कब्र नंबर 13 Dikshant Nagpure द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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कब्र नंबर 13

मेरे गाँव में सबसे पुरानी चीज़ मंदिर नहीं है। मेरे दादा जी नहीं हैं। ये पीपल का पेड़ नहीं है।

सबसे पुरानी चीज़ है - एक कब्र।

हाँ, कब्र।

गाँव के ठीक उत्तर दिशा में। जहाँ खत्म होते हैं खेत। वहाँ से करीब बीस कदम और। बीच में कोई रास्ता नहीं। बस झाड़ियाँ और सन्नाटा।

उस कब्र पर नंबर नहीं लिखा है। नाम नहीं है। तारीख भी नहीं है। पर गाँव वाले उसे दो नामों से बुलाते हैं।

एक - "वो कब्र"

दूसरा - "जहाँ से वापसी नहीं"

मैं रघु। उम्र 22 साल। इसी गाँव में पला-बढ़ा। बचपन से सुनता आया हूँ - "रात को उधर मत जाना बेटा।"

और मैं कभी नहीं गया।

पर अब जाना पड़ेगा। क्योंकि उधर मेरी बहन गई है और वापस नहीं आई।

उसका नाम मीरा है। अठारह साल की। पिछली रात वो बिना बताए घर से निकली थी। सुबह कमरा खाली मिला। चादर पर कुछ लिखा था। मीरा की ही लिखावट।

शब्द थे -

"भैया, मैं देख आती हूँ। बस एक बार। वो मुझे बुला रहा है।"

लिखावट में हाथ काँप रहा था। आखिरी शब्द बमुश्किल पढ़े जा रहे थे।

माँ रो रही थी। पापा चुप थे।

गाँव के मुखिया ने कहा - "कब्र के पास मत जाओ। जो गया, कभी नहीं लौटा। अब उसे भूल जाओ।"

पर मैं नहीं भूल सकता था। मीरा तो मेरी बहन थी। वो जब छोटी थी तो मेरे पीछे-पीछे घूमती थी। "भैया ये लो, भैया वो लो" करती थी। रात में डर लगता था तो मेरे पास आकर सो जाती थी।

और आज वो उस कब्र में है? या... कब्र के अंदर?

मैंने फैसला कर लिया।

रात को गाँव सो गया। दस बजे के बाद सन्नाटा छा गया। सिर्फ कुत्तों के भौंकने की आवाजें थीं।

मैं टॉर्च लेकर निकला। एक रस्सी, एक चाकू, पानी की बोतल और एक माचिस। पापा की पुरानी जैकेट पहनी। ठंड बहुत थी।

खेत पार किए। झाड़ियाँ चीरता हुआ आगे बढ़ा। करीब आधा घंटा चलने के बाद वो जगह आई।

पहली नज़र में लगा - ये तो बस मिट्टी का ढेर है। पर करीब जाकर देखा तो दिल बैठ गया।

कब्र छोटी नहीं थी। बहुत बड़ी थी। और उसके चारों तरफ 12 और छोटी-छोटी कब्रें थीं। जैसे उस एक बड़ी कब्र के चारों तरफ बच्चे खड़े हों।

मैंने गिन लिए - बड़ी कब्र + 12 छोटी = 13 कब्रें।

पर यहाँ तो एक ही कब्र थी गाँव में। बाकी कहाँ से आ गई?

मैं हैरान था। मैंने आगे कदम बढ़ाया।

तभी मेरे पीछे से आवाज आई - "रघु।"

मैं चौंका। पलटा। कोई नहीं था। बस अंधेरा था।

फिर आवाज आई। इस बार सीधे सामने से।

"तुझे आना ही था रघु। तू वो नहीं है जो दूसरों को छोड़ देता है।"

ये आवाज किसी बूढ़े आदमी की थी। थोड़ी भारी थी और थोड़ी... जमीन से आ रही थी।

मैंने टॉर्च जलाई। रोशनी बड़ी कब्र पर पड़ी।

और जो देखा, उससे मेरे हाथ से टॉर्च गिर गई।

कब्र के दरवाजे पर... मेरा नाम लिखा था।

"रघु"

नीचे लिखा था -

"अंदर आ तो सही। तेरी मीरा यहीं है। पर अब वो मीरा नहीं रही। वो अब... कब्र नंबर 13 की रखवाली करती है। और अगली तू होगा।"

मैं वहाँ खड़ा रह गया। साँसें तेज थीं। मैं भागना चाहता था। पर पैर हिल नहीं रहे थे।

तभी कब्र का दरवाजा चरमराया। खुलने लगा। अंदर से सिर्फ अंधेरा नहीं था। सफेद धुंआ निकल रहा था। और उस धुएँ में... एक चेहरा था।

मीरा का चेहरा।

पर मीरा नहीं थी वो। उसकी आँखें काली हो चुकी थीं। मुँह खुला था। बोली -

"भैया... अंदर आ जाओ न। बहुत अकेला लगता है यहाँ।"

मैं तीन कदम पीछे हटा। ठोकर लगी। मैं गिर गया। तभी मेरी नजर बाकी की 12 कब्रों पर पड़ी।

हर छोटी कब्र पर एक नाम था।

पहली कब्र पर - श्याम (गाँव का चायवाला, तीन दिन पहले गायब)

दूसरी पर - राधा (गाँव के मुखिया की बेटी, जो पाँच साल पहले मिली थी मुर्दा)

तीसरी पर - महेंद्र (जिसके घर से एक रात में पूरा परिवार गायब हो गया था)

मैंने चौथी कब्र का नाम पढ़ा तो मेरी रूह काँप गई।

"रघु - मृत्यु : 6 दिन बाद"

मैं वहाँ से उठा। नहीं देखा। बस दौड़ पड़ा।

कितनी देर दौड़ा, पता नहीं।

सुबह होते-होते घर पहुँचा। माँ दरवाजे पर खड़ी थी। मुझे देखकर रोने लगी।

"मीरा?" उसने पूछा।

मैंने कुछ नहीं कहा।

अपने कमरे में आकर लेट गया। आईना देखा। मेरी आँखों के नीचे काले निशान थे। जैसे किसी ने वहाँ कोई नाम खरोंचा हो।

मैंने गौर से देखा।

मेरे चेहरे पर... शब्द थे।

जैसे कोई अदृश्य उँगली लिख गई हो -

"कब्र नंबर 13 आ रही तेरे पास। भाग नहीं सकता।"

मैं चीखा। पर आवाज नहीं निकली।

क्योंकि मेरा मुँह... अब मेरा नहीं था। कोई और बोल रहा था।