तीन महीने पहले की बात है।
हम लोग नए शहर में आए थे। पापा की नौकरी ट्रांसफर हुई थी। माँ, मैं, छोटी बहन रिया, और पापा। चार लोगों का परिवार।
घर ढूंढना आसान नहीं था। पापा तीन दिन तक इधर-उधर भटकते रहे। हर जगह महंगा था। या फिर बहुत खराब।
फिर एक दिन एजेंट मिला। उसने कहा - "एक घर है। बहुत सस्ता। पर पुराना है।"
पापा ने तुरंत हाँ कर दी। क्योंकि उनके पास ऑप्शन नहीं था।
हम जब घर देखने पहुंचे तो मन थोड़ा डरा। बहुत पुरानी हवेली थी। टूटी-फूटी सी। पर अंदर के हिस्से ठीक थे। तीन कमरे, एक बड़ी रसोई, एक आंगन। और बीच में एक गलियारा।
गलियारे के आखिर में एक और कमरा था। पर उसका दरवाजा बंद था। उस पर बहुत पुराना ताला लगा था। लोहे का, जंग लगा हुआ।
मैंने एजेंट से पूछा - "ये कमरा?"
एजेंट की आँखें थोड़ी घबराईं। लेकिन वो तुरंत हंस दिया। बोला - "अरे ये तो पुराना स्टोर रूम है। बहुत सामान पड़ा है अंदर। जरूरत नहीं खोलने की। चाबी भी खो गई है सालों पहले।"
मैंने उस वक्त ज्यादा नहीं सोचा।
घर सस्ता मिला था। इतना सस्ता कि पापा को खुद यकीन नहीं हुआ। पूरे शहर में इतने कम किराए का कोई दूसरा घर नहीं था।
हम बस गए।
पहले तीन दिन बिल्कुल ठीक रहे। रिया नया कमरा देखकर खुश थी। माँ ने रसोई साफ की। पापा ऑफिस गए। मैं अपने कमरे में पढ़ता रहा। सब नॉर्मल था।
चौथे दिन रात को सब बदल गया।
रात के करीब 2 बजे थे। मैं प्यास से उठा। पानी पीने के लिए रसोई की तरफ बढ़ा। अभी दो-तीन कदम ही रखे थे कि आवाज आई।
घिसरने की आवाज।
जैसे कोई जंजीर फर्श पर घसीट रहा हो। या जैसे नाखून सीमेंट को नोच रहे हों।
मैं ठिठक गया। आवाज बंद हुई। मैंने सोचा - चूहे होंगे। पुराने घरों में तो ये सब होता है।
चलने लगा। फिर आवाज आई। इस बार ज्यादा तेज।
और साफ।
आवाज गलियारे से आ रही थी। जहां वो बंद कमरा था।
मैं वहां तक पहुंचा। ताला वैसे ही लगा था। सब कुछ वैसा ही था। बस सन्नाटा था। बहुत भारी सन्नाटा। जैसे कोई सांसें रोके बैठा हो अंदर ही अंदर।
मैंने कान दरवाजे पर लगाया।
कुछ नहीं सुनाई दिया।
सोचा वापस चलता हूँ। तभी दरवाजे के दूसरी तरफ से एक आवाज आई -
"सुन तो रहा है ना तू?"
यह आवाज पीछे से नहीं आई थी। अंदर से आई थी। उस बंद कमरे के अंदर से।
और वो आवाज... मेरी ही थी।
मेरे हाथ कांपने लगे। मैं पीछे हटा। देखा सब सो रहे थे। माँ, पापा, रिया। घर में सन्नाटा था।
मैंने फिर दरवाजे की तरफ देखा।
ताला जमीन पर गिरा हुआ था।
और दरवाजा खुला था। बस थोड़ा सा। करीब दो इंच।
उस छेद से ठंडी हवा आ रही थी। बहुत ठंडी। और उस हवा में एक अजीब बू थी। जैसे कोई गीली मिट्टी। या जैसे कोई पुरानी कब्र खुल गई हो।
अंदर बिल्कुल अंधेरा था। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
पर मुझे लगा जैसे कोई अंदर खड़ा है। कोई जो बस मेरा इंतजार कर रहा है।
मैं भागना चाहता था। पर पैर उसी जगह जम गए थे।
फिर अंदर से आवाज आई। इस बार बहुत करीब से। जैसे कोई सीधा मेरे कान में बोल रहा हो -
"अंदर आ..."
मैं चीखा। पूरे घर में मेरी चीख गूंज गई। माँ जाग गईं। पापा दौड़ते हुए आए।
"क्या हुआ?"
मैंने कमरे की तरफ इशारा किया।
पापा ने टॉर्च जलाई और देखा।
दरवाजा बंद था। ताला लगा था। वैसा ही जैसा पहले था।
जैसे कभी खुला ही नहीं था।
पापा बोले - "सपना देख रहा है तू। सो जा।"
मैं समझाने की कोशिश करता। पर माँ ने कहा - "बेटा सुबह बात करना। अब सो जा।"
मैं अपने कमरे में आ गया। लेट गया। पर नींद नहीं आई।
क्योंकि तब तक मुझे पता चल चुका था।
ये कोई सपना नहीं था।
जब मैं अपने कमरे में आया था, तब मेरे हाथ में ताले का एक छोटा सा हिस्सा था। जंग लगा हुआ लोहे का टुकड़ा।
जो मैंने उस कमरे के सामने से उठाया था।
वो टुकड़ा अब मेरे तकिए के नीचे था। वैसा ही ठंडा। वैसा ही बिना बताए...