धोबी Dikshant Nagpure द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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धोबी

गंगाराम गाँव का धोबी था।

सुबह उठता। कपड़े इकट्ठा करता। नदी किनारे ले जाता। पत्थर पर पटकता। साबुन लगाता। धूप में सुखाता। शाम को इस्तरी करके वापस कर देता।

तीस साल से यही कर रहा था।

उसके हाथ सख्त हो गए थे। साबुन से उँगलियाँ फट गई थीं। पीठ दर्द करती थी। पर वो कभी नहीं रुका।

क्योंकि उसके पास और कुछ नहीं था।

न बाप। न माँ। न बीवी। न बच्चे।

बस कपड़े और उसकी टोकरी।

गाँव वाले उसे जानते थे। पर कोई उससे दोस्ती नहीं करता था। क्योंकि धोबी का छूना अशुभ माना जाता था। कपड़े तो दे देते थे। पर चाय नहीं पिलाते थे। दाल नहीं देते थे। नमस्ते तक नहीं करते थे।

गंगाराम को ये सब पता था। वो चुप रहता था।

एक दिन वो नदी किनारे कपड़े धो रहा था। तभी उसकी नज़र काली मिट्टी पर पड़ी। वो जगह नदी से बस थोड़ी दूर थी। उसने कभी ध्यान नहीं दिया था। आज क्यों दिया, उसे खुद नहीं पता।

उसने सोचा – थोड़ी मिट्टी ले जाऊँ। कपड़े सफेद करने में काम आएगी।

वो चला गया।

काली मिट्टी पर पहुँचा। झुका। दोनों हाथ भरे। मिट्टी को छूते ही उसे ठंडक महसूस हुई। बहुत तेज़ ठंडक। जैसे हाथों ने बर्फ छू ली हो। उसने मिट्टी अपनी टोकरी में डाली। वापस नदी किनारे आ गया।

उस दिन उसने वो काली मिट्टी मिलाकर कपड़े धोए।

कपड़े ऐसे सफेद हुए जैसे नए हों। गंगाराम हैरान था। इतनी सफेदी उसने कभी नहीं देखी थी। उसने सोचा – अब रोज़ थोड़ी मिट्टी लाऊँगा।

दूसरे दिन वो फिर काली मिट्टी पर गया। दो हाथ मिट्टी ली। कपड़े धोए। पहले से ज्यादा सफेद हुए।

तीसरे दिन वो गया तो मिट्टी कम हो गई थी। जैसे कोई और भी ले जा रहा हो। उसने ज्यादा मिट्टी ली। चार हाथ। टोकरी भर दी।

वो जितनी ज्यादा मिट्टी ले जाता, कपड़े उतने ही सफेद होते। गाँगराम मशहूर होने लगा। दूर-दूर से लोग उसके पास कपड़े धुलवाने आने लगे। जो कपड़ा काला होता, वो सफेद हो जाता। जो फटा होता, वो नया लगने लगता। लोग कहते – गंगाराम के हाथों में जादू है।

पर गंगाराम जानता था – जादू उसके हाथों में नहीं है। जादू काली मिट्टी में है।

एक रात वो देर तक कपड़े इस्तरी कर रहा था। तभी उसकी नज़र अपने हाथों पर पड़ी। हाथ नीले पड़ गए थे। काले नहीं। हल्के नीले। जैसे किसी ने रंग डाल दिया हो। उसने पानी से धोए। नहीं उतरे। साबुन लगाया। और गहरे हो गए। वो डर गया। पर सोचा – सुबह देखूँगा।

सुबह हाथ वैसे ही थे। नीले। पर अब उनमें झुर्रियाँ आ गई थीं। जैसे कोई बूढ़े आदमी के हाथ हो। गंगाराम को अपनी उम्र चालीस की थी। पर हाथ अस्सी के लग रहे थे।

उसने फिर भी काम करना नहीं छोड़ा। रोज़ काली मिट्टी लाता। कपड़े धोता। सफेदी बढ़ती गई। हाथ बूढ़े होते गए।

दस दिन बाद उसके हाथ बिल्कुल बेकार हो गए। उठाने लायक नहीं रहे। कपड़ा नहीं पकड़ पाता था। उसने टोकरी में मिट्टी रखनी चाही पर हाथ हिले ही नहीं।

वो गाँव के वैद्य के पास गया। वैद्य ने हाथ देखे। बोला – ये तो किसी मुर्दे के हाथ हैं। क्या कर रहा था तू?

गंगाराम ने सब बता दिया। वैद्य बोला – काली मिट्टी। बस हो गया। अब तू बचेगा नहीं।

गंगाराम गिड़गिड़ाया – कुछ तो करो वैद्य जी।

वैद्य बोला – एक ही उपाय है। वापस जा। अपने हाथ उस मिट्टी में दबा। सुबह तक उखाड़ लेना। नहीं तो तू खुद ही मिट्टी बन जाएगा।

गंगाराम रातोंरात काली मिट्टी पर पहुँचा। अपने दोनों हाथ मिट्टी में दबा दिए। ठंडक फिर महसूस हुई। इस बार ज्यादा। उसकी आँखें बंद हो गईं।

सुबह जब आँख खुली तो उसके हाथ वापस नॉर्मल थे। उठे। चले। सब ठीक था। वो खुश हुआ। भागता हुआ वापस गाँव आया।

पर गाँव में उसे देखकर सब चिल्ला उठे।

कोई भागा। कोई पत्थर लेकर आया। कोई चिल्लाया – भूत आ गया।

गंगाराम समझा नहीं। उसने अपना चेहरा पानी में देखा।

वो चिल्ला उठा।

उसका चेहरा वैसा नहीं था। नाक गायब थी। आँखों की जगह दो काले गड्ढे थे। और सिर पर बालों की जगह काली मिट्टी जमी थी।

वैद्य ने आकर देखा। बोला – मैंने कहा था हाथ मिट्टी में दबा। पर तूने पूरी रात वहीं बिता दी। मिट्टी ने तेरा चेहरा खा लिया। अब तू वही है जो कभी था ही नहीं।

गंगाराम भागा। काली मिट्टी पर जाकर गिर पड़ा। रोने लगा। मिट्टी में लोटने लगा। पर अब कोई फायदा नहीं था।

अगली सुबह गाँव वालों ने देखा – एक आदमी काली मिट्टी के पास बैठा है। कपड़े धो रहा है। कोई टोकरी नहीं। कोई साबुन नहीं। बस मिट्टी उठाता है। हाथ में मलता है। फिर फेंक देता है। कपड़े वहाँ कोई नहीं थे।

लोग चिल्ला-चिल्लाकर बोले – गंगाराम। घर चल।

उस आदमी ने मुँह उठाया। वही गंगाराम था। पर उसके चेहरे पर नाक थी। आँखें थीं। सब कुछ था। वो मुस्कुराया। बोला – मैं गंगाराम नहीं हूँ। मैं काली मिट्टी हूँ। गंगाराम तो अब मिट्टी है।

उसने अपनी टोकरी उठाई। गाँव की तरफ चल दिया। लोग पीछे हटते गए। कोई पास नहीं आया।

वो घर-घर गया। दरवाजे खटखटाए। बोला – कपड़े दो। धो दूंगा। सफेद कर दूंगा।

किसी ने कपड़े नहीं दिए।

पर अगले दिन सुबह उठे तो सबके घर के बाहर कपड़े पड़े थे। धुले हुए। इस्तरी किए हुए। ऐसे सफेद कि आँखें चौंधिया जाएँ।

लोग डर गए। फिर भी कपड़े पहन लिए।

उस दिन के बाद रोज़ रात को कोई न कोई कपड़ों का ढेर गायब हो जाता। और सुबह धुला हुआ वापस आ जाता।

धीरे-धीरे पूरे गाँव के कपड़े गंगाराम (या जो भी उसकी जगह है) धोने लगा। लोगों को आदत हो गई। सफेद कपड़ों की।

एक दिन एक बच्चा रो रहा था। उसकी माँ ने कहा – चुप हो जा। नहीं तो गंगाराम को बुला दूँगी।

बच्चा चुप हो गया।

बस फिर क्या था। गंगाराम का नाम डर बन गया। बच्चों को डराने के लिए लोग कहने लगे – सो जाओ। नहीं तो गंगाराम आ जाएगा।

गंगाराम ने ये सब सुना। वो मुस्कुराया। उसने रात को उसी औरत के घर से सारे कपड़े उठा लिए। सुबह लौटाए तो सब कपड़े काले थे। बिल्कुल काले। जैसे मिट्टी में रंग दिए गए हों।

औरत चिल्लाई। पर कोई सुनने वाला नहीं था।

क्योंकि अब गाँव में कोई भी गंगाराम के खिलाफ कुछ नहीं बोलता था। सब चुप थे। कपड़े धुलवाते थे। मुस्कुराते थे। घर जाते थे।

सिर्फ एक बूढ़ी औरत को याद था – असली गंगाराम कैसा था। उसकी आँखों में डर था। पर उसके होंठों पर ताला था।

क्योंकि उसके घर के बाहर हर सुबह काली मिट्टी के छींटे मिलते थे। और उन छींटों पर लिखा होता था – “बोल मत। वरना तू भी मिट्टी।”