। उमा गंभीरता से सुन रही थी। अशोक शब्द खोज रहा था ऐसे शब्द और वाक्य जो सभ्य लगें लेकिन अर्थ वही  हो जो वो बोलना चाहता है। शब्दों के चयन के बाद उसने बोलना उचित समझा "  जो तुम्हारे लिए नया नहीं है जो मेरे लिए भी नया नहीं है यदि हम दोनों मिल कर वो करे तो कितना मज़ा आएगा। "  सुभम बोल तो गया। अब वो उमा से नज़रे चुरा रहा था और धीरे से काफी की चुस्की लेने लगा।       उमा धीरे से मुस्कुरा दी और बहुत ही सधे हुए लहज़े में बोली "  आप ही बताओ जो आपके लिए नया नहीं और जो मेरे लिए भी नया नहीं उसे हम दोनों को करना ही क्यों है? "  सुभम को लगा उससे गलती हो गई  । उमा बोली " सुभम मुझे मालूम महिला और पुरूष की मित्रता के बीच यह बात आना सामान्य बात है। पर क्या हम केवल और केवल मित्र नहीं रह सकते। हम हमेशा मित्र रहें जैसे दो पुरूष या दो स्त्री रहते है।  यह तुम को उचित लगे तो मुझे भी अच्छा लगेगा। " सुभम को भी लगा जो गलती उसने कर दी है उससे बचने के लिए दोस्ती का मार्ग ही सही है। अब वो दोनों बहुत अच्छे दोस्त है। लोग उनके विषय मे तरह तरह की बातें करते है। उन्हें लोगों की बातों की कोई परवाह नहीं है । वे अपने दोस्ती में ही खोए रहते है।        वे आज कई वर्षों बाद शहर के काफी हाऊस में मिल रहे है। सुभम के चेहरे पर अब झुर्रियों ने स्थान ले लिया है और बाल भी सफेद हो गए है । उमा भी सफेद साड़ी में आई है । शायद उसके घुटनों कुछ परेशानी है इसलिए उसे चलने में दिक्कत हो रही है। दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कुराए और फिर अपनी दोस्ती के किस्सों को काफी पीते हुए याद करने लगे।    

आलोक मिश्रा " मनमौजी "