उमा को आज अचानक ही अनिल मिल गया। ये उसके साथ कालेज में पढ़ता था। उमा से अक्सर उसकी सहेलियाँ कहती कि अनिल हमेशा ही उमा को देखता रहता है। उसे भी लगता कि अनिल उससे कुछ कहना चाहता है लेकिन न उसने कुछ कहा और ना ही यह कहानी आगे बढ़ सकी। कुछ दिनों पहले अचानक ही अनिल उसे बस स्टाप पर मिला। वो बस उमा को देखता ही रहा। उमा ने ही अंधेरे मे तीर चलाने सी एक थोड़ी ऊंची आवाज निकाली " .अनिल.....! " दूसरी तरफ से उसी स्वर मे तुरंत ही आवाज आई " उमा.......! " दोनों पास आ गए । एक दूसरे के विषय में पूछने लगे। ये मुलाकात तो औपचारिक थी। वे अक्सर उसी बस स्टाप पर मिल जाते। ऐसी ही मुलाकात में अनिल से उमा ने पूछा " बच्चे कितने है? " अनिल हंस दिया और बोला शादी ही नहीं की तो........। " उमा चौंक गई और बोली " अरे...... अब तक..... क्यों नहीं, क्या हुआ ? " अनिल बोला " बस कोई तुम जैसी नहीं मिली। " उमा बोली " मुझ जैसी ...... तो क्या तुम मुझ से........। " वो "प्यार करते थे " ; बोलने में संकोच कर गई । अनिल ने उसकी बात पूरी की " हां..... हां..... मै तुम्हे चाहता था लेकिन कभी बोल नहीं पाया। " उमा उसकी ओर देखते हुए बोली " बोला क्यों नहीं ? " दिखने में तो यह प्रश्न था लेकिन यह तो उमा की इच्छा थी ,जो बस बोल गई। अनिल बोला " क्या अब भी बोलना पड़ेगा ? " उमा ने जवाब दिया " बोलने से पहले मेरे अतीत और वर्तमान के विषय में जानना जरूरी है। मै अब वो उमा नहीं हुं जिसको तुम कालेज में देखते थे। " फिर बस आ गई दोनों अपने अपने रास्ते चल दिए । अनिल अब अपने मन की बात खुल कर उमा से कहने लगा लेकिन उमा शायद किसी गांठ को सुलझाने के प्रयास में थी। उमा की गांठ थी कि खुलती न थी। अनिल ने एक दिन उमा से खुल कर बोल दिया " तुम अपने विषय में कुछ बताती क्यों नहीं ? मैनें तो फैसला कर लिया है कि अब मै दुबारा तुम्हें खोने वाला नहीं हुं । यदि तुम मना करोगी तो भी , मै तुम्हारा इंतजार उम्र भर करूंगा। " उमा बोली " मेरा इंतजार मत करो। मै अब विवाह नहीं कर सकती । " अनिल बोला बताओ तो कि ऐसा हुआ क्या है?" उमा यादों के समंदर धीरे - धीरे उतरने लगी। वो एक सांवली सी लड़की थी; पढ़ाई में बहुत अच्छी । बस अभी उसका ग्रेजुएशन हुआ ही था। माता -पिता ने एक लड़का खोज लिया, विवाह के लिए। लड़के का नाम भुजेंद्र था। दिखने दिखाने मे बहुत ही अच्छा। उमा तो अभी शादी ही नहीं करना चाहती थी लेकिन माता - पिता के कारण उसने भी हां कर दी । बस क्या था सारी रस्मों के साथ विवाह के बाद उमा ससुराल में थी। यहां आ कर उसे लगा शायद कुछ गलती तो हो गई है। दिन की रस्मों के बाद वो मिलन की रात आ गई। उमा सेज पर घूंघट में सजीधजी बैठी थी। भुजेंद्र जब कमरे में आया तो वो लड़खड़ा रहा था। वो आ कर पास बैठ गया और बोला "अब घूंघट उठा दो। " उमा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो उसने एक झटके से घूंघट उठा दिया और उसे लगभग दबोच ही लिया। उमा को भुजेंद्र के मुह से तेज गंध आ रही थी। उसे लगा कि उलटी हो जाएगी। भुजेंद्र को तो उमा की जैसे कोई फिक्र ही नहीं थी । उसके लिए उमा बस अब उसका अपना खिलौना भर थी। भुजेंद्र ने न तो उसके श्रृंगार को देखा न ही अपने कपड़ों की फिक्र की। वो उमा पर बस टूट पड़ा। उमा के लिए किसी पुरूष का स्पर्श ही पहली बार था लेकिन यह स्पर्श न होकर जबरदस्ती जैसा ही लग रहा था। उमा के लिए यह बहुत ही असहनीय था। उमा ने जब विरोध किया तो भुजेंद्र पूरी हैवानियत पर उतर आया। उसने लगभग उमा के कपड़े फाड़कर ही डाले। फिर उसने कहीं बहुत जोर से दबाया तो कहीं नाखून ही गड़ा दिए। उमा के लिए यह सब बहुत ही पीड़ा दायक था उसकी आखों से आंसू आने लगे। वो चीखने वाली थी कि भुजेंद्र ने कस कर मुह दबा दिया। पूरी रात भुजेंद्र को जो मन में आया वैसा किया। उमा निढाल हो चुकी थी। सुबह उमा तैयार होकर शरीर पर जख्म और खरोच लिए बाहर आई । उसका दिल जिसे कोई देख नहीं सकता था पूरी तरह से जख्मों से भरा था । दिन भर पारंपरिक रस्में चलती रही। उमा सोचती रही आज रात क्या फिर वैसा ही होगा। उसे लग रहा था दिन लंबा और लंबा हो और रात आए ही नहीं। फिर वो खुद को ही समझाने लगती यह भी तो हो सकता है भुजेंद्र पहली बार यह सब कर रहे थे इसलिए ऐसा किया हो। हो सकता आज ऐसा कुछ न हो। आखिर रात हो ही गई। उमा के लिए कुछ भी नहीं बदला भुजेंद्र के लिए उमा केवल एक खिलौना थी जिस पर वो अपनी पूरी मर्दानगी दिखा सकता था। उसकी मर्दानगी कि मतलब मर्दाना शक्ति का प्रदर्शन था। अब रोज ही यही होता। भुजेंद्र का जब एक तरह से मन भर जाता तो वह दूसरा तरीका निकाल लेता लेकिन वो जो भी करता उसमें उमा का कष्ट निश्चित था। भुजेंद्र परपीड़क था। ऐसे व्यक्ति को आनंद ही तब आता है जब उसका साथी कष्ट में हो और चीख चिल्ला रहा हो। उमा के माता या पिता का फोन आता तो वे उससे पूछते " ठीक है ना बेटी? " उमा अपनी आखों की कोरों पर हलकी सी नमी और कांपती आवाज में वो जो सुनना चाहते थे ; उमा वही कहती "हां मै ठीक हुं । " सब ठीक कहां था । माता - पिता अपने जवाबदारी से बरी हो चुके थे। अब वे बस अपनी बेटी से " ठीक है....." ही सुनना चाहते थे। सबके सामने " ठीक " होने का दिखावा चल रहा था। उमा ने फैसला किया वो आगे पढ़ेगी। भुजेंद्र ने बस हां कह दिया। उमा रोज रात को होने वाले कष्ट से इतनी परेशान थी कि उसे अब शारीरिक मिलन से भी ड़र लगता है। भुजेंद्र अपने आप में अजीब व्यक्ति था न कभी प्यार की बात करता, न कोई सलाह लेता और घर मे केवल सोने ही आता। बोलते - बोलते बिलकुल सामन्य तरीके से गालियाँ देने लगता। कभी कभी तो अपनी बात पर अड़ जाता। उमा को थप्पड़ मार देना बहुत ही सामान्य बात थी । भुजेंद्र शायद स्त्री के केवल शरीर के रूप में देखता था। समय बदला उमा अब नौकरी करती है यहां भुजेंद्र से दूर रह कर। कभी - कभी भुजेंद्र यहां आ जाता है। उमा उसके आने से दुखी हो जाती है क्योंकि भुजेंद्र आज भी नये नये तरीकों से शारीरिक संबंधों को करता जो उमा के लिए नये कष्टों की दासतां भरे होते। उमा ने अनिल कुछ बताया, कुछ नहीं लेकिन अनिल बहुत कुछ समझ गया। उमा बोली " अनिल क्या इसी पीड़ा को लोग आनंद बोलते है कहीं ऐसा तो नहीं मै ही सामान्य न होऊं? भुजेंद्र तो मेरा पति है वो मेरे साथ आज भी अपनी मनमानी करता है जिसे मै सहन करती रहती हुं। अब यह भी निश्चित ही है कि मै अब समान्य शारीरिक संबंधों के लिए भी कभी तैयार नहीं हो गाऊंगी । मै भुजेंद्र को छोड़ना चाहती हुं लेकिन किसी और पुरूष से संबंध नहीं बना सकती। " अनिल बोला " लेकिन ........ इस कष्ट से बाहर तो निकलना होगा। तुम जो भी निर्णय लो मै तुम्हारे साथ हुं। " उमा बोली " तुम अब कोई अच्छी सी लड़की देख कर विवाह कर लो। " अनिल बोला " और तुम यह सब सहती रहोगी। " उमा बोली " मै भुजेंद्र से तलाक ले रही हुं और अकेले ही रहुंगी जीवन भर। तुम जैसा दोस्त भी तो होगा हमेशा मेरे आसपास। " अनिल क्या बोलता, उसने भी मन ही मन कभी विवाह न करने का फैसला ले लिया।
आलोक मिश्रा " मनमौजी "